यूपी धर्मांतरण क़ानून के तहत अंतरधार्मिक शादियों पर रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट 12 रिट याचिकाओं के समूह पर सुनवाई कर रहा था, जिनमें सात मामलों में मुस्लिम महिलाएं हिंदू पुरुषों के साथ रह रही थीं, जबकि पांच मामलों में हिंदू महिलाएं मुस्लिम पुरुषों के साथ लिव-इन संबंध में थीं. कोर्ट ने सभी को पुलिस सुरक्षा देते हुए कहा कि केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ता अंतरधार्मिक संबंध में हैं, उन्हें संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 न तो अंतरधार्मिक विवाहों पर रोक लगाता है और न ही ऐसे जोड़ों को लिव-इन संबंध में साथ रहने से प्रतिबंधित करता है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने सभी दंपतियों को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने की अनुमति देते हुए राज्य सरकार और निजी पक्षों को उनके जीवन, स्वतंत्रता और निजता में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया.

जस्टिस विवेक कुमार सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ 12 रिट याचिकाओं के समूह पर सुनवाई कर रही थी. इनमें सात मामलों में मुस्लिम महिलाएं हिंदू पुरुषों के साथ रह रही थीं, जबकि पांच मामलों में हिंदू महिलाएं मुस्लिम पुरुषों के साथ लिव-इन संबंध में थीं. अदालत ने कहा कि वह याचिकाकर्ताओं को धर्म के नजरिए से नहीं, बल्कि ऐसे वयस्कों के रूप में देखता है जिन्होंने लंबे समय से अपनी इच्छा से शांतिपूर्वक साथ रहने का निर्णय लिया है.

अदालत ने कहा, ‘संवैधानिक दायित्वों के तहत प्रत्येक नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना राज्य का अनिवार्य कर्तव्य है. मानव जीवन के अधिकार को नागरिक की धार्मिक आस्था से परे ऊंचा दर्जा दिया जाना चाहिए. केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ता अंतरधार्मिक संबंध में रह रहे हैं, उन्हें संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता. जाति, पंथ, लिंग या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता.’

हालांकि राज्य सरकार ने तर्क दिया कि दंपतियों ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 की धारा 8 और 9 का पालन नहीं किया है, क्योंकि नवंबर 2020 में कानून लागू होने के बाद किसी ने धर्म बदलने के लिए आवेदन नहीं दिया. राज्य का यह भी कहना था कि उनका संबंध अवैध है और इसलिए कानून के तहत संरक्षण का पात्र नहीं है.

इस तर्क को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि धर्मांतरण विरोधी कानून तभी लागू होता है जब गलतबयानी, बल, दबाव, अनुचित प्रभाव, लालच, धोखाधड़ी या शादी जैसे रिश्ते के ज़रिए एक धर्म से दूसरे धर्म में असल में धर्म बदला जाता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतरधार्मिक विवाह स्वयं में इस अधिनियम के तहत प्रतिबंधित नहीं हैं.

पीठ ने कहा, ‘यहां तक कि अंतरधार्मिक विवाह भी 2021 के अधिनियम के तहत रोक नहीं है. यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है तो उसे अधिनियम की धारा 8 और 9 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा. लेकिन विवाह करने या लिव-इन संबंध में रहने के उद्देश्य से किसी को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.’

पीठ ने कहा, ‘यह अदालत समझने में नाकाम रहा कि यदि कानून दो व्यक्तियों – यहां तक कि समान लिंग के लोगों – को भी शांतिपूर्वक साथ रहने की अनुमति देता है, तो दो बालिग व्यक्तियों के विषमलैंगिक संबंध पर न तो कोई व्यक्ति, न परिवार और न ही राज्य आपत्ति कर सकता है, जब वे अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रह रहे हों.’

अदालत ने कहा कि बालिग हो चुके किसी व्यक्ति की पसंद की अनदेखी करना न केवल एक परिपक्व व्यक्ति की स्वतंत्र चयन की आज़ादी के विरुद्ध होगा, बल्कि ‘विविधता में एकता’ की अवधारणा के लिए भी खतरा साबित होगा.