नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (6 फरवरी) को फैसला सुनाया कि अदालतें किसी महिला, विशेषकर नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि महिलाओं की प्रजनन स्वायत्तता यानी उनके अपने शरीर और भविष्य को लेकर निर्णय लेने के अधिकार का सम्मान चिकित्सा गर्भपात अधिनियम (एमटीपी) के तहत वैधानिक सीमा से परे भी सर्वोपरि होना चाहिए.
उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र की एक 18 वर्षीय लड़की की मां द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए उनकी बेटी को 30 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी. साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पहले गर्भ समाप्त करने से इनकार कर दिया गया था और बच्चे को जन्म देने और गोद देने का सुझाव दिया गया था.
इस संबंध में जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि महिला की इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर करना न केवल महिला बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए भी गंभीर मानसिक आघात का कारण बनेगा.
अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विचार का मुख्य बिंदु यह है कि नाबालिग लड़की गर्भ को आगे बढ़ाना चाहती है या नहीं.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यहां यह सवाल निर्णायक नहीं है कि गर्भ किसी सहमति वाले संबंध से ठहरा या यौन शोषण का परिणाम था. तथ्य यह है कि लड़की स्वयं नाबालिग है और वह इस गर्भावस्था को आगे नहीं बढ़ाना चाहती.
प्रजनन स्वायत्तता को पूरा महत्व दिया जाना चाहिए
पीठ ने कहा कि जब मां बनने जा रही लड़की की इच्छा और हितों को देखा जाए तो उसकी प्रजनन स्वायत्तता को पूरा महत्व दिया जाना चाहिए.
सुनवाई के दौरान पीठ और महाराष्ट्र राज्य के वकील के बीच इस बात पर तीखी बहस हुई कि क्या अदालतें केवल इसलिए गर्भावस्था जारी रखने का आदेश दे सकती हैं क्योंकि महिला या भ्रूण के जीवन को कोई शारीरिक खतरा नहीं है.
इस संबंध में कोर्ट ने कहा, ‘यह हमारे लिए आसान फैसला नहीं है, लेकिन हम इस बात को ध्यान में रखते हैं कि आखिर किसकी जिंदगी मायने रखती है. अगर कानून 24 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति देता है तो ऐसे असाधारण हालात में 30 सप्ताह पर भी यही प्रश्न उठता है कि क्या किसी लड़की को उसकी इच्छा के खिलाफ मां बनने के लिए मजबूर किया जा सकता है.
अदालत ने आगे कहा, ‘हो सकता है कि उसे कोई शारीरिक समस्या न हो… लेकिन सवाल उसकी इच्छा का है… क्या अदालत कह सकती है कि ‘नहीं, भले ही तुम बच्चे को जन्म देना न चाहो, फिर भी देना होगा?’
जब राज्य ने यह तर्क दिया कि महिला 18 वर्ष की हो चुकी है और अदालतें आमतौर पर बलात्कार या जीवन को खतरे जैसी असाधारण परिस्थितियों में ही 24 सप्ताह के बाद गर्भपात की अनुमति देती हैं, तो पीठ ने इस कड़े शब्दों में प्रतिक्रिया दी.
पीठ ने पूछा, ‘हमें यह सवाल नहीं पूछना चाहिए. सवाल यह है कि क्या वह गर्भावस्था जारी रखना चाहती है या नहीं. क्या अदालत यह कह सकती है कि आपको गर्भावस्था जारी रखनी ही होगी?’
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि गर्भवती होने के समय लड़की नाबालिग थी.
महिला की इच्छा और मानसिक स्वास्थ्य सर्वोपरि
सुनवाई के दौरान अदालत ने बार-बार इस बात पर बल दिया कि महिला की इच्छा और मानसिक स्वास्थ्य सर्वोपरि हैं, न कि केवल भ्रूण के चिकित्सकीय रूप से जीवित रहने की संभावना.
अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे मामलों मे राहत से इनकार करने पर महिलाएं असुरक्षित गर्भपात की ओर धकेली जा सकती हैं. तब वे अदालतों में आना बंद कर देंगी और असुरक्षित गर्भपात का सहारा लेना शुरू कर सकती हैं.
24 सप्ताह के बाद गर्भपात को केवल जानलेवा स्थितियों तक सीमित रखने के तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि अनचाही गर्भावस्था के कारण होने वाली मानसिक पीड़ा भी 24 सप्ताह के बाद गर्भपात की अनुमति देने का एक अच्छा आधार हो सकती है.
पीठ ने सामाजिक वास्तविकताओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि लड़की के नाबालिग रहते हुए यह गर्भधारण एक ‘अवैध संबंध’ से हुआ था. पीठ ने कहा, ‘वह किसी भी समाज में वापस नहीं जा सकती. ज़रा उस समाज को देखिए जिसमें हम रहते हैं… उस सामाजिक कलंक के बारे में सोचिए जिसका उसे सामना करना पड़ेगा.’
हालांकि राज्य ने प्रसव खर्च वहन करने की पेशकश की और गोद लेने का विकल्प सुझाया, लेकिन अदालत संतुष्ट नहीं हुई.
अपने आधिकारिक आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के 27 जनवरी के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें 28 सप्ताह की गर्भावस्था में गर्भपात से इनकार कर दिया गया था.
मालूम हो कि उच्च न्यायालय ने फैसला इस आधार पर दिया था कि यह गर्भपात भ्रूणहत्या के समान होगा और जन्म के बाद एक स्वस्थ बच्चे को गोद दिया जा सकता है.
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में निर्देश दिया कि मुंबई के जेजे अस्पताल में सभी चिकित्सीय सुरक्षा उपायों के साथ गर्भावस्था को समाप्त किया जाए. मामले की तात्कालिकता को देखते हुए न्यायालय ने रजिस्ट्री को उसी दिन फैसले का आधिकारिक भाग जारी करने का आदेश दिया ताकि तत्काल अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके. न्यायालय ने यह भी कहा कि विस्तृत आदेश बाद में जारी किया जाएगा.
गौरतलब है कि चिकित्सा गर्भपात अधिनियम, जो पहली बार 1971 में अस्तित्व में आया था और फिर 2021 में संशोधित किया गया, सभी महिलाओं को 20 सप्ताह तक कानूनी रूप से गर्भपात कराने की अनुमति देता है.
इसमें मानसिक पीड़ा, बलात्कार, हमले और अन्य स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं आदि के कारण महिलाओं को 24 सप्ताह तक की अतिरिक्त समयसीमा भी प्रदान की गई है.
