नक्सलवाद का अंत, और जवाबदेही भी ख़त्म!

सफलता के इस नशे, जो अपने चरम पर है, में कुछ माओवादियों और ज़्यादातर पुलिस बलों के द्वारा पिछले बीस सालों में की गई हज़ारों हत्याओं के लिए किसी को भी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा रहा है. सलवा जुडूम के कारण औरतों का बलात्कार हुआ, सौ से भी ज़्यादा गांवों को आग लगा दिया गया और बस्तर में हज़ारों की संख्या में लोग विस्थापित हुए. लेकिन 'सफलता' के शोर में इन घटनाओं पर उठाए गए सवाल अनसुने कर दिए जा रहे हैं.

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2023 की यह तस्वीर छत्तीसगढ़ के चांदमेटा गांव की है, जहां माओवादियों ने एक स्मारक बनाया था, उस समय यह इलाका उनका गढ़ माना जाता था. (फोटो: श्रावस्ती दासगुप्ता/द वायर)

सरकार जब सीपीआई (माओवादी) के ऊपर जीत का दावा करती है, तब इसके परिणामस्वरूप हुई अपनी एक हार को वो छिपा भी रही होती है: संवैधानिक जवाबदेही का अंत और इस अपराध से बच निकलने को सामान्य कर देने की कवायद.

बहुत सारे माओवादी नेताओं और सशस्त्र कैडरों के आत्मसमर्पण के साथ, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा तय की गई 31 मार्च की समयसीमा तक नक्सलवाद भले ही ख़त्म होने की कगार पर हो, लेकिन दो दशकों तक चली हत्याओं, विस्थापन और सज़ा से मुक्ति के सवाल का जवाब नहीं मिलता. पिछले दो सालों में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) के गुरिल्ला/लड़ाकू सदस्यों को अपने पक्ष में लाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर हत्याओं और प्रलोभनों का गहन और विस्तृत दौर चला है.

सरकारी अनुमान के मुताबिक, साल 2024 और 2026 के बीच में 706 नक्सलियों को मुठभेड़ में मार गिराया गया, 2,218 को गिरफ़्तार किया गया, जबकि 4,839 से आत्मसमर्पण करवाया गया. गिनती में बचे मुश्किल से 100 या उसके आस-पास के कैडर या तो धीरे-धीरे आत्मसमर्पण कर रहे हैं, या फिर महिला माओवादी नेता रूपी, जिसे अप्रैल 2026 में कांकेर में मार डाला गया, की तरह उन्हें भी मुठभेड़ में मार गिराया जा रहा है.

आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों को मीडिया के समक्ष पेश किया जा रहा है, जहां वो कर्तव्यनिष्ठा के साथ अब आगे से संविधान की दायरे में रहकर काम करने की बात करते हैं. लेकिन एक बात जो पूरी तरह स्पष्ट है वो यह है की संविधान की प्राथमिकता यहां किसी के भी, खासतौर पर सरकार के, मन या इरादे में बिल्कुल ही नहीं है.

केंद्र सरकार और उनके सैटेलाइट के तौर पर काम कर रही राज्य सरकारों ने नक्सलियों को मात देने के लिए जो रवैया अपनाया है, वो संविधान के प्रति जवाबदेही के अंत को ही दर्शाता है.

एक राष्ट्र के जीवन में सशस्त्र संघर्ष आते और जाते रहेंगे, लेकिन जनता के द्वारा चुनी हुई एक सरकार के द्वारा संविधान और कानून के शासन के प्रति उपेक्षा के दूरगामी दुष्परिणाम होते हैं.

जवाबदेही की कमी उनके द्वारा अपनाये गए तात्कालिक रास्तों में प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं.

