नई दिल्ली: वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल द्वारा भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते का विवरण प्रस्तुत करने के तुरंत बाद संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने उनके तत्काल इस्तीफे की मांग की.
द हिंदू की खबर के मुताबिक, शनिवार (7 फरवरी) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एसकेएम नेताओं ने कहा कि अमेरिका-भारत व्यापार पर अंतरिम समझौते का ढांचा (framework) अमेरिकी कृषि क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने पूर्ण ‘आत्मसमर्पण’ है.
एक संयुक्त बयान में सूखे अनाज (डीडीजी), पशु आहार के लिए लाल ज्वार, मेवे, ताजे और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, शराब और स्पिरिट और अन्य उत्पादों को शामिल किए जाने का हवाला देते हुए एसकेएम नेताओं ने कहा कि इस समझौते के बाद पशु आहार बाजार पर अमेरिकी कंपनियों का पूर्ण एकाधिकार हो जाएगा.
इस संबंध में एसकेएम ने 12 फरवरी को किसानों से विरोध प्रदर्शन में शामिल होने और ‘जनविरोधी मोदी सरकार को मुंहतोड़ जवाब’ देने के लिए श्रमिकों की आम हड़ताल का समर्थन करने का आग्रह किया है.
एसकेएम ने पीयूष गोयल के इस दावे को झूठा बताया कि कृषि और डेयरी क्षेत्र समझौते से बाहर हैं.
संगठन ने कहा, ‘डेयरी उत्पाद यूके, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ एफटीए का हिस्सा हैं. वाणिज्य मंत्री जानबूझकर झूठ फैला रहे हैं और किसानों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं. एसकेएम वाणिज्य मंत्री की भूमिका को देशद्रोही मानती है और उनके तत्काल इस्तीफे की मांग करती है.’
संगठन ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि वे भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर न करें, अन्यथा उन्हें देशव्यापी जन आंदोलन का सामना करना पड़ेगा.
भारत ने अमेरिकी सामानों पर टैरिफ में बड़ी कटौती की
नेताओं ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ 2023-24 में शून्य से 3% था जो अब बढ़कर 18% हो गया है, जबकि अमेरिकी कृषि उत्पादों पर भारत का टैरिफ जो 30% से 150% था, अब शून्य हो गया है.
एसकेएम के अनुसार, इससे भारतीय कृषि अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शिकंजे में फंसी रह जाएगी.
पशुपालन क्षेत्र द्वारा पशु आहार के आयात की मांग के संबंध में मंत्री के रुख पर सवाल उठाते हुए एसकेएम ने कहा कि किसी भी किसान ने आयातित पशु आहार की आवश्यकता नहीं बताई है.
कुछ पोल्ट्री समूह मक्का और सोयाबीन आधारित पशु आहार के आयात की मांग कर रहे थे ताकि वे यहां दोनों फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को कम कर सकें.
किसान नेता राकेश टिकैत ने सवाल उठाया, ‘अमेरिका में जानवरों के चारे में मांसाहारी वस्तुएं भी हो सकती हैं. सरकार हमारी गायों को मांसाहारी भोजन क्यों खिलाना चाहती है?’
एसकेएम ने आगे कहा, ‘आरएसएस हमेशा से मांसाहारी पशुओं के दूध के आयात पर रोक लगाता रहा है. यह एक गैर-टैरिफ बाधा थी. अब, ‘मास्टर’ डोनाल्ड ट्रंप ने आरएसएस को अपने ही दावे को वापस लेने पर मजबूर कर दिया है और वे पूरी तरह से झुक गए हैं.’
और भी हैं चिंताएं
उधर, सेब किसान महासंघ के नेता और जम्मू-कश्मीर के विधायक एमवाई तारिगामी ने कहा कि यह सौदा कश्मीर और हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी होगा.
उन्होंने कहा, ‘विपणन सुविधाओं की कमी और जलवायु संबंधी चुनौतियों के कारण सेब की खेती में हमें पहले से ही समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. दोनों राज्यों के किसान पहले से ही संकट में हैं. यह घोषणा सेब और मेवे उगाने वाले किसानों के लिए एक बड़ा झटका साबित होगी. जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में, जहां उद्योग जैसे आर्थिक विकास के अन्य कोई साधन नहीं हैं, आय का एकमात्र स्रोत सेब और सूखे मेवों की खेती ही थी. केंद्र सरकार यहां के किसानों की परवाह नहीं करती और अमेरिका में बैठे अपने आकाओं के लिए काम कर रही है.’
भारत को ऑस्ट्रेलिया से प्रतिवर्ष तीन लाख गांठें शुल्क-मुक्त कपास, अफ्रीका से 5.5% शुल्क पर और अमेरिका से 32 मिमी से अधिक मोटाई वाली शुल्क-मुक्त कपास प्राप्त होती है.
वर्तमान में, कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) द्वारा बेची जाने वाली भारतीय कपास की कीमत ब्राजील की कपास की तुलना में 15% अधिक है. मौजूदा कपास विपणन सीजन (अक्टूबर 2025 से सितंबर 2026) की शुरुआत से अब तक 225 लाख गांठें भारतीय कपास बाजार में आ चुकी हैं, जबकि किसानों के पास लगभग 100 लाख गांठें और होने की संभावना है.
कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अतुल गनात्रा ने कहा, ‘जब तक भारतीय कपास महंगी रहेगी, कपास का आयात जारी रहेगा. हालांकि, भारत-अमेरिका समझौते के तहत कपास आयात के विवरण के बारे में हमें जानकारी नहीं है.’
महाराष्ट्र में कपास किसानों के नेता अजीत नवाले ने कहा कि भारत में कपास की पैदावार कई विदेशी देशों की तुलना में काफी कम है और अमेरिका से बिना किसी शुल्क के कपास का आयात देश में कपास किसानों की स्थिति को और खराब कर देगा.
