नॉर्वे के वेल्थ फंड ने अडानी ग्रीन को अपनी निवेश सूची से बाहर किया, भ्रष्टाचार के आरोपों का दिया हवाला

नॉर्वे के गवर्नमेंट पेंशन फंड ग्लोबल ने भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों का हवाला देते हुए अडानी ग्रीन एनर्जी को निवेश के लिए अयोग्य कंपनियों की सूची में डाल दिया है. इससे पहले अडानी पोर्ट्स को भी इसी आधार पर 15 मई 2024 को सूची में शामिल किया गया था.

(पृष्ठभूमि में अडानी ग्रीन वेबसाइट का स्क्रीनशॉट | गौतम अडानी तस्वीर- पीटीआई)

नई दिल्ली: दुनिया के सबसे बड़े संप्रभु संपत्ति कोषों में शामिल नॉर्वे के गवर्नमेंट पेंशन फंड ग्लोबल ने अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड में निवेश नहीं करने का फैसला किया है.

अंग्रेजी अखबार मिंट के मुताबिक, 2.2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की परिसंपत्तियों का प्रबंधन करने वाले इस फंड ने भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों का हवाला देते हुए कंपनी को ‘निवेश के लिए अयोग्य कंपनियों की सूची’ में डाल दिया है.

26 अगस्त 2025 तक फंड के पास अडानी ग्रीन में 0.23% हिस्सेदारी थी, जिसकी कीमत उस समय लगभग 4.39 करोड़ डॉलर आंकी गई थी. यह वही तारीख थी, जब फंड ने आखिरी बार कंपनी के शेयरधारक प्रस्तावों पर मतदान किया था. हालांकि, फंड का प्रबंधन करने वाले नॉर्गेस बैंक ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि उसके बाद उसने अपनी हिस्सेदारी बेची है या नहीं.

फंड की वेबसाइट पर यह निर्णय सार्वजनिक किया गया. इसके साथ ही अडानी समूह की यह दूसरी कंपनी बन गई है, जिसे नॉर्वे के इस कोष ने अपने नैतिक मानकों के अनुरूप नहीं माना. इससे पहले 15 मई 2024 को अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड को सूची में शामिल किया गया था. उस कंपनी के म्यांमार स्थित एक बंदरगाह टर्मिनल में स्वामित्व को इसका कारण बताया गया था, जहां सेना ने तख्तापलट कर लोकतांत्रिक सरकार को हटा दिया था.

नॉर्गेस ने अडानी ग्रीन के खिलाफ लगाए गए आरोपों से जुड़े विस्तृत तथ्य या सबूत सार्वजनिक नहीं किए. आमतौर पर यह फंड किसी कंपनी को बहिष्कृत करते समय कारणों का विस्तृत विवरण देता है. फंड के प्रवक्ता ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, जबकि अडानी समूह की ओर से भी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई.

विदेशी निवेशकों पर असर संभव

विशेषज्ञों का मानना है कि नॉर्गेस जैसे बड़े वैश्विक निवेशक का फैसला अन्य विदेशी निवेशकों को भी प्रभावित कर सकता है. प्रॉक्सी एडवाइजरी फर्म इनगवर्न के प्रबंध निदेशक श्रीराम सुब्रमणियन का कहना है कि इससे कुछ विदेशी निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेचने पर विचार कर सकते हैं, हालांकि कंपनी की नए निवेशक जुटाने की क्षमता पर इसका सीधा असर नहीं पड़ेगा. उनके अनुसार, निवेशकों की अलग-अलग श्रेणियां होती हैं और कंपनियों के पास पूंजी जुटाने के कई विकल्प उपलब्ध रहते हैं.

नॉर्गेस दुनिया के कुल सूचीबद्ध बाजार पूंजीकरण का लगभग 1.5% हिस्सा अपने पास रखता है. ऐसे में उसके निवेश संबंधी फैसलों को वैश्विक बाजार में गंभीरता से देखा जाता है.

निवेश के सख्त मानदंड

नॉर्गेस का निवेश ढांचा नॉर्वे के कानून के तहत तय होता है. यह फंड तंबाकू या भांग उत्पादों से जुड़ी कंपनियों, कोयला खनन या कोयला आधारित ऊर्जा उत्पादन करने वाली कंपनियों, परमाणु हथियार तंत्र से जुड़ी संस्थाओं या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों का सामना कर रही कंपनियों में निवेश नहीं करता.

इन्हीं सख्त मानकों के चलते वॉरेन बफेट की बर्कशायर हैथवे इंक. जैसी कंपनी भी इसकी बहिष्करण सूची में शामिल है, क्योंकि उसके निवेश कोयला क्षेत्र से जुड़े रहे हैं.

फिलहाल इस सूची में भारत की 16 कंपनियां शामिल हैं, जिनमें भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, आईटीसी लिमिटेड, वेदांता लिमिटेड, कोल इंडिया लिमिटेड, एनटीपीसी लिमिटेड और टाटा पावर लिमिटेड जैसी कंपनियों के नाम हैं.

अमेरिका में कानूनी मामला

नवंबर 2024 में अमेरिकी नियामकों ने अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी सहित कुछ अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और प्रतिभूति धोखाधड़ी के आरोपों में अभियोग दायर किया था. अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसी) और न्याय विभाग (डीओजे) ने आरोप लगाया कि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े ठेके हासिल करने के लिए कथित तौर पर रिश्वत दी गई और बाद में अमेरिका से धन जुटाते समय इन तथ्यों का खुलासा नहीं किया गया.

यह मामला फिलहाल अमेरिकी अदालत में लंबित है. अडानी समूह पहले ही सभी आरोपों से इनकार कर चुका है. जनवरी में अडानी ग्रीन ने स्पष्ट किया था कि कानूनी कार्यवाही कंपनी के कुछ अधिकारियों के खिलाफ है, न कि कंपनी के खिलाफ.

हाल ही में एसईसी और अडानी पक्ष के वकीलों के बीच अमेरिकी जिला अदालत में दस्तावेज दाखिल करने की समयसीमा तय की गई है, जिससे संकेत मिलता है कि यह कानूनी प्रक्रिया लंबी चल सकती है.