पहला तो, पिछले दो सालों में हुए मानवाधिकारों के ज़बरदस्त दमन पर विचार करने से इनकार करने में. और दूसरा, पूर्व माओवादियों की सुरक्षा बलों में भर्ती, पहले डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड (डीआरजी) के तौर पर, और अब जैसा हमें बताया गया, सामान्य पुलिस में. बाद वाला जो है, वो भाजपा की महान ह्वाइट वॉशिंग मशीनरी की आक्रामक और स्थानीय इकाई है, जिनका इस्तेमाल चुनावी विरोधियों को अपने खेमे में आने को मजबूर करने के लिए किया जाता है.

सुरक्षा बलों में शामिल होने से पहले डीआरजी वांछित माओवादी थे, जिनके नाम मुक़दमे और सिर पर इनाम थे. सुरक्षा बलों में शामिल होने के बाद भी इनके नाम जो मुक़दमे दर्ज थे उन्हें वापस नहीं लिया गया, ताकि इनके गर्दन पर तलवारें लटकती रहे. ऐसी स्थिति में इनकी मजबूरी का इस्तेमाल कर औरों को नियंत्रित करने की ताक़त मिल जाती है.

यहीं अगर आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों को सुरक्षा बलों में शामिल किए जाने की एक उचित प्रक्रिया होती, जैसा दुनिया की दूसरी जगहों में संघर्ष विराम की परिस्थितियों में हुआ, तो इस समस्या का हल निकाला जा सकता था. अब तो हमारे यहां ऐसी परिस्थिति बन गई है जहां पुलिस बल के पदों पर एक बड़ा हिस्सा ही ऐसे लोगों का है जिनकी छवि आपराधिक रही है.

मानवाधिकार उल्लंघनों पर कोई सज़ा नहीं

सफलता के इस नशे, जो कि अपने चरम पर है, में कुछ माओवादियों और ज़्यादातर पुलिस बलों के द्वारा पिछले बीस सालों में की गई हज़ारों हत्याओं के लिए किसी को भी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा रहा है. सलवा जुडूम के कारण औरतों का बलात्कार हुआ, सौ से भी ज़्यादा गांवों को आग लगा दी गई और बस्तर में हज़ारों की संख्या में लोग विस्थापित हुए.

इन ज़्यादतियों का विस्तृत विवरण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) जैसी संवैधानिक संस्थानों द्वारा संग्रहित किए गए उन बयानों में है, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय को सौंपा गया है. न्यायिक जांच में पाया गया कि सुरक्षा बलों ने निहत्थे नागरिकों की हत्या की है.

उदाहरण के लिए, 2012 में सरकेगुड़ा में हुई 17 ग्रामीणों की हत्या हुई, 2013 में एडेसमेट्टा में आठ लोगों को मौत के घाट उतारा गया. लेकिन सुरक्षाकर्मियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, और ना ही सुरक्षा, प्रशासनिक या राजनीतिक प्रमुखों पर इन निर्दोष नागरिकों की मौत की ज़िम्मेदारी तय की गई. बजाय ज़िम्मेदारी लेने के, सारे सेवारत या सेवानिवृत पुलिस अधिकारी ये दावा करने में व्यस्त थे कि मानवाधिकार हनन के आरोप सुरक्षा बलों के मनोबल को तोड़ने की मनोवैज्ञानिक रणनीति है.

द साउथ एशियन टेररिज़म पोर्टल (एसएटीपी), न्यूज़ रिपोर्ट्स के आधार पर अनुमान लगाता है कि साल 2000 से 2026 के बीच 4,138 निर्दोष नागरिक, 2,723 सुरक्षा बल के लोग, और 5,069 माओवादी, यानी कुल 12,182 लोग मारे गए. स्पष्ट है कि यह आकलन वास्तविकता से बहुत दूर है.

2005 से 2007 के बीच जब सलवा जुडूम अपने चरम पर था तब भी उतनी हत्याएं नहीं हुईं जितनी 2024 और 2026 के बीच हुई हैं.

