नई दिल्ली: ‘देश में सभी मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे जब उसी धर्म के लोगों द्वारा प्रबंधित किए जाते हैं, तो महाबोधि महाविहार, जो विश्व प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थस्थल है, इसके प्रबंधन का पूर्ण अधिकार बौद्ध भिक्षुओं के हाथों में क्यों नहीं है.’
ये बातें महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन से जुड़े भंते विनाचार्य ने द वायर से फोन पर बातचीत में कहीं. वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर 12 फरवरी को हुए बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 को ख़त्म करने की मांग को लेकर हुए विशाल प्रदर्शन का हिस्सा थे.
मालूम हो कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए इस प्रदर्शन में देश के कई राज्यों से आए बुद्ध के अनुयायी शामिल हुए थे. इनके हाथों में गौतम बुद्ध और बीआर आंबेडकर की तस्वीरें थी. कुछ के हाथों में तख्तियां थी, जिस पर लिखा था, ‘रिपील बीटी एक्ट 1949’; ‘ऑल मेंबर्स ऑफ बीटीएमसी शुड बी बुद्धिस्ट’. हिंदी में इसका अर्थ है, ‘बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 खत्म हो’; ‘बीटीएमसी के सभी सदस्य बौद्ध हों.’
उल्लेखनीय है कि बीटी एक्ट बिहार सरकार द्वारा बोधगया स्थित विश्व प्रसिद्ध महाबोधि मंदिर के प्रबंधन और प्रशासन के लिए बनाया गया एक कानून है. यह एक्ट बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति (बीटीएमसी) का गठन करता है, जिसमें बौद्धों के साथ-साथ हिंदू धर्मावलंबियों को सदस्य बनाने का प्रावधान है. बौद्ध भिक्षु लंबे समय से इस प्रावधान का विरोध कर रहे हैं.
बीते साल फरवरी 2025 में भी इसे लेकर बिहार के गया में एक बड़ा आंदोलन देखने को मिला था.

2025 का आंदोलन और भंते विनाचार्य की गिरफ्तारी
2025 के आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए भंते विनाचार्य बताते हैं, ‘पिछले साल 12 फरवरी को बौद्ध भिक्षुओं ने महाबोधि मंदिर के पास अपना प्रदर्शन शुरू किया था. इसके बाद धीरे-धीरे अन्य राज्यों के लोग भी इससे जुड़े और इसके बारे में जागरूकता का प्रसार किया गया कि यदि बीटीएमसी हिंदू मुक्त होगी, तो इसमें क्या-क्या सुविधाएं मिल सकती हैं और कैसे ये महाबोधि के हित में होगा. इसके बाद ये आंदोलन देश के अन्य हिस्सों में फैल गया, रैलियां निकाली गईं और प्रदर्शन हुए.’
वे आगे कहते हैं कि कई महीने चले इस आंदोलन को मई में भारत-पाकिस्तान संघर्ष की आड़ में प्रशासन ने दबाने की कोशिश की. इसके अलावा 12 मई 2025 को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर वहां राज्यपाल से शिवलिंग पूजा करवाई गई, ताकि हम लोग आक्रोशित हो जाए. 13 फरवरी 2025 को महाराष्ट्र से आए कुछ लोगों के ऊपर हमला किया गया और महाबोधि परिसर के अंदर जय श्री राम और जय हनुमान के नारे लगाए गए.
भंते विनाचार्य के अनुसार, उन्हें जान की खतरा का हवाला देते हुए पुलिस थाने ले गई और उन पर तीन झूठे मुकदमे दर्ज किए गए. बाद में जब 68 दिनों बाद जेल से बाहर आए, तो उन्होंने अन्य लोगों के साथ यह संकल्प लिया कि इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाएंगे.
इसके बाद उन्होंने और अन्य बौद्ध भिक्षुओं ने महाराष्ट्र, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में यात्राएं कीं और 12 फरवरी 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की घोषणा की गई.
वे आग बताते हैं, ‘हमारे प्रयास का फिलहाल यही परिणाम है कि बिहार के मुख्यमंत्री ने 23 फरवरी को हमें मिलने का समय दिया है, इसके बाद देखते हैं इसका क्या नतीजा होता है और उसी के आधार पर हमारे आगे की रणनीति तय होगी.’
