पृथ्वी को संसार में भाषा ने बदला है और कविता भाषा का सबसे सघन, उत्कट और सर्जनात्मक रूप है. संसार कविता में अपने को ज़ाहिर करता, अपना उत्सव मनाता, उसकी पुष्टि करता और प्रश्नांकन करता है. कविता संसार का गुणगान करती, उसे दीप्त-उद्दीप्त करती, उसे अर्थ और आभा देती, उसके अवगुण चित धरते हुए उसका प्रश्नांकन करती है.
ऐसी कोई सभ्यता नहीं है जिसमें कविता और कहानी न हों. प्रायः सभी धर्म, प्राचीन परंपराओं में ईश्वर या उसका दूत पहली बार कविता में ही बोला है. कविता संसार में ही संभव है, उसी में हो सकती है जैसे कि संसार भी बिना कविता के नहीं रह सकता, भले इन दिनों वह ज्यादातर ऐसा नहीं मान पाता.
हमारा समय अंधराता समय है जिसमें बहुत सारी चकाचौंध हमारे बढ़ते अंधेरों को ढांप या छुपा रही है. संसार बिखर सा रहा है- उसने जो मंगल, संतुलन और सामंजस्य, आस्था और मुक्ति, पारस्परिकता और सहचारिता, विचार और व्यवहार में, सदियों के आर-पार अर्जित की हैं वे सभी इस समय संकट में हैं या दरकिनार किए और हाशिये पर ढकेले जा रहे हैं. एक ऐसी दुनिया बन रही है जो हिंसक-आक्रामक, बाधक और बंधक, अनिश्चित और अचिंतित है.
जिस टेक्नोलॉजी ने पूरे संसार को घेर लिया है और जिसमें हरेक को अभिव्यक्ति का अवसर-सा सुलभ हो गया है, उसी टेक्नोलॉजी ने झूठ-नफ़रत-हिंसा को दूर-दूर तक फैला दिया है. हम एक-दूसरे के बहुत नज़दीक आ गए हैं, लेकिन हममें अक्सर अबोला है.
अंतःकरण, साहस जोखिम, सृजनशीलता, उम्मीद-नाउम्मीदी की जुगलबंदी, संवाद और असहमति की संभावना कविता में बची है- कविता ही हमारी बची-खुची पर अनश्वर मानवीयता, उसकी ऊष्मा, आभा का लगातार बीहड़ अटपटे अबूझ होते जा रहे संसार में आख़िरी मकान है.
विश्व सभ्यता आज जिस मुक़ाम पर है उसमें शक्तिशाली-बाहुबली अत्याचारियों और शासकों, तानाशाहों, नृशंस अमीरों, क्रूर व्यापारिक धुरंधरों, कॉरपोरेट नेताओं, प्रबल टैक्नोक्रेट का वर्चस्व है. वे भी फूहड़, अक्सर अभद्र, भावहीन गद्य में बोलते और सबको डराते रहते हैं. उनकी कभी-कभार प्रकट होती भावुकता सतही और संवेदनहीन होती है. सभ्यता के धूमिल और विपर्यस्त होने, उदारता और मानवीय सहकार के शिथिल पड़ने, अंतःकरण-सहयोग के विजड़न और करुणा-सहानुभूति-सहायता-सहचारिता के कमज़ोर पड़ने की दारुण कथा और व्यथा, इस समय, संसार की अनेक भाषाओं में, कविता व्यक्त कर रही है.
कविता में, ऐसे भयानक समय में, मनुष्य होने और बने रहने की सचाई, उम्मीद और संभावना विन्यस्त हो पा रही है. इसी ने हमारे समय में कविता की एक विश्व बिरादरी अनायास गठित कर दी है और 27-28 फरवरी और 01 मार्च 2026 में हो रहा रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘संसार: अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह’ उसका साक्ष्य है.
आज सच्ची, ईमानदार और साहसी कविता, संसार में कहीं भी, जो हो रहा है उसे दर्ज कर रही है- जो नहीं हो पा रहा है उसे हिसाब में ले रही है वह गवाह है और हिस्सेदार भी. वह अवरुद्ध प्रश्न उठा रही है, वह अंधेरों-उजालों की शिनाख्त कर रही है, वह नाउम्मीदी की कारा में उजाले की दरारें देख पा रही है. वह बार-बार हमें जता रही है कि जब असंभव लगता है तब भी मनुष्य होना और बने रहना संभव है.
कविता आज बहुत सारे जलावतन हुए लोगों और कवियों की मातृभूमि है- वह बेघरबार हुओं का आख़िरी घर है. वह एक साथ सचाई का अरण्य है और शरण्य भी.
कविता की संसार में आज कई आवाजें हैं वह प्रार्थना है, विलाप है, चीख है, पुकार है वह निर्भीकता से बोल रही है: वह मनुहार है और ललकार भी. वह रोजमर्रा की ज़िंदगी में वाबस्ता है और उसी में कॉस्मिक प्रतिध्वनियां सुन पा रही है. वह संसार के बुनियादी रहस्य और विस्मय का पुनर्वास करने में लगी है. हमसे जो छूटता जाता है, कविता उसकी क्षतिपूर्ति है. याद पर रोज़ीना हमलों के बरअक़्स कविता याद को बचाए रखती और याद दिलाती है; उसमें चेतावनियां हैं, उसमें पूर्वाभास हैं और उसमें सपने देखने और दूसरों के साथ होने की क्षमता बची हुई है.