द कैंपेन फॉर पीस एंड जस्टिस इन छत्तीसगढ़ (सीपीजेसी) हर मुठभेड़ की संख्या में औसतन वृद्धि (2023 में 0.29 से बढ़कर 2024 में 1.79) की ओर ध्यान दिलाते हुए कहती है कि यह इस बात को दर्शाता है कि गिरफ़्तारी और आत्मसमर्पण के बजाय मुठभेड़ को प्राथमिकता दी गई. मारे गए लोगों में से बहुत सारे आम नागरिक थे.

छत्तीसगढ़ में लागू हुई नक्सलवादी आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत पुनर्वास नीति – 2025 के सेक्शन 8.8 में नक्सलवादियों को ‘ज़िंदा या मुर्दा’ पकड़वाने पर लाखों रुपये के इनाम का प्रावधान है. ज़ाहिर है यह घोषणा निर्दोष लोगों की हत्या कर उन्हें वांछित माओवादी के तौर पर पेश करने को प्रेरित करता है.

एक तो वांछित माओवादियों की कोई सार्वजनिक सूची है ही नहीं, जिससे मारे गए तथाकथित माओवादियों का मिलान किया जा सके, और ना ही इनाम की राशि के हक़दार को पैसे दिए जाने को लेकर कोई सार्वजनिक जवाबदेही, फिर चाहे वो ख़ुद आत्मसमर्पण करने वाला माओवादी हो या उन्हें पकड़ने, मारने और पुलिस के हवाले करने वाला कोई व्यक्ति. बहुत सारे निचले दर्जे के कैडर, जिनसे कहा गया था कि अगर वो आत्मसमर्पण कर दें तो उन्हें पैसे दिए जाएंगे, ने बताया कि उन्हें कुछ भी नहीं मिला.

जहां तक माओवादियों की बात है, वे सालों से संदिग्ध मुखबिरों की हत्याओं के ज़िम्मेदार रहे हैं. माओवादियों के भय से इनमें से बहुत सारी हत्याओं को रिपोर्ट ही नहीं किया गया, और जिन्हें रिपोर्ट किया गया, वो हत्याएं वास्तव में राज्य के पुलिस बलों के द्वारा की गई थी.

नक्सलियों के पीड़ितों को आधिकारिक मुआवज़े का भुगतान, सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार आदेश के बावजूद, राज्य के पुलिस बलों के पीड़ितों को मुआवज़े की मनाही ने भी हत्याओं के आंकड़ों को विकृत किया है. लेकिन आधिकारिक डेटा कुछ भी हो, ये मौतें जहां हुई हैं, वहां के गांवों में इन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता.

जिस तरह स्पेशल पुलिस अधिकारियों और उनके परिवार वाले, जिन्होंने मानवाधिकार हनन का अपराध किया है, के लिए अपने गांवों में लौटना आसान नहीं रह गया है, ठीक उसी तरह संदिग्ध मुखबिरों की हत्या में शामिल माओवादियों को भी अपने गांवों में लौटकर मारे गए मुखबिरों के परिवार के ग़ुस्से का सामना करना पड़ सकता है.

आत्मसमर्पण कर चुके माओवादी नेताओं में से ज़्यादातर अब भी पुलिस की गिरफ़्त में हैं. यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि कब उनकी रिहाई होगी, और उनके विरुद्ध दर्ज मुक़दमों का क्या होगा. और सरकार अगर इन मुक़दमों को कमज़ोर करने की अनुमति देती भी है, फिर भी हैं तो ये कानूनी व्यवस्था के घेरे में ही.

कानूनी सवाल से परे यहां एक मुद्दा सामान्य जन के प्रति जवाबदेही का भी है. यह सच है कि भाजपा अपने शासन में सीपीआई (माओवादी) की आंतरिक विचार विमर्श की संभावना और फिर ज़्यादा व्यवस्थित बातचीत के जरिए बाहर खुले में आने की प्रक्रिया को वहन नहीं कर सकी. लेकिन एक बार 2012 से जहां बस्तर में सुरक्षा शिविरों की संख्या में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई, पैसे लेकर सूचना देने वाले मुखबिरों की संख्या भी उसी हिसाब से बढ़ी, और वहां भोजन का पहुंचना भी मुश्किल हो गया, ख़तरे की घंटी बज चुकी थी.

सिविल सोसाइटी के अनुरोध पर अगर माओवादी पहले ही बाहर आ गए होते तो वे न केवल अपने व्यक्तिगत अस्तित्व बल्कि आदिवासियों की मांगों को लेकर भी बातचीत करने की स्थिति में होते. माओवादियों ने अपना जीवन आदिवासियों के लिए न्योछावर कर दिया, लेकिन बदलते आर्थिक और राजनीतिक परिवेश को समझने से इनकार करना न केवल उनके बल्कि उन लोगों के लिए भी घातक साबित हुआ जिनके लिए वो लड़ने का दावा करते हैं.

संवैधानिक उल्लंघनों के लिए श्रेय की होड़

30 मार्च को संसद में बोलते हुए अमित शाह ने नक्सलवाद को ख़त्म करने का श्रेय लिया, कांग्रेस पर इसे बढ़ावा देने का आरोप लगाया, संसदीय वामपंथ को विदेशी ताक़तों का एजेंट बताकर ख़ारिज किया, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं पर हमला बोला, और जस्टिस सुदर्शन रेड्डी को लंबे समय से चले आ रहे नक्सलवाद के लिए, और 2011 के उनके सलवा जुडूम के फैसले को सैकड़ों मौतों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया.

अमित शाह को सुनते हुए कोई एक पल को यह भूल भी सकता है कि संविधान और भारतीय दंड संहिता नाम की भी कोई चीज है, जो इन मौतों के लिए जवाबदेही तय करती है, और गृह मंत्री के तौर पर विधि के शासन को कायम रखने की ज़िम्मेदारी उनकी ही है.

जहां तक कांग्रेस की बात है, तो उन्हें इस बात कि जलन है कि माओवाद का अंत उनकी देखरेख या शासन में नहीं हो पाया, बावजूद इस तथ्य के कि सत्ता में रहने के दौरान अपने एक के बाद एक मिलिट्री अभियान, उनके सुरक्षा शिविर, और माहिर नक्सल विरोधी बलों के साथ इसकी आधारशिला उन्होंने ही तैयार की थी.

अब चाहे यूपीए हो या एनडीए, इन नक्सल विरोधी अभियानों में अजित डोभाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, और इनकी नीतियों में भी कोई खास अंतर नहीं है. 2004-05 में इंटेलिजेन्स ब्यूरो चीफ़ के तौर पर जिस विनाशकारी सलवा जुडूम की शुरुआत उन्होंने की थी, उसने वास्तव में माओवादियों को एक बड़ा धक्का दिया. वो बाशिंदे जिनके गांवों को जला दिया गया या जिनके रिश्तेदारों को राज्य की पुलिस के द्वारा मार डाला गया, उनके पास सिवाय इसमें शामिल होने के कोई और चारा नहीं था.

न्यायपालिका भी कोई सवाल नहीं कर रही है, और जस्टिस रेड्डी पर हुए अनुचित हमले को संसदीय कार्यवाही में रिकॉर्ड होने की अनुमति दे रही है. अमित शाह जब जस्टिस रेड्डी की निंदा कर रहे थे तब वो दरअसल पूरे सर्वोच्च न्यायालय का अपमान कर रहे थे.

2007 में जब सलवा जुडूम के विरुद्ध याचिका दायर की गई, और 2025 में जब इसका निपटारा किया गया, तब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के 24 अलग-अलग जजों के सामने से गुज़रा, जिनमें कुछ मुख्य न्यायाधीश भी थे. सर्वोच्च न्यायालय की हर पीठ इस समस्या के पैमाने से अच्छी तरह परिचित थी, और उन्होंने एफआईआर और मुआवज़े के रजिस्ट्रेशन का निर्देश दिया.