भंते विनाचार्या के अनुसार देश के अलावा विदेशों में भी जो लोग बुद्ध को मानने वाले हैं, जिन देशों के मठ महाबोधि में स्थित हैं, उन सबका समर्थन इस आंदोलन को मिल रहा है.

महाबोधि को मिलने वाले भारी-भरकम दान का ‘दुरुपयोग’
ज्ञात हो कि बोधगया मंदिर इस धर्म के मानने वालों के लिए सबसे पवित्र बौद्ध स्थल है और जहां साल भर हज़ारों अंतरराष्ट्रीय आगंतुक और तीर्थयात्री आते हैं.
गया में स्थित के दशरथ मांझी शिक्षण संस्थान के सचिव पिंटू मांझी बताते हैं कि 1948 में बोधगया मंदिर विधेयक बिहार विधानसभा में लाया गया था, जो 1949 में अस्तित्व में आया. इसके बाद 28 मई 1953 को पहली मंदिर समिति ने अपना काम संभाला था.
इस अधिनियम के लागू होने के बाद से राज्य सरकार एक समिति का गठन करती है. इस समिति को मंदिर की भूमि और उससे जुड़ी संपत्तियों का प्रबंधन और नियंत्रण सौंपा जाता है. इस समिति में एक अध्यक्ष और आठ सदस्य होते हैं, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा नामित किया जाता है.
सदस्यों के लिए यह अनिवार्यता है कि वे भारतीय नागरिक होने चाहिए. इनमें से चार सदस्य बौद्ध धर्म के होते हैं और चार हिंदू धर्म के, जिनमें महंत (मुख्य पुजारी) भी शामिल होते हैं. यदि महंत नाबालिग हैं, मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं या समिति में शामिल नहीं होना चाहते, तो उनकी जगह किसी अन्य हिंदू सदस्य को नामित किया जाता है.
वर्तमान में बीटीएमसी की सचिव महाश्वेता महारथी हैं. वहीं, सदस्य के तौर पर धम्माधीरू, टी. ओकोनोगी, किरन लामा, अरविंद कुमार सिंह और मिथुन मांझी हैं. बोधगया मठ के महंत के लिए आरक्षित पद फिलहाल आंतरिक विवादों के चलते खाली पड़ा है. सदस्यों से इतर यहां एक पुजारी का पद भी है, जिस पर मौजूदा समय में संजय मिश्रा काबिज हैं.
इसके अलावा गया जिले के जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) समिति के स्वत: अध्यक्ष (ex-officio Chairman) होते हैं. पहले यदि जिला मजिस्ट्रेट हिंदू नहीं हैं, तो उस अवधि के लिए राज्य सरकार किसी हिंदू को अध्यक्ष के रूप में नामित करती थी. हालांकि, बाद में साल 2013 में राज्य सरकार ने बीटी एक्ट में संशोधन करते हुए डीएम के ‘हिंदू’ होने की बाध्यता को समाप्त कर दिया.
बीटीएमसी के पूर्व सदस्य, पहले बौद्ध सचिव और अखिल भारतीय बौद्ध मंच (एआईबीएफ) के मुख्य सलाहकार भदंत प्रज्ञाशील महाथेरो बताते हैं कि समिति के सदस्योंं का कार्यकाल तीन साल का होता है, जिसे शासन-प्रशासन (सरकार और डीएम) की मर्जी से आगे बढ़ाया जा सकता है. हर तीन महीने में एक बार सदस्यों की मीटिंग बुलाई जाती है, जिसमें सभी मामलों के आखिरी कर्ताधर्ता डीएम ही होते हैं.
भदंत प्रज्ञाशील बताते हैं कि वे 1998 से 2001 तक कमेटी के सदस्य थे और इस दौरान उन्हें जो एक बात सबस अधिक खटकती थी, वो महाबोधि परिसर और इसे देश-विदेश से मिलने वाले भारी चंदे के प्रबंधन से जुड़ी हुई थी.
