नई दिल्ली: गुजरात के गांधीनगर ज़िले के मानसा स्थित एक मजिस्ट्रेट अदालत ने 10 फरवरी 2026 को स्वतंत्र पत्रकार रवि नायर को आपराधिक मानहानि के एक मामले में दोषी ठहराया और उन्हें एक साल की साधारण कैद तथा 5,000 रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई.
यह फैसला अडानी समूह की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) द्वारा दायर एक निजी शिकायत के बाद आया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि नायर द्वारा सोशल मीडिया पर प्रकाशित पोस्ट्स की एक श्रृंखला में मानहानिकारक सामग्री थी, जिससे कंपनी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा.
यह मामला अक्टूबर 2020 से जुलाई 2021 के बीच नायर द्वारा अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट से किए गए ट्वीट्स और उनसे जुड़ी ऑनलाइन सामग्री से जुड़ा है. एईएल द्वारा निजी शिकायत के रूप में दायर मामले के अनुसार, इसी तरह की सामग्री उनके लेखन से जुड़ी वेबसाइटों पर भी मौजूद थी. एईएल का कहना था कि ये प्रकाशन निष्पक्ष टिप्पणी या वैध आलोचना की सीमा से आगे जाते हैं और इनमें अडानी समूह के खिलाफ भ्रष्टाचार, कानूनों में हेरफेर, सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग और अनुचित राजनीतिक संरक्षण जैसे आरोपों के रूप में ठोस दावे किए गए थे.
गुजरात अदालत के आदेश में कहा गया, ‘सिर्फ शोध का दावा करना या लोगों से बातचीत पर निर्भर होना सच्चाई या अच्छी नीयत की शर्त को पूरा नहीं करता. अच्छी नीयत का अर्थ आवश्यक सावधानी भी होता है, खासकर तब जब आरोप गंभीर हों और उनसे प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान हो सकता हो.’
रवि नायर के खिलाफ यह आपराधिक मानहानि का मामला 3 सितंबर 2021 को उनके सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर किए गए पोस्ट और री-पोस्ट तथा स्वतंत्र न्यूज़ साइट अडानीवॉच में उनके योगदान को लेकर दायर किया गया था. पत्रकार को इस शिकायत की जानकारी जुलाई 2022 में तब मिली, जब उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया, जिसे पहली सुनवाई में ही रद्द कर दिया गया.
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने उस समय तथाकथित स्लैप केस – ऐसे मामले जो प्रभावशाली लोगों द्वारा पत्रकारिता को चुप कराने की कोशिश के तौर पर दायर किए जाते हैं, पर अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में इसका ज़िक्र किया था. आरएसएफ ने कहा था कि ऐसे मुक़दमों का असली मक़सद पत्रकारों को मानसिक और आर्थिक रूप से थकाना है, ताकि कानूनी प्रक्रिया ही सज़ा बन जाए.
भारतीय दंड संहिता की धाराओं 499 और 500 (और 2023 में लागू हुई भारतीय न्याय संहिता की धारा 356) के तहत आपराधिक मानहानि के लिए अधिकतम दो साल की सज़ा का प्रावधान है. अदालत ने माना कि संबंधित पोस्ट निवेशकों, नियामकों और कारोबारी साझेदारों के बीच एईएल की प्रतिष्ठा गिराने में सक्षम थे और इसलिए यह एक अपराध बनता है.
प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट दामिनी दीक्षित ने नायर के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि ये पोस्ट और उनके लेखन जनहित से जुड़े मुद्दों पर निष्पक्ष टिप्पणी और आलोचना थे. अदालत ने यह कहते हुए नायर की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि उनका काम सद्भावना में की गई जनहित पत्रकारिता था, क्योंकि उनके लेखन में लगाए गए गंभीर आरोपों के समर्थन में रिकॉर्ड पर कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई थी.