यूक्रेन की कैटरीना कैलिट्को कहती हैं कि ‘विलाप कोई आवाज़ नहीं है, हत्या अब कोई महामारी नहीं है’ लेकिन उन्हें लगता है कि ‘यही वह समय है जब हर चीज़ को नाम मिलता है/भाषा के हृदय में ही वह पनाहगाह है/जिसमें तुम प्रवेश करोगे.’
मिस्र के याहिया लाबाबीदी के लिए ‘उम्मीद बिलकुल वैसी नहीं है जैसी दिखती है./सोचा था जितना उससे ज़्यादा ही दुबली है…’.
सूडान के के. एल्टिनाए पूछते हैं, ‘और उन मानचित्रों को कौन बचाएगा/झूठ छीन ले गया जिसे सच के हाथों से?’
लिथुआनिया की आंद्रे वेलांतिनेत देखती हैं कि ‘कितने ही कोरे पन्ने स्वप्नमग्न हैं’ और फिर भी उन्हें लगता है कि ‘जीवन के गौरव को न मानना पाप होगा.’
ईराक की कवयित्री दुन्या मिखाइल याद करती हैं कि ‘हम अपने कपड़े फड़फड़ाते हुए छोड़ आए/अपने देश की छतों पर/जहां अब तक हमारी स्मृतियां/सूख गई होंगी.’
अलज़ीरिया की समीरा नेग्रूश को लगता है कि ‘हमारे बीच की जगह में असंभवों का एक बादल है/जैसे पक्षियों का गीत जिसे हम लिख नहीं सकते/वहां समय का भार है/और इतिहासों का भार जो हम साझा नहीं करते.’

उधर सीरिया के अकरम अलकात्रेब की जिज्ञासा है कि ‘कहां है पवित्र स्थान: कहां है इच्छा का वह घर जिसकी रखवाली कोई नहीं करता/तुम्हारा शरीर उन आदिम लोगों की तरह था/जो झूठ बोलना नहीं जानते थे.’
ईराक के सिनान अंतून अपनी वहशत दर्ज़ करते हैं: ‘क़ब्र एक आईना है/जिसमें झांकता है बालक/और सपना देखता है/कब तो मैं बड़ा होऊंगा/और अपने पिता की तरह/मुर्दा’.
लिथुआनिया की औश्रा कज़िलियनटे का मार्मिक बिंब है: ‘एक टेढ़ी-मेढ़ी औरत, झुकी हुई/अपनी अंतिम ताकत से एक बैग घसीट रही है,/वह वसंत से भरा हुआ है.’
इटली के आन्द्रे नाफ़िस-साहेली याद करते हैं: ‘जब मैं बच्चा था,/मेरी मां कहा करती थी/कि झूठ के पांव छोटे होते हैं,/इसलिए वह ज़्यादा दूर तक नहीं जा सकता./किसी ने उनसे झूठ कहा था.’
दूर अर्जेंटीना के कवि डेनियल लिपरा का अवलोकन हैं, ‘बड़ी लहरें बिना आवाज़ के लटकी हुई/वे नहीं जानतीं कि कहां गिरना है/जब तक हवा नहीं आती और कहती है/अब.’
स्लोवीनिया की ग्लोरयाना वेबर कहती हैं, ‘वहां से भी जहां तुम नहीं हो/मैं तुम्हें हर जगह से ले रही हूं/मैं तुम्हें हर जगह से ढो रही हूं/भाषाओं राज्यों नौकरियों परिवारों/और घरों से जेलों से कारखानों प्रसूति अस्पतालों और सड़कों महलों यहूदी बस्तियों/आसमान से/सारे धर्मों नस्लों ग़लतियों और बीमारियों से….’.
सभी विदेशी कवियों की कविताओं का अनुवाद हिंदी के जाने-माने कवियों ने किया है और उनको लगभग 350 पृष्ठों की एक पुस्तक में संकलित होकर प्रकाशित होंगे इस अवसर पर. इनमें गिरधर राठी, तेजी ग्रोवर, अम्बर पाण्डे, पूनम अरोड़ा, निधीश त्यागी, रश्मि भारद्वाज, अणु शक्ति सिंह और शोभा अक्षर शामिल हैं.
इसके अलावा भारत के तेरह चित्रकारों ने इन कवियों की कविताओं से प्रेरित तेरह रेखांकन बनाए हैं, जो समारोह में प्रदर्शित किए जाएंगे. ये चित्रकार हैं मनु पारेख, गोपी गजवानी, अमिताव दास, अतुल डोडिया, वी. रमेश, अखिलेश, मोना राय, जीआर इरन्ना, मंजुनाथ कामथ, मिठू सेन, एस. हर्षवर्द्धन, मनीष पुष्कले और मनीषा गेरा वासवानी.
देश के कई शहरों, जिनमें बनारस, लखनऊ, पटना, जयपुर, इंदौर, भोपाल, जयपुर, गोरखपुर, जबलपुर, दिल्ली आदि हैं, से अनेक वरिष्ठ और युवा कवि-लेखक समारोह में उपस्थित होने के लिए आ रहे हैं. आयोजन 27-28 फरवरी और 1 मार्च 2026 को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में होने जा रहा है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