वे कहते हैं, ‘महाबोधि को भारी-भरकम चंदा और दान मिलता है, लेकिन इसे परिसर की देख-रेख या सुविधाओं के विस्तार के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता. न तो इस चंदे से कोई अस्पताल, न कोई स्कूल, न कोई सुविधा केंद्र कुछ भी संचालित नहीं होते. ये न तो परिसर और न ही भिक्षुओं की सुविधाओं के विस्तार के लिए इस्तेमाल होता है. इसे आमतौर पर यह परिसर के अंदर काम करने वाले लोगों को पारिश्रमिक देने और इस तीर्थस्थल पर वीआईपी लोगों के आने-जाने के स्वागत-सत्कार के खर्चे के तौर पर ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है.’
चंदे के ऑडिट के संबंध में पूछे जाने पर भदंत प्रज्ञाशील बताते हैं कि इसका हर साल ऑडिट होता है, जिसकी रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाती है, लेकिन इसमें क्या होता है और क्या नहीं, ये सिर्फ सर्वेसर्वा डीएम ही जानते हैं और प्रक्रिया उन्हीं के हिसाब से चलती है.
भदंत प्रज्ञाशील आगे जोड़ते हैं, ‘यह तो सर्वविदित है कि बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे भगवान बौद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था. यह स्थान इसी बात के लिए विश्व प्रसिद्ध है. फिर यहां किसी और देवी-देवता के अस्तित्व का कोई सवाल कहां से आता है? यदि मस्जिद को मुसलमान चलाते हैं, मंदिर को हिंदू, गुरुद्वारे को सिख, तो ऐसे में महाबोधि परिसर में हिंदुओं का कब्जा क्यों है. संसार में किसी भी धार्मिक स्थल पर दूसरे धर्म का नियंत्रण नहीं है.’
ये पूछे जाने पर कि क्या कमेटी के अंदर कभी किसी मामले पर विवाद हुआ है, इसके जवाब में भदंत प्रज्ञाशील कहते हैं कि विवाद तो अक्सर ही देखने को मिलता है. डीएम द्वारा तीन महीने में एक बार सभी सदस्यों की मीटिंग बुलाई जाती है, जिसमें विवाद आम बात है.

‘बौद्धों और हिंदुओं की साझी विरासत’
बीटीएमसी के एक मौजूदा हिंदू सदस्य नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि बीटीएमसी में जो हिंदुओं को रखा गया है, इसकी मुख्य वजह यही है कि यह जगह बौद्धों और हिंदुओं की साझी विरासत है. इसी आधार पर बीटीएमसी में हिंदुओं को शामिल किया गया था.
उक्त सदस्य बताते हैं, ‘इस अधिनियम के बनने के बाद भी यह मंदिर बौद्धों को नहीं दिया था. लेकिन, बाद में मठ और बौद्धों के बीच एक समझौता हुआ और 1953 में मंदिर को बौद्धों को दे दिया गया. इससे पहले इस परिसर को बोधगया मठ के द्वारा ही प्रबंधित किया जाता था. इसलिए बीटीएमसी में एक पद बोधगया मठ के महंत के लिए आरक्षित है. यहां हिंदूओं की भी आस्था है. यहां महाबोधि मंदिर में कई परिवारों द्वारा पिंडदान भी करवाया जाता है. यहां शिवलिंग है, जिसकी पूजा-अर्चना होती है. आप ये अधिकार किसी से कैसे छीन सकते हैं.’
बीटी एक्ट के ख़िलाफ़ प्रदर्शन को लेकर उक्त हिंदू सदस्य कहते हैं, ‘प्रदर्शन केवल अव्यवस्था और कुछ लोगों के अपने निजी हितों को साधने के लिए किया जा रहा है. यहां हिंदू और बौद्ध धर्म के लोग दशकों से साथ में शांति से पूजा-अर्चना करते आए हैं. सबकी अपनी आस्था है और उसका सम्मान भी होना चाहिए.’
हालांकि, बौद्ध अनुयायी इस बात का खंडन करते रहे हैं कि यहां कोई शिवलिंग है. ज्यादातर लोगों का कहना है कि गर्भगृह में बुद्ध की प्रतिमा के सामने जिसे शिवलिंग बताया जाता है, वह असल में दीपक प्रज्जवलित करने का एक स्थान था. कई लोग इसे एक प्राचिन आकृति भी बताते हैं.
