नई दिल्ली: द वायर को सहयोग पोर्टल (आईटी इंटरमीडियरी) का यूज़र मैनुअल मिला है, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा ऑनलाइन कंटेंट हटाने का पूरा तरीका बताया गया है.
बता दें कि यह मैनुअल कभी सार्वजनिक नहीं किया गया. इसमें स्पष्ट है कि कंटेंट हटाने के आदेश एकतरफा होते हैं, जहां सरकारी एजेंसियों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और टेलीकॉम कंपनियों जैसे मध्यस्थों (इंटरमीडियरी) के बीच सीधी बात होती है. अहम ये है कि इसमें पत्रकारों या कंटेंट क्रिएटर्स को ‘स्टेकहोल्डर्स’ यानी हितधारकों की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया है. साथ ही, किसी सामग्री (कंटेंट) को हटाने से पहले किसी स्वतंत्र समीक्षा प्रक्रिया का भी कोई उल्लेख नहीं है.
ज्ञात हो कि अक्टूबर 2024 में गृह मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए सहयोग पोर्टल का मकसद केंद्र और राज्य की एजेंसियों को, आईटी एक्ट 2000 की धारा 79(3)(b) और ‘इंटरमीडियरी गाइडलाइंस’ 2021 के नियम 3(1)(d) के तहत कंटेंट हटाने के नोटिस भेजने के तरीके को स्वायत्त करना बताया गया था. आईटी एक्ट की धारा 69ए विशेष रूप से ब्लॉकिंग आदेश से जुड़ी है, उसे दरकिनार कर इस पोर्टल के जरिए कंटेंट हटाने के आदेश जारी करने की काफी आलोचना हुई है. इस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल उठे हैं, क्योंकि इससे सरकारी सेंसरशिप की आशंका पैदा होती है.
10 फरवरी को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम 2026 जारी किए, जिनमें कंटेंट हटाने की समयसीमा 24 से 36 घंटे से घटाकर तीन घंटे कर दी गई है. ये नियम 20 फरवरी से लागू हुए हैं, वही दिन जब नई दिल्ली में एआई इंडिया समिट खत्म हुई है.
सहयोग पोर्टल को गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) ने विकसित किया है. इससे पहले किसी कंटेंट को ब्लॉक करने के लिए लिखित आदेश देना होता था, कारण बताने पड़ते थे, प्रभावित पक्ष को नोटिस दिया जाता था और एक न्यायिक समिति द्वारा समीक्षा की जाती थी.
द वायर द्वारा देखे गए मैनुअल से संकेत मिलता है कि नए नियम एक आधिकारिक सेंसरशिप व्यवस्था बनाने की दिशा में बढ़ाया गया अहम कदम हैं, जिसमें सूचना और प्रसारण मंत्रालय के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को दरकिनार कर गृह मंत्रालय प्रमुख भूमिका में है.
हितधारकों में प्रभावित पक्ष शामिल नहीं
उल्लेखनीय है कि जिनका कंटेंट हटाया जाएगा, वे मैनुअल में बतौर हितधारक शामिल नहीं हैं. हितधारकों के रूप में गृह मंत्रालय, आई4सी, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, दूरसंचार विभाग, केंद्र सरकार की अधिकृत एजेंसियां, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नोडल अधिकारी और इंटरमीडियरीज़ (मध्यस्थों) को शामिल किया गया है.
इंटरमीडियरीज़ का आशय ऐसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हैं जो यूजर को कंटेंट बनाने, अपलोड करने, साझा करने, बदलने या एक्सेस की सुविधा देते हैं. इसमें इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर, सर्च इंजन, वेब होस्टिंग सेवाएं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म शामिल हैं.

मैनुअल में सहयोग पोर्टल का पूरा वर्कफ्लो यानी यह कैसे काम करता है, यह बताया गया है.
इसके अनुसार, केंद्र या राज्य की अधिकृत एजेंसियां या कानून लागू करने वाली एजेंसियां, वेब कंटेंट से गैरकानूनी या हानिकारक जानकारी हटाने के लिए सहयोग पोर्टल के जरिए अपील करेंगी. यह अनुरोध संबंधित मध्यस्थों या इंटरनेट सर्विस प्रदाता (आईएसपी) के पास कंटेंट हटाने या उस तक पहुंच बंद करने के लिए जाएगा. सोशल मीडिया इंटरमीडियरी के मामले में नोटिस सीधे भेजा जाएगा. इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर के मामले में अनुरोध पहले दूरसंचार विभाग के पास जाएगा और वहां से आगे आईएसपी को भेजा जाएगा.

आईटी इंटरमीडियरी और आईएसपी द्वारा की गई कार्रवाई की ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ नेशनल डैशबोर्ड पर हितधारकों को दिखाई देगी. यहां मध्यस्थ अतिरिक्त जानकारी या सबूत मांग सकते हैं. अगर वे आदेश का पालन नहीं कर पा रहे हों तो इसका कारण बताते हुए असमर्थता दर्ज कर सकते हैं.
हालांकि अंतिम निर्णय अधिकृत अधिकारी का होगा. यदि अधिकारी कारणों से सहमत होता तो अनुरोध बंद कर दिया जाएगा. यदि असहमत होता है तो वह अतिरिक्त टिप्पणी देकर अनुपालन करने के लिए कह सकता है. पालन से इनकार की स्थिति में कारण बताओ नोटिस जारी किया जा सकता है और आईटी (मध्यस्थता) नियमावली, 2021 के नियम 7 के तहत आगे कार्रवाई की जा सकती है.
