नई दिल्ली: जर्मनी की राजधानी बर्लिन में गुरुवार (5 मार्च) को बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए. सेंट्रल पोट्सडामर प्लात्स से शुरू हुआ यह मार्च सरकार की उस योजना के विरोध में था, जिसके तहत अनिवार्य सैन्य सेवा को दोबारा लागू करने की तैयारी की जा रही है. प्रदर्शनकारी शहर के अलग-अलग हिस्सों से गुजरते हुए सरकार के प्रस्ताव का विरोध करते रहे.
पुलिस के अनुसार बर्लिन में इस प्रदर्शन में करीब 3,000 लोग शामिल हुए, जबकि आयोजकों का दावा है कि राजधानी में करीब 6,000 लोग जुटे थे. उनका कहना है कि जर्मनी के 130 से अधिक शहरों और कस्बों में हुए इसी तरह के प्रदर्शनों में कुल लगभग 50,000 लोग शामिल हुए.
स्कूल स्ट्राइक कमेटी के प्रवक्ता 17 वर्षीय श्मुएल शात्स ने डॉयचे वेले (डीडब्ल्यू) से बातचीत में कहा कि उन्हें इस बात पर आपत्ति है कि युवाओं को युद्ध के लिए तैयार किया जा रहा है.
उनका कहना था, ‘मुझे नहीं लगता कि सबसे बुरे हालात में मैं अपने दोस्तों या रिश्तेदारों के लिए मरने जा रहा हूं. अंत में लोगों को बड़ी कंपनियों, जैसे- राइनमेटाल या थिसेनक्रुप, के हितों के लिए खतरा उठाने भेज दिया जाएगा, ताकि वे युद्ध से मुनाफा कमा सकें.’
सरकार की नई सैन्य सेवा योजना
ज्ञात हो कि दिसंबर 2025 में जर्मन सरकार ने सैन्य सेवा से जुड़ा नया कानून पेश किया था. इसके तहत इस साल 18 वर्ष के सभी युवाओं को एक प्रश्नावली भेजी जाएगी, जिसमें उनसे सेना में शामिल होने की उनकी रुचि और उपयुक्तता के बारे में पूछा जाएगा. साथ ही उन्हें बुंडेसवेहर (जर्मन सेना) में स्वेच्छा से भर्ती होने की जानकारी भी दी जाएगी.
इस प्रश्नावली का जवाब देना पुरुषों के लिए अनिवार्य होगा.
सेना की संख्या बढ़ाने का लक्ष्य
प्रदर्शन में शामिल एक अन्य प्रवक्ता 19 वर्षीय किरण शुर्मान का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से सेना में जाना चाहता है तो यह उसका फैसला होना चाहिए, लेकिन किसी को मजबूर करना सही नहीं है. उन्होंने कहा, ‘जो लोग स्वेच्छा से जाना चाहते हैं, वे जा सकते हैं. लेकिन किसी को मजबूर करना समाधान नहीं है.’
ऐसा बताया जा रहा है कि सरकार सेना की संख्या बढ़ाना चाहती है. पिछले साल उसने सैनिकों की संख्या 1,80,000 से बढ़ाकर लगभग 2,60,000 करने का लक्ष्य तय किया था. इसके अलावा करीब 2,00,000 रिज़र्व सैनिकों की भी योजना बनाई गई है. लेकिन यदि स्वेच्छा से भर्ती होने वाले युवाओं की संख्या तय लक्ष्य तक नहीं पहुंचती, तो सरकार अनिवार्य सैन्य भर्ती (कंसक्रिप्शन) को फिर से लागू करने पर विचार कर सकती है.
इस बीच सशस्त्र बलों के लिए संसदीय आयुक्त हेनिंग ओट्टे, जो क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) से हैं, ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि केवल स्वैच्छिक भर्ती के जरिए लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है.
सैन्य सेवा से इनकार करने वालों की संख्या बढ़ी
ख़बरों के मुताबिक, सरकार की योजना सामने आने के बाद जर्मनी में एक नई प्रवृत्ति भी देखने को मिल रही है. कई लोग व्यक्तिगत विश्वास के आधार पर सैन्य सेवा से इनकार करने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी लेने लगे हैं.
जर्मनी के संविधान, जिसे बेसिक लॉ कहा जाता है, में नागरिकों को सेना में शामिल न होने का अधिकार दिया गया है. इसी कारण कई संगठन ऐसे लोगों को परामर्श भी देते हैं जो सैन्य सेवा से इनकार करना चाहते हैं.
आंकड़े बताते हैं कि 2025 में ऐसे मामलों में तेज़ बढ़ोतरी हुई. फेडरल ऑफिस फॉर फैमिली अफेयर्स एंड सिविल सोसाइटी के मुताबिक पिछले साल 3,867 लोगों ने व्यक्तिगत विश्वास के आधार पर सैन्य सेवा से इनकार करने के लिए आवेदन किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 72 प्रतिशत अधिक है.
जर्मनी में पहले भी रही है अनिवार्य सेवा
जर्मनी में कई दशकों तक अनिवार्य राष्ट्रीय सेवा लागू रही थी. उस समय युवाओं को सेना के बजाय नागरिक सेवा करने का विकल्प भी मिलता था.
यह व्यवस्था 2011 में निलंबित कर दी गई थी. हालांकि जरूरत पड़ने पर इसे फिर से लागू किया जा सकता है. इसके लिए जर्मन संसद (बुंडेस्टाग) को देश में तनाव या राष्ट्रीय रक्षा की स्थिति घोषित करनी होगी, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी है.
यदि ऐसी स्थिति घोषित होती है, तो सैद्धांतिक रूप से 18 से 60 वर्ष तक के पुरुषों को सैन्य सेवा के लिए बुलाया जा सकता है.
देशभर में बढ़ता विरोध
गुरुवार का यह प्रदर्शन जर्मनी में आयोजित दूसरा ‘स्कूल स्ट्राइक’ था. इससे पहले दिसंबर 2025 में भी इसी मुद्दे पर देश के 90 शहरों में लगभग 55,000 लोगों ने प्रदर्शन किया था.
युवाओं का कहना है कि सरकार को सैन्य विस्तार के बजाय शिक्षा, सामाजिक कल्याण और शांति की दिशा में संसाधन खर्च करने चाहिए.