इस संबंध में भदंत प्रज्ञाशील बताते हैं, ‘यहां कोई शिवलिंग नहीं है, जिसे शिवलिंग बताया जाता है, वह बुद्ध की प्रतिमा के सामने ज्याति प्रकाशित करने का स्थान था, जो धीरे-धीरे रगड़न के चलते समय के साथ अपने असल आकार से बदल कर शिवलिंग जैसा दिखने लगा. ये बहुत ही स्वभाविक है.’
इस संबंध में संविधान सुरक्षा संघर्ष समिति, सनातन धम्म प्रबुद्ध भारत मिशन से जुड़े डॉ.विलास खरात बताते हैं कि यहां के एक ओटी स्तूप को ही हिंदुओं द्वारा रगड़कर शिवलिंग में परिवर्तित कर दिया गया है. यहां बुद्ध स्तूपों और प्रतिमाओं को ही शिवलिंग और महाभारत के पांच पांडवों से जोड़ा जाता है.
विलास खरात कई कोर्ट मामलों और पुरातत्व विभाग की जानकारियों का हवाला देते हुए कहते हैं कि यहां यह दावे के साथ कहा जाता सकता है कि किसी भी हिंदू देवी-देवता की कोई मूर्ती, कुछ नहीं है. ये सब सिर्फ शासन- प्रशासन द्वारा इन स्थान को छीनने की कोशिश है.
वे 1922 कांग्रेस अधिवेशन का हवाला देते हुए कहते हैं कि इस स्थान को आज़ादी के बाद पूर्ण रूप से बौद्ध अनुयायियों को सौंपने की बात स्वंय महात्मा गांधी ने कही थी. लेकिन जब बीटी एक्ट बना तो सरकार ने चालाकी से इस पर गैर कानूनी हिंदू कब्ज़े को वैध करार देते हुए हिंदू सदस्यों को इसमें शामिल कर लिया गया. इसके अलावा बीटीएमसी के अलावा एक और छुपी कमेटी महाबोधि परिसर में काम करती है, जिसमें पुजारी और अन्य 38 लोग शामिल हैं, जो मंदिर में घंटा बजाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं और बाहर लोगों को भ्रमित करते हैं कि यह एक शिव मंदिर है.
विलास खरात के मुताबिक, ऐतिहासिक तौर पर छठी शताब्दी में हिंदू राजा शंशाक ने बोधि वृक्ष को जलाकर नष्ट करने की कोशिश की थी. ऐतिहासिक स्रोतों ह्वेनसांग के अनुसार, यहीं से महाबोधि मंदिर से भगवान बुद्ध की प्रतिमा को हटाने और उसके स्थान पर भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित करने का प्रयास किया गया. लेकिन आज के समय की बात करें, तो बिहार के पूर्व राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने वहां जाकर खुलेतौर पर ये कहा कि ये शिवमंदिर है. इसके बाद आरिफ मोहम्मद खान ने वहां के कथित शिवलिंग की पूजा की. ये सब आरएसएस की राजनीति है, जो सरकार और प्रशासन के जरिए इस ऐतिहासिक स्थान पर कब्जा चाहती है.
बोध गया मुक्ति आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता रामजी पाल चरवाहा उर्फ कमल उसरी बताते हैं कि गया हिंदुओं के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां देशभर से लोग पिंडदान के लिए आते हैं. लेकिन यह समझना जरूरी है कि यहां पिंडदान की वास्तविक जगह विष्णुपद मंदिर है, जो महाबोधि से करीब 30 किलोमीटर दूर है. लेकिन क्योंकि अब महाबोधि पर भी हिंदुओं को अपना कब्जा रखना है, इसलिए बीते कुछ सालों में यहां पिंडदान भी शुरू कर दिया गया. लोगों में यह भ्रम फैलाया गया कि बुद्ध विष्णु के अवतार हैं. इसलिए लोग बुद्ध की भी पूजा और आरती करने लगे हैं, जो उनकी वास्तविक शिक्षाओं के उलट है.
भंते विनाचार्य भी कहते हैं कि शासन-प्रशासन खुद इस पूजा-पाठ को बढ़ावा दे रहा है. इसका उदाहरण बीते साल बुद्ध पुर्णिमा, जो एक अंतरराष्ट्रीय महत्व वाला दिन है, यहां महाबोधि परिसर में राज्यपाल द्वारा शिवलिंग की पूजा-पाठ करवाई गई.
