पांच साल में सड़क के गड्ढों ने लीं 9,438 जानें, उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा मौतें: परिवहन मंत्रालय

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच गड्ढों से जुड़े सड़क हादसों में 9,438 लोगों की मौत हुई. इनमें आधी से अधिक मौतें उत्तर प्रदेश में दर्ज की गईं, जबकि कई अन्य बड़े राज्यों में एक भी ऐसा मामला दर्ज नहीं किया गया.

इन पांच वर्षों में कुल 23,056 सड़क हादसे गड्ढों के कारण हुए. (फाइल फोटो/पीटीआई)

नई दिल्ली: पिछले पांच वर्षों (2020–2024) में गड्ढों (पॉटहोल्स) से जुड़े सड़क हादसों में मौतों का ग्राफ लगातार ऊपर की तरफ बढ़ रहा है.

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की ओर से गुरुवार (12 फरवरी) को लोकसभा में पेश ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, 2020 के बाद गड्ढों से होने वाली मौतों में 53 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है.

आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से 2024 के बीच 9,438 लोगों की जान गई. इनमें अकेले उत्तर प्रदेश में 5,127 मौतें दर्ज की गईं, जो कुल मौतों के आधे से भी ज़्यादा हैं.

वहीं आंध्र प्रदेश, बिहार, गोवा और चंडीगढ़ समेत आधा दर्जन से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस श्रेणी में एक भी हादसा, चोट या मौत दर्ज नहीं की गई, जिससे पुलिस द्वारा डेटा दर्ज करने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, गड्ढों से जुड़े हादसों, मौतों और घायलों पर एक विस्तृत जवाब में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि कुल मौतों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है. कोविड वर्ष 2020 में जहां यह आंकड़ा 1,555 था, वहीं 2024 में यह बढ़कर 2,385 हो गया यानी करीब 53 प्रतिशत की वृद्धि.

आंकड़ों के अनुसार, इन पांच वर्षों में मध्य प्रदेश में गड्ढों से जुड़ी मौतों की संख्या 969 रही, जो उत्तर प्रदेश के बाद सबसे अधिक है. इसके बाद तमिलनाडु (612), ओडिशा (425), पंजाब (414) और असम (395) का स्थान है. केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली में सबसे ज़्यादा 50 मौतें दर्ज की गईं.

2025 के सड़क हादसों से जुड़े आंकड़े अभी जारी नहीं किए गए हैं.

सड़क हादसों के डेटा पर काम कर चुके एक विशेषज्ञ ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा है, ‘यह हैरान करने वाला है कि मणिपुर, नगालैंड और त्रिपुरा जैसे छोटे राज्यों में गड्ढों के कारण हादसे और मौतें दर्ज हुई हैं, लेकिन आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में, जहां सड़क नेटवर्क कहीं ज़्यादा लंबा है, एक भी ऐसा मामला दर्ज नहीं किया गया. जब तक सड़क हादसों और उनके कारणों की निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग नहीं होगी, तब तक सुधारात्मक कदमों के लिए सही तस्वीर सामने नहीं आ पाएगी.’

परिवहन मंत्रालय की ओर से प्रकाशित रिपोर्टों से यह भी पता चलता है कि 2017 के बाद गड्ढों से होने वाली मौतों में गिरावट आई थी. उस साल ऐसे हादसों में 3,597 लोगों की मौत दर्ज की गई थी. इसी को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में एक समाचार रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए अधिकारियों को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए थे.

उस समय शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की थी कि यह ‘सामान्य जानकारी की बात है कि सड़कों पर गड्ढों के कारण बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है और जिन पर सड़कों के रखरखाव की ज़िम्मेदारी है, वे अपने कर्तव्यों का ठीक से पालन नहीं कर रहे हैं.’

हाल में दिल्ली बना था गवाह

दिल्ली में हाल में सामने आया कमल ध्यानी का मामला इस संकट की भयावहता को ज़मीनी स्तर पर उजागर करता है. 25 वर्षीय कमल ध्यानी, जो रोहिणी से काम खत्म कर घर लौट रहे थे, जनकपुरी इलाके में दिल्ली जल बोर्ड के काम के लिए खोदे गए करीब 15 फुट गहरे खुले गड्ढे में गिर गए, जिससे उनकी मौत हो गई.

इस मामले में घटनास्थल पर न तो बैरिकेडिंग थी और न ही कोई चेतावनी संकेत. इस मामले में शुरुआती जांच के बाद दिल्ली जल बोर्ड के तीन अधिकारियों को निलंबित किया गया है और दिल्ली सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं.