नई दिल्ली: गुजरात उच्च न्यायालय ने क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने संबंधी एक मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सज़ा को रद्द करते हुए कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत पत्नी द्वारा बिना बताए रातभर मायके में रहने की वजह से पति के थप्पड़ मारने की एक घटना क्रूरता नहीं माना जाएगी.
लॉइव लॉ के मुताबिक, हाईकोर्ट ने इसी मामले में आईपीसी की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के दोषी व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि इस न्यायालय को महिला के साथ लगातार मारपीट के कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं, जिसके चलते कथित तौर पर आत्महत्या के लिए उकसाने का दावा किया गया था.
रिपोर्ट के अनुसार, अदालत दिलीपभाई मंगलाभाई वरली की आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रहा थी, जिनकी बेटी का विवाह 1995 में हुआ था और दंपति वलसाड जिले के सारिगम पहाड़पाड़ा में रहते थे. शादी के कुछ महीनों बाद ही महिला ने आत्महत्या कर ली थी.
उनके पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उन्होंने पति पर क्रूरता और उत्पीड़न का आरोप लगाया, जिसके कारण उनकी बेटी ने आत्महत्या की. मृतका के पिता ने शिकायत में कहा था कि आरोपी अक्सर पार्टियों से देर रात घर लौटता था और उनकी बेटी के साथ मारपीट करता था. एक बार वह ससुराल पहुंचा और पत्नी को बिना बताए मायके में रुकने पर थप्पड़ मार दिया.
पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए और 306 के तहत मामला दर्ज किया था. इसके बाद वलसाड की सत्र अदालत ने 2003 में पति को दोषी ठहराते हुए धारा 498ए के तहत एक वर्ष और धारा 306 के तहत सात वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई थी.
अभियोजन पक्ष का तर्क था कि शादी के एक साल के अंदर ही पत्नी ने अपने पति द्वारा मानसिक और शारीरिक क्रूरता के चलते आत्महत्या की.
इस फैसले को पति द्वारा हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बाद हाईकोर्ट ने सत्र अदालत के आदेश को पलटते हुए आरोपी के हक़ में फैसला सुनाया है.
लगातार या असहनीय उत्पीड़न के पर्याप्त प्रमाण नहीं: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों का फिर से मूल्यांकन किया और पाया कि लगातार या असहनीय उत्पीड़न के पर्याप्त प्रमाण पेश नहीं किए गए हैं.
अपने आदेश में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मायके में बिना सूचना रुके रहने को लेकर विवाद हुआ था. इसमें पति के मारे गए सिर्फ एक थप्पड़ को कानूनी रूप से क्रूरता की परिभाषा में नहीं रखा जा सकता है.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा, ‘ऐसा लगता है कि झगड़ा सिर्फ इस बात पर था कि पति रात में शादी के समारोहों में ‘बैंजो’ बजाने के लिए बाहर जाता था और देर से लौटने के बाद पति-पत्नी के बीच झगड़ा होता था. सभी गवाहों ने लगातार कहा कि एक पत्नी के तौर पर मृतक को आरोपी का ‘बैंजो’ बजाकर देर रात लौटना पसंद नहीं था. झगड़े खास तौर पर तब हुए जब आरोपी ‘बैंजो’ पर अपनी परफॉर्मेंस के बाद रात में घर वापस लौटा.’
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने के पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए थे.
आत्महत्या के लिए उकसाने पर बने कानून का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि आईपीसी की धारा 306 के तहत सज़ा के लिए उकसाने के सीधे या आस-पास के काम का सबूत होना ज़रूरी है, और यह सिर्फ़ आम शादीशुदा ज़िंदगी में झगड़े पर आधारित नहीं हो सकता.
यह मानते हुए कि ट्रायल कोर्ट ने बिना पर्याप्त सबूत के अपील करने वाले को सज़ा देने में गलती की, हाईकोर्ट ने सज़ा को रद्द करते हुए अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
