नई दिल्ली: विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने मंगलवार (10 फरवरी) को संसदीय विदेश मामलों की स्थायी समिति को बताया है कि भारत सरकार ने उस अमेरिकी कार्यकारी आदेश पर प्रतिक्रिया न देने का फैसला किया है, जिसमें टैरिफ में रियायतों को भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद बंद करने से सीधे तौर पर जोड़ा गया है.
वॉशिंगटन से आए हालिया बयानों की पृष्ठभूमि में समिति को जानकारी देते समय उनसे इस मुद्दे पर भारत के रुख को लेकर तीखे सवाल पूछे गए.
मिस्री ने इस सवाल पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया कि क्या भारत ने औपचारिक रूप से अमेरिका से रूसी तेल का आयात रोकने की कोई प्रतिबद्धता जताई है. उन्होंने दोहराया कि भारत के फैसले राष्ट्रीय हित के आधार पर ही लिए जाएंगे.
गौरतलब है कि केंद्रीय उद्योग और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी शनिवार (7 फरवरी) को इस मुद्दे पर सवालों से बचते हुए कहा था कि ‘इसकी जानकारी विदेश मंत्रालय ही दे पाएगा.’
विदेश सचिव ने समिति को केवल इतना बताया कि भारत, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुक्रवार (6 फरवरी) को जारी किए गए कार्यकारी आदेश पर प्रतिक्रिया देने के बजाय भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में दर्ज विवरणों का सख्ती से पालन कर रहा है. इस आदेश के जरिए रूस से कच्चे तेल के आयात को लेकर भारत को नए सिरे से वाशिंगटन द्वारा जांच के दायरे में लाया गया है. आदेश में कहा गया है कि भारत ने रूसी तेल के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आयात को रोकने पर सहमति जताई है और इसके अनुपालन की निगरानी के लिए अमेरिका एक व्यवस्था बनाएगा.
शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय विदेश मामलों की स्थायी समिति ने अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ हाल में हुए व्यापार समझौतों की समीक्षा के लिए साढ़े तीन घंटे तक बैठक की. इन बैठक में इन समझौतों के कृषि, कपड़ा और ऊर्जा क्षेत्रों पर संभावित असर को लेकर चिंताएं जताई गईं.
मिस्री ने कहा कि ‘बदले हुए वैश्विक परिदृश्य’ को देखते हुए अमेरिका के साथ हुआ व्यापार समझौता भारत के लिए सबसे बेहतर संभव परिणाम है. उन्होंने सांसदों को यह भी आश्वासन दिया कि इस समझौते में किसानों के हितों की रक्षा की जाएगी और उनसे कोई समझौता नहीं होगा.
अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर के सामान खरीदने की अमेरिकी अपेक्षा पर सवाल किए जाने पर विदेश सचिव ने कहा कि यह कोई ‘बाध्यकारी’ शर्त नहीं है, बल्कि महज मंशा को दर्शाने के लिए है.
मिस्री ने भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के लागू होने की कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं बताई.
बैठक के दौरान समिति ने यह भी स्पष्ट करने को कहा कि बांग्लादेश को दी जा रही अमेरिकी व्यापार रियायतें किस तरह भारतीय कपास की खेती करने वाले किसानों को नुकसान पहुंचा सकती हैं. समिति ने इस ओर ध्यान दिलाया कि बांग्लादेश भारतीय कपास का बड़ा आयातक है और बदली हुई व्यापार व्यवस्थाओं के तहत अमेरिका भारत की जगह आपूर्तिकर्ता बन सकता है.