इस संबंध में लगभग सभी बौद्ध अनुयायी अनागरिक धम्मपाल, भंते नागार्जुन आर्य सुरई ससाई और चीनी यात्री ह्वेनत्सांग की यात्रा के दौरान लिखे लेखों का हवाला देते हैं, जिसमें यहां किसी शिवलिंग का कोई जिक्र नहीं किया गया था.

बीटीएमसी में हिंदू सदस्यों की मौजूदगी का विरोध
पिंटू मांझी के अनुसार, हिंदू सदस्यों की मौजूदगी का बौद्ध धर्मावलंबी ऐतिहासिक तौर पर लगातार विरोध करते रहे हैं. श्रीलंका के अनागरिक धम्मपाल, जिनका दक्षिण एशिया में बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान में विशेष योगदान माना जाता है, ने 1891 में अपनी भारत यात्रा के दौरान पहली बार महाबोधि मंदिर पर बौद्धों के अधिकार की मांग उठाई थी. उस समय बौद्ध धर्म के इस मंदिर पर बिहार के गया में ही स्थित बोधगया मठ का अधिकार था.
इसके बाद 1922 में गया में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ. इस दौरान बौद्ध भिक्षुओं के एक शिष्टमंडल द्वारा महाबोधि मंदिर के बौद्धों के अधिकार का मुद्दा उठाया गया. फिर कई दशकों बाद 1992 में यह आंदोलन एक बार फिर खड़ा हुआ और ‘धम्म मुक्ति यात्रा’ बंबई से महाबोधि मंदिर तक निकाली गई. इसके बाद बीच में आंदोलन शांत हुआ और बीते साल फिर से ये आंदोलन उठा, जो अब तक किसी न किसी रूप में जारी है.
सामाजिक कार्यकर्ता कमल उसरी इस संबंध में बताते हैं कि यह आंदोलन बुद्ध से जुड़ा हुआ है, जो पूरी दुनिया में शांति के प्रतीक हैं और इसलिए इस आंदोलन की गति भी धीमी है, क्योंकि इसका मकसद लोगों को शांति और प्रेम से बुद्ध के विचारों और महाबोधि के मंदिर कानून की जानकारी देना है. आंदोलन का बहुत ही सीधा और साफ उद्देश्य है कि बीटीएमसी एक्ट को खत्म किया जाए.

कमल आगे कहते हैं कि इस पूरे विवाद का एक पक्ष बोधगया मठ है. बीटीएमसी में जो हिंदू सदस्य होते हैं, उनमें एक पद बोधगया मठ के महंत के लिए आरक्षित होता है. मौजूदा समय में बौद्ध भिक्षुओं और ब्राह्मण पंडितों दोनों की उपस्थिति मंदिर परिसर में बनी हुई है और यही पूरे विवाद की जड़ है. बौद्ध अनुयायियों का मानना है कि एक्ट संविधान लिखने से पहले बना था और यह बाबा साहेब के संविधान के हिसाब से होना चाहिए. महाबोधि मंदिर बौद्ध भिक्षुओं को मिलना चाहिए.
वे आगे बताते हैं कि साल 2002 में यूनेस्को ने महाबोधि को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया लेकिन यहां यूनेस्को के दिशानिर्देशों पर काम नहीं किया गया. महाबोधि परिसर के आसपास अलग-अलग देशों के कुल 63 मठ (मोनेस्ट्री) हैं. ऐसे में इस स्थान का महत्व और बढ़ जाता है. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कहीं बाहर जाते हैं तो कहते हैं कि हम बुद्ध के देश से आए हैं, लेकिन यहां बौद्ध धर्मावलंबी ही अपने मंदिर पर अधिकार के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. सरकार और ब्राह्मणों को अपना दिल बड़ा करके महाबोधि परिसर को बौद्ध भिक्षुओं को सौंप देना चाहिए, क्योंकि पूरी दुनिया में यह स्थान हिंदू नहीं बौद्ध तीर्थस्थल के तौर पर प्रसिद्ध है.
(द वायर ने इस संबंध में गया ज़िले के डीएम और बिहार के गृह मंत्रालय से भी उनका पक्ष जानने के लिए सवाल भेजे हैं. जवाब प्राप्त होने के बाद ख़बर अपडेट की जाएगी.)
