शंकर: महानगर की चमक के बीच एकाकीपन का अमर कथाकार

स्मृति शेष: शंकर का साहित्य इस अर्थ में अद्वितीय है कि वह अमूर्त समाजशास्त्रीय सिद्धांतों को जीवंत मानवीय अनुभवों और ठोस सामाजिक परिस्थितियों में रूपांतरित कर देता है. उनके निधन के साथ एक ऐसे लेखक का अवसान हुआ, जिसने भारतीय शहरी आधुनिकता की जटिलताओं- वर्ग, आकांक्षा, नैतिक द्वंद्व और मानवीय अकेलेपन को सशक्त भाषा और संवेदना प्रदान की.

‘चौरंगी’ केवल एक कालजयी उपन्यास नहीं, बल्कि भारतीय शहरी समाज को समझने का एक स्थायी व्याख्यात्मक उपकरण भी है. (फोटो साभार: Wikimedia Commons/पेंगुइन प्रकाशन)

प्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार मणिशंकर मुखोपाध्याय ‘शंकर’ का उपन्यास ‘चौरंगी’ स्वतंत्रता- पश्चात् भारतीय शहरीकरण की जटिल प्रक्रियाओं को समझने के लिए एक अद्वितीय पाठ प्रस्तुत करता है. कोलकाता के एक भव्य होटल को कथा के केंद्र में रखकर रचित यह उपन्यास साहित्य, इतिहास और शहरी समाजशास्त्र के अंतःसंबंधों को उद्घाटित करता है.

यदि इसे जॉर्ज सिमेल, लुईस वर्थ और हेनरी लेफेब्र जैसे प्रमुख शहरी समाजशास्त्रियों के सिद्धांतों के आलोक में पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि शंकर ने महानगर के अनुभव को न केवल भावनात्मक बल्कि संरचनात्मक स्तर पर भी समझा था. इस दृष्टि से चौरंगी  को भारतीय शहरी आधुनिकता का समाजशास्त्रीय आख्यान कहा जा सकता है.

जॉर्ज सिमेल के ‘The Metropolis and Mental Life‘ में प्रतिपादित विचार कि महानगर व्यक्ति की चेतना और संवेदना को पुनर्गठित करता है, उपन्यास के पात्रों के आचरण और व्यव्हार में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है. सिमेल के अनुसार महानगर में तीव्र आर्थिक प्रतिस्पर्धा, समय का दबाव और निरंतर उत्तेजनाएं व्यक्ति को एक ‘blasé’ मानसिकता अपनाने के लिए विवश करती हैं; एक ऐसी स्थिति जिसमें व्यक्ति भावनात्मक रूप से निष्प्रभावी दिखाई देता है, क्योंकि संवेदनशील बने रहना मानसिक रूप से असहनीय हो सकता है.

चौरंगी  के होटल में कार्यरत कर्मचारी और वहां आने वाले अतिथि इसी मानसिक संरचना और अवस्था के प्रतिनिधि हैं. वे लगातार लोगों से मिलते हैं, पर किसी से जुड़ते नहीं; वे जीवन के नाटकीय प्रसंगों के साक्षी होते हैं, पर उनमें भागीदार नहीं बनते. यह भावनात्मक दूरी शहरी जीवन की रक्षा-प्रणाली है, पर साथ ही गहरे अकेलेपन का कारण भी. शंकर ने इस मनोवैज्ञानिक द्वंद्व को अत्यंत सूक्ष्मता से चित्रित किया है.

इससे थोड़ा विलग लुईस वर्थ का ‘Urbanism as a Way of Life‘ सिद्धांत चौरंगी  की सामाजिक संरचना को समझने में और अधिक सहायक है. वर्थ के अनुसार शहर का विशाल आकार, उच्च घनत्व और सामाजिक विषमता ऐसे संबंधों को जन्म देते हैं जो क्षणिक, औपचारिक और उपयोगितावादी होते हैं. उपन्यास का होटल इस शहरी जीवन-शैली का एक सघन रूप है. यहां राजनेता, उद्योगपति, विदेशी पर्यटक, मध्यवर्गीय कर्मचारी और श्रमिक एक ही भौतिक स्थान में उपस्थित होते हैं, पर उनके बीच सामाजिक दूरी बनी रहती है.

यह स्थिति शहरी समाज की बहु-स्तरीकृत संरचना को उजागर करती है, जहां वर्गीय भेद केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक भी होते हैं. होटल का वैभव अभिजात वर्ग की शक्ति का प्रदर्शन है, जबकि कर्मचारियों की अदृश्य उपस्थिति उस श्रम को स्मरण कराती है जिस पर यह वैभव आधारित है.

हेनरी लेफेब्र का ‘Production of Space‘ सिद्धांत उपन्यास के स्थानिक आयाम को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है. लेफेब्र के अनुसार शहरी स्थान केवल भौतिक संरचना नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों और सत्ता-व्यवस्थाओं द्वारा निर्मित होता है. चौरंगी  का होटल पूंजीवादी शहरीकरण की इसी प्रक्रिया का प्रतीक है. यह वह स्थल है जहां उपभोग संस्कृति, वैश्विक संपर्क और राष्ट्रीय अभिजात वर्ग की आकांक्षाएं एकत्रित होती हैं. होटल का आंतरिक विन्यास- लॉबी, बार, रेस्तरां, कमरे- सामाजिक पदानुक्रम को भी प्रतिबिंबित करता है; कुछ स्थान केवल विशिष्ट वर्गों के लिए सुलभ हैं, जबकि कर्मचारी इन स्थानों में उपस्थित होते हुए भी उनसे बाहर रहते हैं.