यहां तक कि अपने 15 मई 2025 के फैसले में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश शर्मा ने 2011 के आदेश को दोहराते हुए कहा कि, ‘हम यह ध्यान दिलाना चाहते हैं कि यह स्टेट ऑफ छत्तीसगढ़ के साथ-साथ यूनियन ऑफ इंडिया का कर्तव्य है, …वे स्टेट ऑफ छत्तीसगढ़ के उन वासियों को शांति और पुनर्वास प्रदान करने के लिए पर्याप्त कदम उठाएं, जो चाहे किसी भी ओर से शुरू हुई हिंसा से प्रभावित हुए हैं (पारा 13, इटैलिक्स माइन).’

दरअसल सलवा जुडूम को प्रतिबंधित किए जाने के फैसले से जिन्हें सबसे अधिक फ़ायदा हुआ वो माओवादी नहीं बल्कि आत्मसमर्पण कर चुके इसके कैडर थे जो स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर्स (एसपीओ) के तौर पर नियुक्त किए गए थे, और इसके बाद (डीआरजी), जिन्हें अच्छी ख़ासी तनख़्वाह और अत्याधुनिक हथियार उपलब्ध कराए गए थे.

एसपीओ पर लगे मानवाधिकार हनन के गंभीर आरोपों को देखते हुए अदालत ने उग्रवाद विरोधी अभियानों में उनकी सेवा लेने पर प्रतिबंध लगा दिया, और निर्देश दिया कि उन्हें ट्रैफ़िक पुलिस या अन्य कामों में लगाया जाए. और ये भी तभी होना था जब मानवाधिकार हनन के आरोपों के दोषियों की छंटनी कर दी जाए. लेकिन ये कभी हुआ ही नहीं. बल्कि इस आदेश को चतुराई से दरकिनार करने के लिए, छत्तीसगढ़ ने ऑग्ज़िलीयरी आर्म्ड पुलिस फ़ोर्सेज़ एक्ट 2011 लागू कर दिया.

एक हलफ़नामे में, जिस पर झूठी गवाही और झूठे साक्ष्यों की धारा लगानी चाहिए थी, वहां छत्तीसगढ़ सरकार ने ये दावा किया कि उसने सारे एसपीओ को निःशस्त्र कर दिया है और उन्हें उग्रवाद विरोधी अभियानों में नहीं लगा रही है. इस एक्ट का नाम ही अपने आप में एक छलावा है. एक ओर जहां यह सहायक सशस्त्र बल के नाम से जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर इस एक्ट का उद्देश्य ‘सुरक्षा बलों के सहायक के रूप में उनकी मदद करना…माओवादी हिंसा और विद्रोह को रोकना, नियंत्रित करना और उनसे लड़ना’ (4.1) बताता है.

क़ैदियों और आत्मसमर्पण कर चुके लोगों की विडंबना

नक्सलवाद के ‘ख़ात्मे’ की इस अस्पष्ट और कानूनी रूप से दिशाहीन प्रक्रिया की कई विडंबनाओं में से एक उन लोगों की तक़दीर है, जिन्हें माओवादियों से सहानुभूति रखने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है. एक तरफ़ मानवाधिकार वकील सुरेंद्र गाडलिंग जैसे लोग हैं, जो 2018 से जेल में बंद हैं; वहीं उनके साथ एल्गार परिषद मामले में आरोपित सोलह में से कई अन्य लोग जमानत पर रिहा तो हैं, लेकिन लंबित मुक़दमों के जंजाल में फंसे हुए हैं, और यह सब उस स्थिति में, जबकि उनके ख़िलाफ़ पेश किए गए पुलिस साक्ष्य के फ़र्ज़ी होने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं.

