‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ वाले अध्याय पर कोर्ट की आपत्ति के बाद एनसीईआरटी ने कक्षा 8 की पुस्तक बिक्री से हटाई

23 फरवरी को एनसीईआरटी द्वारा जारी कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका के सामने 'भ्रष्टाचार' और 'बड़ी संख्या में लंबित मामलों' को प्रमुख चुनौतियों के रूप में उल्लेख किया गया है. इसे लेकर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि न्यायपालिका की छवि को बदनाम या कमतर करने की किसी को अनुमति नहीं दी जाएगी और इस मामले में उचित कार्रवाई की जाएगी.

(फोटो साभार: schools.olympiadsuccess.com)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने हाल ही में जारी की गई कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक को बिक्री से वापस ले लिया है.

शिक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बुधवार को इसकी पुष्टि की. यह कदम पुस्तक में शामिल ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक वाले अध्याय को लेकर उठी आपत्तियों के एक दिन बाद उठाया गया.

इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से बताया कि यह पुस्तक मंगलवार को बिक्री से वापस ले ली गई. बुधवार को दिल्ली स्थित एनसीईआरटी परिसर के प्रकाशन प्रभाग के बुक काउंटर पर कर्मचारियों ने बताया कि सोमवार तक बिक्री के लिए उपलब्ध यह पुस्तक अब काउंटर पर नहीं मिल रही है.

इससे पहले बुधवार (25 फरवरी) को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कक्षा 8 की नई एनसीईआरटी पुस्तक में शामिल ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से जुड़े हिस्सों पर गंभीर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की छवि को बदनाम या कमतर करने की किसी को अनुमति नहीं दी जाएगी और इस मामले में उचित कार्रवाई की जाएगी.

मंगलवार को इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि सामाजिक विज्ञान की नई कक्षा 8 की पुस्तक में न्यायपालिका के सामने ‘भ्रष्टाचार’ और ‘बड़ी संख्या में लंबित मामलों’ (बैकलॉग) को प्रमुख चुनौतियों के रूप में उल्लेख किया गया है.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी के साथ इस मुद्दे को अदालत में मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उठाया.

सिब्बल ने कहा, ‘हम इस संस्था के सदस्य होने के नाते बेहद चिंतित हैं कि कक्षा 8 के बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जा रहा है. यह एनसीईआरटी का हिस्सा है. इस संस्था से हमारा गहरा जुड़ाव है और यह पूरी तरह से चौंकाने वाला है. हमारे पास पुस्तक की प्रतियां हैं.’

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह इस मुद्दे से पूरी तरह अवगत हैं और उन्हें इस संबंध में कई फोन कॉल और संदेश प्राप्त हुए हैं. उन्होंने बताया कि पुस्तक की सामग्री को लेकर कई न्यायाधीश भी ‘चिंतित’ हैं.

उन्होंने कहा, ‘मैं आप सभी को आश्वस्त करता हूं कि मैं पूरी तरह से इस मामले से अवगत हूं.’

जब सिब्बल ने उम्मीद जताई कि अदालत इस मामले में स्वतःसंज्ञान लेगी, तो मुख्य न्यायाधीश ने जवाब दिया, ‘एक दिन इंतजार कीजिए. यह पूरे संस्थान से जुड़ा मामला है. बार एंड बेंच दोनों चिंतित हैं. व्यवस्था से जुड़े हर हितधारक परेशान हैं. मुझे लगातार फोन और संदेश मिल रहे हैं. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी चिंतित हैं. आपने यह मुद्दा उठाया है, इसलिए बता रहा हूं कि मैं पहले ही आदेश पारित कर चुका हूं और इस मामले में स्वतः संज्ञान ले रहा हूं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘मैं दुनिया में किसी को भी इस संस्था की गरिमा को कलंकित करने या बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा. किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं होने दिया जाएगा. चाहे कोई कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, कानून अपना काम करेगा. मुझे पता है कि इससे कैसे निपटना है.’

