अमर्त्य सेन ने देश में कमज़ोर होती धर्मनिरपेक्षता को लेकर चेताया- संगठित रूप से संकीर्णता थोपी जा रही है

अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने केरल राज्य योजना बोर्ड द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि भारत में धर्मनिरपेक्षता की अजयेता को लेकर उनका विश्वास कमज़ोर पड़ा है. धर्मनिरपेक्षता का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या हम इस देश पर संगठित रूप से थोपी जा रही संकीर्णता का प्रतिरोध कर पाते हैं.

अमर्त्य सेन. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: प्रख्यात अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने रविवार (15 फरवरी) को कहा कि भारत में धर्मनिरपेक्षता की अजेयता को लेकर उनका विश्वास अब पहले जैसा मजबूत नहीं रहा है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रो. सेन केरल राज्य योजना बोर्ड द्वारा आयोजित तीन दिवसीय ‘विजन 2031: विकास और लोकतंत्र पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन’ के उद्घाटन सत्र को ऑनलाइन संबोधित कर रहे थे.

सेन ने कहा, ‘जैसे-जैसे मैं उम्रदराज़ हुआ, मैंने खुद से पूछा कि क्या मैं उन आदर्शों पर कायम रह पाया हूं जिन्हें मैंने युवावस्था में दृढ़ता से अपनाया था. मुझे लगता है कि सभी पर नहीं. मुझे स्वीकार करना होगा कि भारत में धर्मनिरपेक्षता की अजयेता को लेकर मेरा विश्वास कमजोर पड़ा है. धर्मनिरपेक्षता का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या हम इस देश पर संगठित रूप से थोपी जा रही संकीर्णता का प्रतिरोध कर पाते हैं.’

केरल विकास मॉडल को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सेन ने मानव विकास सूचकांकों में राज्य की उपलब्धियों की सराहना की.

उन्होंने कहा कि मानव विकास को लेकर उनकी आशावादी अपेक्षाएं गलत साबित नहीं हुईं. उन्होंने कहा, ‘हालात वैसे ही रहे जैसा मैंने उम्मीद की थी. लेकिन मुझे और अधिक खुशी होती यदि हम इसके साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता की सुरक्षा और उसे आगे बढ़ाने में भी सफल होते, जो केरल में तो मजबूत बनी रही है, लेकिन भारत में कमजोर हुई है. हमें देखना होगा कि क्या केरल पूरे भारत के लिए कोई निर्णायक योगदान दे सकता है.’

1956 में केरल राज्य के गठन और उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों, जिसमें कम्युनिस्टों को राज्य में सत्ता मिली थी, को याद करते हुए सेन – जो उन दिनों कोलकाता में थे – ने कहा कि संशयवादी लोग उन्हें समझाते थे कि भारत के सबसे गरीब राज्यों में से एक होने के कारण केरल के पास मानव विकास पर खर्च करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.

उन्होंने कहा कि आज केरल प्रति व्यक्ति आय, गरीबी उन्मूलन, बुनियादी शिक्षा और जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कर चुका है.

द हिंदू के मुताबिक, प्रो. सेन ने विश्व के प्रति केरल की ऐतिहासिक उदारता और खुलेपन की ओर भी ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा कि बाहरी विचारों को ग्रहण करने की यही प्रवृत्ति प्राचीन भारत की महान बौद्धिक उपलब्धियों की आधारशिला थी. उदाहरण देते हुए उन्होंने प्राचीन भारतीय गणित पर यूनानी और बेबीलोनियाई गणित के प्रभाव का उल्लेख किया.

इतिहासकार रोमिला थापर, जिन्होंने भी कार्यक्रम में भाग लिया, ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि शिक्षा के क्षेत्र में आगे के विकास का मार्ग केरल ही दिखाएगा.

उन्होंने कहा कि केरल ने साक्षरता और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है. थापर ने कहा, ‘यहां साक्षरता लगभग सार्वभौमिक है और शैक्षिक कार्यक्रम केवल पढ़ने-लिखने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उस दुनिया को समझने पर भी केंद्रित हैं जिसमें हम रहते हैं. यह अत्यंत सराहनीय है.’