हितधारक यह भी देख सकते हैं कि किसी राज्य में कटेंट हटाने के कुल कितने अनुरोध किए गए, कितने लंबित हैं और किन यूआरएल पर हटाया गया. साथ ही कितने प्रक्रिया में है, किनका पालन संभव नहीं है, किनके बारे में अतिरिक्त जानकारी मांगी गई या कौन से लंबित हैं. किसी भी कार्रवाई के कारण केवल इन्हीं हितधारकों को दिखाई देंगे.
व्यापक कार्रवाई की अनुमति, स्वतंत्र समीक्षा नहीं
मैनुअल के अनुसार सहयोग पोर्टल धारा 79(3)(b) के तहत नोटिस भेजने की प्रक्रिया को ऑटोमेट (स्वायत्त) करता है ताकि किसी गैरकानूनी काम में इस्तेमाल हो रही जानकारी, डेटा या कम्युनिकेशन लिंक को हटाया या उसकी पहुंच रोकी जा सके. अधिकृत एजेंसियां अपने स्तर पर या किसी सक्षम अदालत के निर्देश पर नोटिस जारी कर सकती हैं.
धारा 79(3)(b) के तहत कार्रवाई का दायरा व्यापक है. इसके अंतर्गत न केवल गैरकानूनी जानकारी, बल्कि ऐसी किसी भी जानकारी, डेटा या लिंक को हटाया जा सकता है जिसका उपयोग किसी गैरकानूनी गतिविधि के लिए हो रहा हो.
इसमें बाल यौन शोषण सामग्री, खुद को नुकसान पहुंचाने वाला कंटेंट, जाली पहचान, फेक न्यूज, गैरकानूनी एडल्ट कंटेंट, बिना सहमति के निजी तस्वीरें, अश्लील या पोर्न सामग्री, फर्जी ऐप या यूआरएल, गलत सूचना, साइबर बुलिंग, कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा उल्लंघन, अवैध जुआ, मनी लॉन्ड्रिंग, डॉक्सिंग, हैकिंग, मैलवेयर, डेटा लीक, किसी जाति, धर्म या लिंग को निशाना बनाकर धमकी या उत्पीड़न, फिशिंग, मानव तस्करी, अवैध भर्ती, फर्जी बैंक खाते या सिम कार्ड की खरीद-बिक्री, ड्रग्स और हथियारों का अवैध व्यापार और धोखाधड़ी वाले विज्ञापन शामिल हैं.
यूजर मैनुअल से स्पष्ट है कि कंटेंट हटाने के ऐसे ‘टेकडाउन’ आदेशों के लिए किसी स्वतंत्र समीक्षा का प्रावधान नहीं है. आदेश सीधे सरकार या कानून लागू करने वाली एजेंसियों से सोशल मीडिया इंटरमीडियरी या टेलीकॉम कंपनियों को भेजे जाते हैं और कंटेंट बनाने वाले व्यक्ति को इसकी सूचना भी नहीं दी जाती.
पहले की व्यवस्था में भी स्वतंत्र समीक्षा का अलग प्रावधान नहीं था. धारा 69ए के तहत ब्लॉकिंग अनुरोध सरकार को भेजा जाता था और यदि वह उचित पाया जाता तो वरिष्ठ अधिकारियों की समिति के पास जाता था. संबंधित प्लेटफॉर्म को जवाब देने का अवसर मिलता था, लेकिन अंतिम चुनौती केवल अदालत में ही दी जा सकती थी.
सहयोग के खिलाफ आपत्ति
अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच 19 ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, जिनमें वॉट्सऐप, फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम शामिल हैं, को 2,300 से अधिक ब्लॉकिंग आदेश भेजे गए. यह जानकारी आरटीआई के तहत प्राप्त आंकड़ों के आधार पर इंडियन एक्सप्रेस ने दी है.
सहयोग को कानूनी चुनौती भी मिली. एक्स कॉर्प ने सरकार द्वारा इस पोर्टल के उपयोग को चुनौती दी, लेकिन सितंबर में कर्नाटक हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और सहयोग को ‘जनहित का साधन’ बताते हुए कहा कि यह नागरिकों और सोशल मीडिया इंटरमीडियरी के बीच सहयोग का एक उदाहरण है.
इस पोर्टल का उपयोग ऑनलाइन खबरों के प्रसार पर भी असर डाल सकता है. एक्स कॉर्प के मामले में दायर हस्तक्षेप याचिका में डिजिटल प्रसारकों के संगठन डिजीपब ने इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के वकीलों की मदद से कहा कि एक्स जैसे प्लेटफॉर्म सूचना के प्रसार का माध्यम हैं और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में जानकारी देना, आलोचना करना और जनमत निर्माण में योगदान देना शामिल है.
याचिका में यह भी कहा गया था कि सहयोग पोर्टल का स्पष्ट वैधानिक आधार नहीं है और यह आईटी एक्ट की धारा 69ए में दी गई सीमित ब्लॉकिंग शक्तियों से आगे जाता है. 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में धारा 69ए की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