सिंघवी ने कहा कि समस्या केवल सामग्री नहीं बल्कि उसकी चयनात्मकता भी है, मानो अन्य क्षेत्रों में भ्रष्टाचार मौजूद ही नहीं है. उन्होंने कहा कि पुस्तक में नौकरशाही, राजनीति, सार्वजनिक जीवन या अन्य संस्थानों में भ्रष्टाचार का कोई उल्लेख नहीं है.

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘ऐसा लगता है कि यह एक बेहद सोच-समझकर उठाया गया और गहराई से जुड़ा कदम है… हम इससे अधिक कुछ नहीं कहना चाहते… मैं अवगत हूं और अपना कर्तव्य निभा चुका हूं.’

मुख्य न्यायाधीश ने मुद्दे को उनके संज्ञान में लाने के लिए सिब्बल और सिंघवी का धन्यवाद भी किया.

सुनवाई के दौरान जस्टिस दिपांकर दत्ता बागची ने भी टिप्पणी की कि पुस्तक की संरचना में संविधान की मूल संरचना से जुड़ी संवैधानिक अखंडता का अभाव दिखाई देता है.

क्या था अध्याय में

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, सोमवार (23 फरवरी) को एनसीईआरटी द्वारा जारी कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ शीर्षक अध्याय के तहत ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर एक नया अध्याय शामिल किया गया है.

इस अध्याय में न्यायिक व्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों के रूप में ‘न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार’ और ‘कई कारणों से उत्पन्न भारी लंबित मामलों का बोझ – जैसे पर्याप्त न्यायाधीशों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रियाएं और कमजोर बुनियादी ढांचा’ का उल्लेख किया गया है.

पुरानी पाठ्यपुस्तक में केवल न्यायपालिका की भूमिका, स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा, अदालतों की संरचना और न्याय तक पहुंच जैसे विषयों का विवरण था. उसमें भ्रष्टाचार का कोई उल्लेख नहीं था. हालांकि उसमें यह जरूर कहा गया था कि मामलों की सुनवाई में वर्षों लग जाना आम नागरिक की न्याय तक पहुंच को प्रभावित करता है. उसमें लिखा था कि ‘न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है.’

नई पुस्तक में अदालतों में लंबित मामलों के अनुमानित आंकड़े भी दिए गए हैं. इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में लगभग 81,000 मामले लंबित हैं. उच्च न्यायालयों में करीब 62,40,000 मामले लंबित हैं. जिला और अधीनस्थ अदालतों में लगभग 4,70,00,000 मामले लंबित बताए गए हैं.

नई पुस्तक के ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ खंड में बताया गया है कि न्यायाधीश आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो अदालत के भीतर ही नहीं बल्कि अदालत के बाहर उनके व्यवहार को भी नियंत्रित करती है.

इसमें न्यायपालिका की आंतरिक जवाबदेही व्यवस्था और शिकायतों के लिए स्थापित प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, जिसके तहत केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली (CPGRAMS) के माध्यम से शिकायतें दर्ज की जा सकती हैं. पुस्तक के अनुसार 2017 से 2021 के बीच 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुई थीं.

पुस्तक में यह भी बताया गया है कि गंभीर आरोपों की स्थिति में संसद महाभियोग प्रस्ताव पारित कर न्यायाधीश को पद से हटा सकती है. ऐसा प्रस्ताव उचित जांच के बाद ही विचार के लिए लिया जाता है और संबंधित न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाता है.

पुस्तक कहती है, ‘फिर भी लोगों को न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव होता है. गरीब और वंचित वर्गों के लिए यह न्याय तक पहुंच की समस्या को और गंभीर बना सकता है. इसलिए राज्य और केंद्र स्तर पर तकनीक के उपयोग सहित पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित कार्रवाई के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं.’

पुस्तक में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के जुलाई 2025 के एक बयान का भी उल्लेख किया गया है. उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका के भीतर भी भ्रष्टाचार और कदाचार के कुछ मामले सामने आए हैं, जिससे जनता का विश्वास प्रभावित होता है. उन्होंने कहा था कि विश्वास बहाली का रास्ता त्वरित, निर्णायक और पारदर्शी कार्रवाई से होकर गुजरता है तथा पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक मूल्यों का हिस्सा हैं.