नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रेप के एक मामले को ‘बलात्कार की कोशिश’ में बदलते हुए एक दोषी व्यक्ति की सज़ा सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दी.
अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर घटना के दौरान पेनिट्रेशन नहीं हुआ तो इसे रेप नहीं, बल्कि रेप की कोशिश माना जाएगा.
लाइव लॉ के मुताबिक, अदालत ने सोमवार (16 फरवरी) को 22 साल पुराने धमतरी जिले के एक बलात्कार मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पुरुष के शिश्न (लिंग) को महिला के जननांग (वजाइना) के ऊपर रखना और फिर बिना प्रवेश (पेनिट्रेशन) के इजैक्युलेट करना (सीमेन गिराना) रेप नहीं है. इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के तहत ‘बलात्कार’ नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह ‘रेप की कोशिश’ है, जिसमें आईपीसी की धारा 376/511 के तहत सज़ा सुनाई जानी चाहिए.
इस मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा, ‘आरोपी की नीयत आपराधिक और स्पष्ट थी, लेकिन पेनिट्रेशन के ठोस प्रमाण न होने से यह अपराध धारा 376 के बजाय धारा 376/511 के अंतर्गत आएगा.’
उल्लेखनीय है कि बलात्कार का यह मामला 22 साल पुराना है. 2004 में धमतरी जिले में एक युवती के साथ बलात्कार किया गया था और 2005 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप का दोषी मानते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी.
इसके बाद आरोपी द्वारा निचली अदालत के फैसले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट चुनौती दी गई थी.
इस मामले में अभियोजन ने कोर्ट में बताया कि महिला को उनके घर से जबरन खींचकर आरोपी अपने घर ले गया था, वहां कपड़े उतारकर उनकी इच्छा के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की गई थी, इतना ही नहीं, पीड़िता को कमरे में बंद कर हाथ-पैर बांध दिए गए थे और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया था, बाद में उनकी मां ने उन्हें छुड़ाया था.
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 376(1) और 342 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी.
मामले के हाईकोर्ट पहुंचने के बाद पीड़िता की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट का गहन परीक्षण किया गया. प्रारंभिक बयान में पेनिट्रेशन का आरोप था, लेकिन बाद में पीड़िता ने स्वीकार किया कि आरोपी ने केवल अपना प्राइवेट पार्ट उनके वजाइना पर रखा था.
डॉक्टर की रिपोर्ट में भी हाइमन सुरक्षित पाया गया. हालांकि, उनके प्राइवेट पार्ट्स और कपड़ों पर स्पर्म मिलने की पुष्टि हुई थी.
कोर्ट ने कहा कि ये तथ्य अपराध की कोशिश दर्शाते हैं, लेकिन इनसे पूर्ण बलात्कार सिद्ध होता.
अदालत ने फैसले में कहा कि पीड़िता की हाइमन सही सलामत थी और रेप के कोई पक्के निशान नहीं थे. क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान पीड़िता ने स्वीकार किया कहा था कि पेनिट्रेशन नहीं किया गया. कोर्ट ने यह नतीजा निकाला कि आरोपी के खिलाफ रेप करने की कोशिश का अपराध बनता है क्योंकि पूर्ण नहीं लेकिन पार्शियल पेनिट्रेशन हो सकता है.
उल्लेखनीय है कि बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं से जुड़े यौन अपराध मामलों में अदालतों की असंवेदनशील टिप्पणियां परिवार और पूरे समाज पर ‘डर पैदा करने वाला असर’ डाल सकती हैं.
अदालत की यह टिप्पणी ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क को यौन उत्पीड़न नहीं माने जाने और नाबालिग को ही अपनी ‘इच्छाओं पर नियंत्रण’ रखने की नसीहत के बाद सामने आई थी. तब अदालत ने साफ कहा था कि महिलाओं की गरिमा से कोई समझौता नहीं हो सकता. भाषा और न्याय, दोनों संवेदनशील होने चाहिए.
