नई दिल्ली: 14 फरवरी, 2026 को दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में सुरुचि प्रकाशन से प्रकाशित विश्व हिंदू परिषद (इंद्रप्रस्थ) के पूर्व अध्यक्ष राजेश्वर की पुस्तक ‘घर वापसी – क्यों और कैसे’ का विमोचन हुआ. कार्यक्रम में करीब 250 लोग मौजूद रहे, जिनमें संघ और विहिप के कई पदाधिकारी शामिल थे.
कार्यक्रम के पहले जारी पोस्टर के अनुसार, कार्यक्रम में विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के धर्म जागरण समन्वय विभाग के अखिल भारतीय सह प्रमुख अरुण कांत और दिल्ली सरकार के कानून मंत्री कपिल मिश्रा को शामिल होना था. हालांकि, आयोजन के दिन कपिल मिश्रा मंच पर नजर नहीं आए.
कार्यक्रम का केंद्रबिंदु आलोक कुमार का भाषण रहा, जिसमें उन्होंने ‘घर वापसी’ को वैचारिक संघर्ष बताते हुए इसे संगठित रूप से आगे बढ़ाने की बात कही.
ध्यान रहे कि आरएसएस, विहिप व अन्य हिंदू दक्षिणपंथी संगठन गैर-हिंदुओं खासकर मुसलमानों और ईसाइयों को धर्म परिवर्तन के जरिए हिंदू बनाने को ‘घर वापसी’ कहते हैं.
आलोक कुमार ने कहा कि धर्मांतरण रोकना और घर वापसी को तेज करना विहिप का घोषित लक्ष्य है और इसके लिए देशभर में 850 ब्लॉकों की पहचान की गई है, जहां ‘धर्म रक्षकों’ की नियुक्ति की जा रही है. उनके मुताबिक, बीते वर्ष एक लाख लोगों की ‘घर वापसी’ कराई गई.
‘जो प्रयत्न संघ कर रहा है, परिषद कर रही है, मैं विश्वास करता हूं कि पांच सालों के बाद में गांव के गांव और मोहल्ले के मोहल्ले लौटकर आएंगे.’
अपने भाषण में आलोक कुमार ने कहा कि मुस्लिम शासनकाल में हिंदू महिलाओं और बालिकाओं की सुरक्षा के लिए बाल विवाह, पर्दा प्रथा और अन्य सामाजिक व्यवस्थाएं शुरू हुईं. उनके शब्दों में:
विवाहित लड़कियों को उठाकर ले जाना, कई बार अच्छा नहीं मानते थे, इसलिए बाल विवाह आया. बाल विवाह की तरह ही पर्दा प्रथा आई और रात्रि विवाह भी हिंदू महिलाओं और बालिकाओं को बचाने के प्रयत्न थे.
उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर में धर्मांतरण रोकने के लिए समाज ने कठोर सामाजिक नियम बनाए, जिनमें धर्म छोड़ने वालों को वापस न लेने की नीति भी शामिल थी.
अपने भाषण में आलोक कुमार ने एक ओर जहां मध्यकालीन दौर में बाल विवाह को ‘महिलाओं और बालिकाओं की सुरक्षा’ से जोड़ते हुए उसका बचाव किया, वहीं कुछ ही देर बाद उन्होंने एक काल्पनिक ‘सेकुलर साथी’ के साथ संवाद का उदाहरण देते हुए इस्लाम में कम उम्र के विवाह के प्रसंगों पर सवाल उठाए.
उन्होंने कहा कि संविधान के तहत किसी भी धर्म को पढ़ने और उस पर प्रश्न उठाने की स्वतंत्रता है, लेकिन व्यवहार में इस्लाम से जुड़े मुद्दों पर टिप्पणी करने में संकोच दिखता है. इसी संदर्भ में उन्होंने कहा:
अगर हम पूर्ण आदर के साथ कहें कि किसी भी व्यक्ति को पांच-सात साल की बालिका से विवाह नहीं करना चाहिए, 10-12 साल की बालिका से संबंध नहीं बनाना चाहिए… उस समय के अरब समाज में होता होगा और उस समय ठीक या गलत, ये उस समय की नैतिकता पर निर्भर होता होगा. लेकिन आज, जब हमारे समाज में पुरुष और स्त्री के विवाह की आयु कानून ने तय कर दी है… तो हम कह सकते हैं कि ये उदाहरण आज लागू नहीं होते.
आलोक कुमार ने दावा किया कि ऐसे प्रश्नों पर उनके ‘सेकुलर साथी’ ने स्पष्ट सहमति नहीं दी और चुप हो गए. उनके इस कथन ने कार्यक्रम में ‘घर वापसी’ और धर्मांतरण के मुद्दे को सीधे तौर पर समकालीन धार्मिक और वैचारिक बहस से जोड़ दिया.

आलोक कुमार ने ‘घर वापसी’ को वैचारिक युद्ध करार देते हुए कहा कि अन्य धर्मों को समझना जरूरी है और इस्लाम से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों का उल्लेख किया. उन्होंने दावा किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न पर दोहरे मानदंड अपनाए जाते हैं और हिंदू समाज पर प्रश्न उठाने की छूट है, लेकिन इस्लाम पर टिप्पणी करने पर हिंसक प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं.
इस्लाम के आख़िरी पैगंबर, पैगंबर मोहम्मद पर आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद साल 2022 में भाजपा से निलंबित की गईं पूर्व पार्टी प्रवक्ता नूपुर शर्मा का बचाव करते हुए आलोक कुमार ने कहा:
हमारी एक बहन ने टेलीविजन के किसी डिबेट में ऐसी तीन वास्तविक घटनाओं का उल्लेख कर दिया था, जिसे मुसलमानों के सभी पंथ मानते हैं कि वह (पैगंबर) एक जानवर पर बैठकर अल्लाह से मिलने गए, उन्होंने ऐसा विवाह किया, सब मानते हैं. उसने (नूपुर शर्मा) घटनाएं भी नहीं सुनाई. उसने टिप्पणी भी नहीं की. उसने केवल इन तीन घटनाओं का नाम लिया. तो सारे देश में प्रदर्शन होने लगे कि ‘इसकी एक ही सजा, सर तन से जुदा’.
उन्होंने आगे कहा कि ‘भारत में भारत का कानून चलेगा या शरिया का कानून?’ और चेतावनी दी कि अगर कानून हाथ में लिया गया तो ‘मुकाबला होगा.’
कार्यक्रम में आरएसएस के धर्म जागरण समन्वय विभाग से जुड़े अरुण कांत ने भी ‘घर वापसी’ को ‘पवित्र कार्य’ बताते हुए कहा कि इस दिशा में काम करने वालों के लिए यह पुस्तक ‘कोर्स बुक’ की तरह है. उन्होंने दावा किया कि महाराष्ट्र के 70 गांवों में वंशावली लेखक (पूर्वजों का ब्योरा रखने वाला) को ले जाकर ‘घर वापसी’ का सफल अभियान चलाया गया.
समारोह का समापन पूरे ‘वंदे मातरम’ के गायन के साथ हुआ.
