नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) को यौन अपराध मामलों में न्यायाधीशों में संवेदनशीलता और करुणा को विकसित करने के लिए दिशानिर्देशों का मसौदा तैयार करने को कहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने एनजेए के निदेशक जस्टिस अनिरुद्ध बोस को दिशानिर्देशों का मसौदा तैयार करने से पहले अतीत में उठाए गए ऐसे उपायों पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक समिति गठित करने को कहा है.
इस संबंध में अदालत ने कहा, ‘न्यायिक प्रणाली में विभिन्न हितधारकों द्वारा किए गए पूर्व प्रयासों और जमीनी स्तर पर प्राप्त अनुभवों को ध्यान में रखते हुए, व्यापक सिफारिशें तैयार करें. ये सिफारिशें यौन अपराधों और कमजोर पीड़ितों, शिकायतकर्ताओं और/या गवाहों से जुड़े अन्य संवेदनशील मामलों से निपटने के दौरान न्यायाधीशों और न्यायिक प्रणाली के दृष्टिकोण के लिए मसौदा दिशानिर्देश’ के रूप में होंगी.’
आदेश के अनुसार, समिति की अध्यक्षता जस्टिस बोस करेंगे और इसमें चार अन्य संबंधित विशेषज्ञ शामिल होंगे.
मालूम हो कि सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश 2022 में एक महिला द्वारा दायर मामले की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें महिला ने दो पुरुषों पर अपनी नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार का प्रयास करने का आरोप लगाया था. इस याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश का संज्ञान लिया गया था जिसमें हाईकोर्ट ने कहा था कि केवल स्तन पकड़ना और पायजामे का कमरबंद खींचना बलात्कार नहीं है.
शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि वह हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं है कि इस मामले में आरोप केवल तैयारी से संबंधित थे और वे बलात्कार के अपराध का प्रयास का नहीं थे.
निचली अदालत ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 (बलात्कार) और बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) की धारा 18 (अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध करने का प्रयास) के तहत मामले में समन जारी किया था.
हालांकि, उच्च न्यायालय ने आरोपों को आईपीसी की धारा 354(ख) (किसी महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन उत्पीड़न) के तहत कम गंभीर अपराध में बदल दिया.
उच्च न्यायालय ने राय दी थी कि अभियुक्तों के कृत्यों को बलात्कार करने का प्रयास नहीं, बल्कि बलात्कार के प्रयास की ‘तैयारी’ के रूप में देखा जा सकता है.
सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश को रद्द करते हुए मूल समन को बहाल किया और टिप्पणी की, ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि न्यायपालिका के सदस्यों के दृष्टिकोण और साथ ही अदालती प्रक्रियाओं में अंतर्निहित संवेदनशीलता और विवेक को विकसित करने के लिए कुछ कदम उठाने की आवश्यकता है.’
न्यायालय ने अपने फैसले में नाबालिग लड़की के प्रति उच्च न्यायालय की असंवेदनशीलता का उल्लेख करते हुए कहा, ‘इस दिशा में (संवेदनशीलता विकसित करने के लिए) देश की संवैधानिक अदालतों द्वारा समय-समय पर न्यायिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर विभिन्न कदम उठाए गए हैं. हालांकि, ऐसा प्रतीत होता है कि अब तक किए गए प्रयास अपेक्षित फलदायी नहीं रहे हैं.’
दिशानिर्देशों का मसौदा
अदालत ने कहा कि दिशानिर्देशों के मसौदा में सरल भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए जिसे आम आदमी समझ सके.
समिति को कार्य सौंपते हुए अदालत ने कहा, ‘अपमानजनक शब्दों और अभिव्यक्तियों के अनेक उदाहरण हैं, जिनका प्रयोग सामान्यतः हमारे दंड कानूनों के अंतर्गत अपराध माना जाता है, लेकिन फिर भी हमारे समाज के सदस्य स्थानीय बोलियों में खुलेआम इनका प्रयोग करते हैं, संभवतः इसलिए क्योंकि उन्हें इन शब्दों के अपमानजनक स्वरूप की स्पष्ट समझ नहीं है.’
अदालत ने समिति को निर्देश दिया कि वह ‘ऐसे शब्दों/अभिव्यक्तियों की पहचान करे और उन्हें संकलित करे ताकि वे अनदेखे न रह जाएं और शिकायतकर्ताओं/पीड़ितों को अपने साथ हुए आघात का बेहतर और विस्तृत विवरण देने का अधिकार मिले.’
अदालत ने आगे कहा, ‘हम उम्मीद करते हैं कि दिशानिर्देश विदेशी भाषाओं और न्यायक्षेत्रों से उत्पन्न भारी-भरकम, जटिल अभिव्यक्तियों से भरे नहीं होंगे. इन्हें भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में शामिल हितधारकों के वास्तविक और जीवंत अनुभवों के संदर्भ में तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें हमारे देश की संस्कृति, मूल्यों और सामाजिक ताने-बाने का सीधा संदर्भ हो.’
इससे पहले की एक सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा था कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रकाशित लिंग रूढ़ियों पर पहले की पुस्तिका बहुत तकनीकी और ‘हार्वर्ड जैसी सोच से प्रभावित’ थी.