अदालत ने नायर को प्रोबेशन का लाभ देने से भी इनकार कर दिया और कहा कि कई महीनों तक ट्वीट्स की फ्रीक्वेंसी और निरंतरता यह दर्शाती है कि यह शिकायतकर्ता की ‘छवि खराब करने का जानबूझकर और लगातार प्रयास’ था, न कि सच्ची आलोचना.
प्रोबेशन सशर्त रिहाई का एक रूप होता है, जो आमतौर पर पहली बार अपराध करने वालों को दी जाती है, जिसमें उन्हें प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 के तहत एक तय अवधि तक कुछ शर्तों के साथ राज्य की निगरानी में रखा जाता है और जेल नहीं भेजा जाता. चूंकि यह विकल्प नायर को नहीं दिया गया है, इसलिए उनके अगले कानूनी कदम संभवतः उच्च अदालत में स्थगन (स्टे) और/या अपील के लिए जाना होंगे – हालांकि इसका मतलब तत्काल गिरफ्तारी नहीं है.
गुजरात की अदालत में मजिस्ट्रेट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निरंकुश नहीं है और इसे अनुच्छेद 21 के तहत प्रतिष्ठा के अधिकार के साथ संतुलित किया जाना चाहिए. आदेश में यह भी दोहराया गया कि कंपनियों जैसी विधिक इकाइयों (ज्यूरिस्टिक पर्सन) की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचना भी कानून के तहत संरक्षित हित है.
अदालत के फैसले के जवाब में नायर ने 10 फरवरी को अपने एक्स अकाउंट पर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की उर्दू कविता ‘हम देखेंगे’ का संदर्भ देते हुए सिर्फ एक पंक्ति पोस्ट की– ‘हम देखेंगे.’
उल्लेखनीय है कि सितंबर 2025 में द वायर से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि मानहानि को अपराध की श्रेणी से बाहर करने पर विचार करने का ‘समय आ गया है’, जिससे आपराधिक सज़ा हटाने की दिशा में सोच का संकेत मिला था.
हालांकि, कानून में अब भी मानहानि को आपराधिक और दीवानी – दोनों तरह का अपराध माना जाता है. भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने खुद को सुधारवादी बताते हुए भी इस अपराध को नहीं हटाया. इसके बजाय पहले की सजाओं को बनाए रखते हुए अब इसमें वैकल्पिक सज़ा के रूप में सामुदायिक सेवा को जोड़ा गया है और कुछ मामलों में – जैसे जब किसी व्यक्ति की बजाय किसी समूह की मानहानि मानी जाए – अदालत के विवेक से सज़ा को बढ़ाकर तीन साल तक किया जा सकता है.
पत्रकार रवि नायर पहले द वायर के लिए लेख लिख चुके हैं, साथ ही कई अन्य प्रकाशनों और वेबसाइट अडानीवॉच (AdaniWatch) में भी उनका योगदान रहा है. उन्होंने स्वतंत्र रूप से और अन्य खोजी पत्रकारों के साथ मिलकर भी काम किया है, जिन पर भी आपराधिक मानहानि के मामले दर्ज किए गए हैं – जिनमें अडानी समूह की कंपनियों द्वारा दायर मामले भी शामिल हैं.
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने पिछले साल दिसंबर में अपनी ‘प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स’ यानी प्रेस की आज़ादी के लिए ख़तरा माने जाने वाले लोगों, संगठनों की सूची जारी की थी. इस सूची में भारत की दो संस्थाओं- अडानी समूह और हिंदुत्ववादी वेबसाइट ऑपइंडिया को शामिल किया गया था.
आरएसएफ ने गौतम अडानी को देश के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी के रूप में चिह्नित किया था. संगठन ने कहा था कि उनके नेतृत्व वाला अडानी समूह और उसकी सहयोगी कंपनियां स्वतंत्र मीडिया को चुप कराने के लिए व्यवस्थित तरीके से मानहानि और कंटेंट पर रोक लगाए जाने के मुकदमों (गैग सूट/केस) का इस्तेमाल करती हैं.
