निखिल गुप्ता ने दोष स्वीकार लिया, अब पूर्व रॉ अधिकारी विकास यादव का क्या होगा?

निखिल गुप्ता की दोष स्वीकारोक्ति के बाद अमेरिका में सिख अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश का मामला मजबूत हुआ है. अदालत में दर्ज बयानों से विकास यादव पर कानूनी दबाव बढ़ सकता है. उनके खिलाफ अमेरिकी वारंट और रेड नोटिस जारी है, जबकि प्रत्यर्पण को लेकर भारत-अमेरिका संबंधों पर नजरें टिकी हैं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: निखिल गुप्ता द्वारा 13 फरवरी 2026 को दोष स्वीकार किए जाने के बाद अमेरिका में चल रहा मामला एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है. अब यह केवल आरोपों का मामला नहीं रह गया, बल्कि अमेरिकी अदालत में दर्ज स्वीकारोक्ति के आधार पर अमेरिका की जमीन पर एक नागरिक की हत्या की साजिश का न्यायिक रूप से स्थापित प्रकरण बन गया है.

न्यूयॉर्क के साउदर्न डिस्ट्रिक्ट की अमेरिकी जिला अदालत (एसडीएनवाई) के बयान के अनुसार, गुप्ता ने ‘भारत सरकार के एक कर्मचारी के निर्देश पर’ काम किया था. गुप्ता की अदालत में दर्ज स्वीकारोक्ति अब अभियोजन पक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है, खासकर उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई में, जिन पर साजिश से जुड़े होने का आरोप है.

मीडिया रिपोर्टों में ‘सीसी-1’ की पहचान भारतीय अधिकारी विकास यादव के रूप में की गई है. बताया जाता है कि वह भारत की सरकारी संरचना में खुफिया जिम्मेदारियों से जुड़े एक वरिष्ठ फील्ड अधिकारी रहे हैं.

यादव की कानूनी स्थिति

जहां गुप्ता ने अदालत में दोष स्वीकार कर लिया है, वहीं विकास यादव अमेरिकी न्याय प्रणाली की नजर में अब भी वांछित आरोपी हैं. उन पर तीन आरोप हैं-मर्डर-फॉर-हायर, हत्या की साजिश और मनी लॉन्ड्रिंग की साजिश.

अक्टूबर 2024 में एसडीएनवाई की अदालत ने उनके खिलाफ संघीय गिरफ्तारी वारंट जारी किया था. वह एफबीआई की ‘मोस्ट वांटेड’ सूची में भी शामिल हैं. फिलहाल मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक वह भारत में हैं.

गुप्ता की स्वीकारोक्ति का असर

गुप्ता द्वारा दोष स्वीकार करने के बाद उन्होंने मुकदमे का अधिकार छोड़ दिया है. अमेरिकी कानूनी व्यवस्था में यह अक्सर संभावित सहयोग समझौते की ओर संकेत करता है, जिसमें आरोपी सजा में रियायत के बदले अन्य आरोपियों के खिलाफ जानकारी देता है.

यदि गुप्ता ने ऐसे संदेश, दस्तावेज या गवाही साझा की है जो सीधे तौर पर यादव को साजिश से जोड़ते हों, तो अमेरिकी अभियोजन पक्ष के पास उनके खिलाफ मजबूत आधार हो सकता है. भविष्य में यदि मुकदमा चलता है, तो गुप्ता की अदालत में दर्ज स्वीकारोक्ति और संचार को सह-साजिशकर्ता के बयान के रूप में पेश किया जा सकता है. इससे यादव पर कानूनी दबाव और बढ़ सकता है.

यात्रा और गिरफ्तारी का खतरा

यादव के खिलाफ न केवल अमेरिकी वारंट जारी है, बल्कि उनके नाम पर इंटरपोल का रेड नोटिस भी है. इसका मतलब है कि यदि वे इंटरपोल के सदस्य देशों-खासकर अमेरिका के साथ प्रत्यर्पण संधि रखने वाले देशों जैसे यूनाइटेड किंगडम, कनाडा या यूरोपीय संघ के देशों-की यात्रा करते हैं, तो गिरफ्तारी की आशंका बनी रहेगी.

इस तरह यह मामला उनके लिए दीर्घकालिक यात्रा प्रतिबंध जैसा बन सकता है.

क्या अमेरिका मुकदमा चला सकता है?

अमेरिकी न्याय विभाग ने पहले ही यादव के खिलाफ अभियोग दायर कर रखा है और उन्हें आरोपित फरार माना है. यदि वे गिरफ्तार होते हैं, तो अमेरिका उन पर मुकदमा चलाने के लिए तैयार है. हालांकि, संघीय आपराधिक मामलों में आम तौर पर आरोपी की अनुपस्थिति में सुनवाई नहीं होती. यानी सजा सुनाने के लिए उनकी शारीरिक मौजूदगी जरूरी होगी.

प्रत्यर्पण की कानूनी स्थिति

भारत और अमेरिका के बीच 1997 की प्रत्यर्पण संधि लागू है. सैद्धांतिक रूप से, यादव पर लगे आरोप-किराए पर हत्या, हत्या की साजिश और मनी लॉन्ड्रिंग-प्रत्यर्पण योग्य अपराध की श्रेणी में आते हैं.

हालांकि, अभी तक गुप्ता की स्वीकारोक्ति के बाद अमेरिका की ओर से किसी नए औपचारिक प्रत्यर्पण अनुरोध की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई है.

क्या भारत प्रत्यर्पण करेगा?

व्यवहारिक दृष्टि से भारत द्वारा यादव को अमेरिका को सौंपे जाने की संभावना कम मानी जा रही है. भारत ने यह जानकारी दी है कि यादव अब सरकारी सेवा में नहीं हैं, जिससे ‘संप्रभु प्रतिरक्षा’ का तर्क कमजोर पड़ता है.

फिर भी, प्रत्यर्पण से इनकार के कुछ कानूनी आधार मौजूद हैं. संधि के अनुच्छेद 6 के तहत, यदि किसी व्यक्ति पर उसी अपराध में भारत में मुकदमा चल रहा हो या वह किसी अन्य अपराध में हिरासत में हो, तो भारत प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है.

रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने यादव के खिलाफ जबरन वसूली का मामला दर्ज किया है. यदि भारत में उनके खिलाफ घरेलू कानून के तहत कार्रवाई चलती है या उन्हें न्यायिक हिरासत में रखा जाता है, तो भारत कानूनी रूप से उन्हें अमेरिका को सौंपे बिना भी संधि की शर्तों का पालन करने का दावा कर सकता है.

निखिल गुप्ता की दोष स्वीकारोक्ति ने अमेरिकी मामले को मजबूत आधार दिया है. इससे विकास यादव पर कानूनी और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है. हालांकि, प्रत्यर्पण का सवाल अब कानूनी दायरे से आगे बढ़कर भारत-अमेरिका संबंधों और राजनीतिक निर्णयों से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है.