हरियाणा: पंचकुला भूखंड केस में भूपिंदर हुड्डा, एजेएल के ख़िलाफ़ लगे आरोप हाईकोर्ट ने ख़ारिज किए

पंचकुला में एक भूखंड के कथित अवैध पुनर्आवंटन के मामले में भूपिंदर हुड्डा और नेशनल हेराल्ड के प्रकाशक एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) के ख़िलाफ़ आपराधिक आरोपों को रद्द करते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से उनके ख़िलाफ़ प्रथमदृष्टया केस भी नहीं बनता है और उनके ख़िलाफ़ आगे बढ़ने का कोई आधार नहीं है.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: हरियाणा के दो बार के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में विपक्ष के नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा को बड़ी राहत देते हुए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने बुधवार (25 फरवरी) को पंचकुला में एक भूखंड के कथित अवैध पुनर्आवंटन के मामले में उनके और नेशनल हेराल्ड के प्रकाशक एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) के ख़िलाफ़ आपराधिक आरोपों को रद्द कर दिया.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में भूपिंदर हुड्डा और एजेएल द्वारा दायर अलग-अलग याचिकाओं को स्वीकार करते हुए जस्टिस त्रिभुवन दहिया की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ प्रथमदृष्टया मामला भी नहीं बनता है और उनके ख़िलाफ़ आगे बढ़ने का कोई आधार नहीं है.

उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट ने 16 अप्रैल, 2021 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सीबीआई की विशेष अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) और 420 (धोखाधड़ी) तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोप तय किए थे.

इस संबंध में न्यायधीश ने टिप्पणी की, ‘अभियोजन जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा…याचिकाकर्ताओं को बरी किया जाता है.’

गौरतलब है कि यह मामला, जिसे पहली बार राज्य सतर्कता ब्यूरो द्वारा 2016 में दर्ज किया गया था, भाजपा शासन के दौरान 2017 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया गया था.

एफआईआर दर्ज होने के समय अब दिवंगत नेता मोती लाल वोरा एजेएल के अध्यक्ष थे, और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी शेयरधारकों में शामिल थे. इस अख़बार की शुरुआत 1938 में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था.

सीबीआई ने दिसंबर 2018 में पंचकुला के सेक्टर 6 में स्थित 3,360 वर्ग मीटर के संस्थागत भूखंड (सी-17) के पुनर्आवंटन के संबंध में हुड्डा और एजेएल के ख़िलाफ़ आरोपपत्र दायर किया था.

सीबीआई के अनुसार, यह भूखंड मूल रूप से 1982 में हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचयूडीए) द्वारा एजेएल को आवंटित किया गया था, लेकिन 10 वर्षों तक निर्माण कार्य पूरा न होने के कारण 1992 में इसे वापस ले लिया गया था. एजेएल द्वारा 1995 और 1996 में दायर अपीलें खारिज कर दी गई थीं.

हालांकि, जब हुड्डा 2005 में मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने करोड़ों रुपये की इस जमीन का पुनर्आवंटन एजेएल को 1982 की मूल दर यानी 59 लाख रुपये पर ही करने की अनुमति दे दी. कहा गया था कि इससे सरकारी खजाने को भारी वित्तीय नुकसान हुआ.

तथ्यों की जांच किए बिना ही आरोप तय किए : हाईकोर्ट

सीबीआई के तर्कों को खारिज करते हुए अब अदालत ने कहा कि तथ्यों की जांच किए बिना ही आरोप तय किए गए थे. अदालत ने माना कि नीतियों, दिशानिर्देशों या विचारों के विरुद्ध और किसी तथ्य की जानकारी के बिना आदेश पारित करना आरोपी पर बेईमानी का आरोप लगाने का आधार नहीं हो सकता.

अदालत ने आगे कहा कि पुनर्आवंटन का निर्णय सक्षम प्राधिकारी द्वारा सर्वसम्मति से अनुमोदित किया गया था और विधिवत लागू किया गया था, और इसे किसी भी अदालत या न्यायाधिकरण द्वारा न तो अवैध घोषित किया गया था और न ही रद्द किया गया था.

अदालत ने कहा, ‘आवंटन आज की तारीख में वैध है… पुनर्आवंटन मूल्य और विस्तार शुल्क का भुगतान करने के बाद एजेएल ने निर्माण कार्य शुरू कर दिया है और उसे (2014 में) अधिभोग प्रमाण पत्र दिया गया है.’

अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी ऑडिटर्स ने भी किसी भी वित्तीय हानि के संबंध में आपत्ति नहीं जताई थी.

हाईकोर्ट ने इस मामले में एफआईआर के आधार की भी आलोचना करते हुए कहा कि इसे संबंधित प्राधिकारी की शिकायत के बजाय ‘स्रोत रिपोर्ट’ के आधार पर दर्ज किया गया था.

हुड्डा के ख़िलाफ़ किसी साजिश या धोखाधड़ी का कोई ठोस प्रमाण नहीं

अदालत ने टिप्पणी की, ‘यह समझना मुश्किल है कि जांच एजेंसी भूखंड के पुनर्आवंटन को स्वयं ही गैरकानूनी कैसे मान सकती है और उसी आधार पर आपराधिक मामला कैसे दर्ज कर सकती है. यह पूरी तरह से गैरकानूनी है और कानून द्वारा निर्धारित किसी भी प्रक्रिया के विपरीत है.’

अदालत ने कहा कि केवल इसलिए कि प्राधिकरण या सरकार के कुछ अधिकारियों के बयान दर्ज किए गए हैं कि मौजूदा दरों पर भूखंड का पुन: आवंटन करने से प्राधिकरण को अधिक धन प्राप्त होता, यह इस बात का आधार नहीं बन सकता कि वास्तव में कोई नुकसान हुआ था.

अदालत ने आगे कहा, ‘ये बयान तथ्यात्मक आधारहीन हैं. इस आधार पर यह दावा करना कि पुनर्आवंटन से प्राधिकरण को कोई नुकसान हुआ है, मनगढ़ंत है और इससे कथित अपराधों के लिए आरोप तय करने का कोई आधार नहीं बनता.’

फैसले में यह भी कहा गया है कि न तो एजेएल और न ही हुड्डा के ख़िलाफ़ किसी साजिश या धोखाधड़ी का कोई ठोस प्रमाण मिला है. केवल इस आधार पर कि वर्तमान दरों पर प्लॉट का मूल्य अधिक हो सकता था, यह मान लेना कि सरकारी एजेंसी को नुकसान हुआ, पूरी तरह काल्पनिक है और आपराधिक मामला बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है.

उल्लेखनीय है कि यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर खूब चर्चा में रहा है. ऐसे में इस फैसला एजेएल और हुड्डा के लिए एक बड़ी कानूनी राहत माना जा रहा है.