एक ही समय पर गायब और हाज़िर होने से इस प्रकार का स्थान स्वयं सामाजिक असमानता का माध्यम बन जाता है.

लेफेब्र के विचारों को आगे बढ़ाते हुए कहा जा सकता है कि होटल एक ‘representational space’ है- ऐसा स्थान जो आधुनिकता की चमकदार छवि का निर्माण होता है. यहां विदेशी पर्यटकों की उपस्थिति, अंग्रेज़ी भाषा का प्रभुत्व और उपभोग की संस्कृति एक वैश्विक आधुनिकता का भ्रम पैदा करती है, जबकि इसके भीतर औपनिवेशिक विरासत और स्थानीय असमानताएं लगातार विद्यमान रहती हैं.

शंकर ने इस द्वंद्व को उजागर करते हुए दिखाया कि भारतीय महानगर में आधुनिकता अक्सर परंपरा और औपनिवेशिक इतिहास के साथ अंतःक्रिया के माध्यम से निर्मित होती है.

उपन्यास  में उकेरा गया लैंगिक आयाम भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है. महानगर स्त्रियों को सार्वजनिक जीवन में प्रवेश के अवसर देता है, पर साथ ही उन्हें नए प्रकार के वस्तुकरण और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है. होटल में कार्यरत स्त्रियां आधुनिकता, स्वतंत्रता और आकर्षण का प्रतीक हैं, पर उनकी स्थिति अस्थिर है. वे उपभोग संस्कृति का हिस्सा भी हैं और उसके द्वारा नियंत्रित भी. यह चित्रण शहरी समाजशास्त्र के उस निष्कर्ष से मेल खाता है कि आधुनिकता लैंगिक संबंधों को पुनर्परिभाषित तो करती है, पर समानता की गारंटी नहीं देती.

मध्यवर्गीय आकांक्षाओं का प्रश्न चौरंगी  की आत्मा है. स्वतंत्रता के बाद उभरता भारतीय मध्यवर्ग शिक्षा और रोजगार के माध्यम से सामाजिक गतिशीलता प्राप्त करना चाहता था, पर महानगर की प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता ने इन आकांक्षाओं को जटिल बना दिया.

शंकर ने दिखाया कि सफलता की राह अक्सर नैतिक समझौतों से होकर गुजरती है, और असफलता व्यक्ति को गहरे अस्तित्वगत संकट में डाल देती है. यह दृष्टि सिमेल और वर्थ दोनों के निष्कर्षों से मेल खाती है कि महानगर व्यक्ति को अवसर देता है, पर साथ ही उसे असुरक्षा और अलगाव के अनुभव से भी गुजरने को बाध्य करता है.

अंततः, चौरंगी यह प्रतिपादित करता है कि शहरीकरण केवल अवसंरचनात्मक विस्तार या भौतिक आधुनिकीकरण की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि सामाजिक संबंधों, व्यक्तित्व-निर्माण और नैतिक मानदंडों के गहन पुनर्संयोजन का भी क्षेत्र है. जॉर्ज सिमेल की महानगरीय जीवन पर अवधारणा- विशेषतः ‘ब्लाज़े एटिट्यूड’ और व्यक्तिवाद- लुई वर्थ की ‘अर्बनिज़्म ऐज़ ए वे ऑफ लाइफ’ की समाजशास्त्रीय अंतर्दृष्टि, तथा हेनरी लेफेब्र की ‘प्रोडक्शन ऑफ स्पेस’ की मार्क्सवादी व्याख्या के आलोक में यह उपन्यास भारतीय महानगर की आत्मा का बहुस्तरीय आख्यान प्रस्तुत करता है. इसमें महानगरीय जीवन की द्वंद्वात्मकता; स्वतंत्रता और एकाकीपन, ऐश्वर्य और असमानता, आकांक्षा और हताशा- एक-दूसरे में अंतःस्थापित रूप में उभरती है.

इस प्रकार, ‘चौरंगी’ शहर को केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक सक्रिय सामाजिक-पाठ के रूप में रूपायित करता है, जहां स्थान स्वयं सत्ता, पूंजी और मानवीय इच्छाओं के अंतःक्रिया-स्थल में बदल जाता है.

शंकर का साहित्य इस अर्थ में अद्वितीय है कि वह अमूर्त समाजशास्त्रीय सिद्धांतों को जीवंत मानवीय अनुभवों और ठोस सामाजिक परिस्थितियों में रूपांतरित कर देता है. उनके निधन के साथ एक ऐसे लेखक का अवसान हुआ, जिसने भारतीय शहरी आधुनिकता की जटिलताओं- वर्ग, आकांक्षा, नैतिक द्वंद्व और मानवीय अकेलेपन- को सशक्त भाषा और संवेदना प्रदान की.

फिर भी उनकी कृतियां, विशेषतः चौरंगी, यह सुनिश्चित करती हैं कि महानगर के अंतर्विरोधों पर बौद्धिक और नैतिक मंथन निरंतर चलता रहेगा. इस दृष्टि से ‘चौरंगी’ केवल एक कालजयी उपन्यास नहीं, बल्कि भारतीय शहरी समाज को समझने का एक स्थायी व्याख्यात्मक उपकरण भी है- एक ऐसा पाठ जो हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि शहर केवल स्थान नहीं, बल्कि शक्ति, स्मृति, इच्छाओं और असमानताओं का जटिल मानवीय परिदृश्य है.

(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)