और दूसरी तरफ हैं बस्तर के मूलवासी बचाओ मंच के रघु मिड़ीयामी, सुनीता पोट्टम जैसे कई युवा नेता, जिन्हें यूएपीए लगाकर दो सालों से भी अधिक से अलग-अलग समय के अन्य चालीस कार्यकर्ताओं के साथ जेल में बंद रखा गया है. एक टूटी उंगली के इलाज जैसे साधारण अधिकार को भी एनआईए द्वारा रोका जाता है.

मूलवासी बचाओ मंच ने अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए संविधान की पांचवी अनुसूची और अपनी ज़मीन बचाने के पेसा जैसे संवैधानिक नियमों के तहत संघर्ष जारी रखा है. ज़ाहिर है कि खनन कंपनियों के दबाव के आगे स्थानीय लोगों का यह शांतिपूर्ण आंदोलन अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए माओवादियों से भी बड़ा खतरा है.

सैकड़ों आदिवासी लंबे समय से कानूनी यातनाएं झेलते हुए जेलों में क़ैद हैं. स्टेन स्वामी को इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने 102 विचाराधीन क़ैदियों से साक्षात्कार के आधार पर झारखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिससे यह सामने आया कि माओवादी होने के आरोप में गिरफ़्तार लोगों में से 97 प्रतिशत का माओवाद से कोई लेना-देना नहीं था.

ग्रामीणों के लिए आत्मसमर्पण एक बहुत ही फ़िज़ूल की क़ानूनी प्रक्रिया है. उदाहरण के लिए सुकमा के एक जाने माने सरपंच को लेते हैं. उन्हें 2010 में ताड़मेटला में हुए एक अटैक के फ़र्ज़ी मुक़दमे में फंसाया गया. उस हमले में सीआरपीएफ के सत्तर जवान मारे गए थे. गिरफ़्तारी से बचने के लिए वह भूमिगत हो गया लेकिन 2017 में पकड़ लिया गया. यातना दे देकर उच्च न्यायालय में उन्हें ये बयान देने पर मजबूर कर दिया गया कि उन्होंने वास्तव में आत्मसमर्पण किया था. इसके बाद अपने गांव लौटने से पहले तक उन्होंने कुछ समय पुलिस के साथ काम किया.

2017 में उन्होंने जो आत्मसमर्पण किया था, उसके आधार पर 2024 में उन्हें फिर से गिरफ़्तार कर लिया गया. दो साल जेल में बिताने के बाद उन्हें सारे मुक़दमे से बरी कर दिया गया. जब मुक़दमे लंबिित हों तब आत्मसमर्पण का कोई मतलब नहीं रह जाता है, और अपनी सुविधानुसार पुलिस उन मुक़दमों को कभी भी सक्रिय कर सकती है.

संवैधानिक शांति के रास्ते

जहां सरकार और माओवादी संवैधानिक दायरे से बाहर एक-दूसरे से तालमेल बिठा रहे हैं, वहीं सिविल सोसाइटी के लोगों को कानून के शासन की मांग ज़रूर करनी चाहिए. कम से कम सरकार को इतना तो करना ही चाहिए कि नक्सल होने के झूठे आरोपों में गिरफ़्तार लोगों को फ़ास्ट-ट्रैक सुनवाई के ज़रिए रिहा करे और यह सुनिश्चित करे कि उन पर दर्ज सभी पुराने मुक़दमे वापस ले लिए जाएं.

अदालतों को सार्वजनिक जांच के आदेश देने चाहिए, जिसमें 2000 से अब तक हुई मौतों का रिकॉर्ड दर्ज हो और प्रभावित लोगों को मुआवज़ा मिले, जिसमें बलात्कार और आगजनी के पीड़ित भी शामिल हों. सरकेगुड़ा और एडेसमेट्टा में हुई न्यायिक जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए.

अब, जबकि सभी जिलों को ‘एलडब्ल्यूई फ्री’ (वामपंथी चरमपंथ मुक्त) घोषित कर दिया गया है, सरकार को बस्तर में हर दो से पांच किलोमीटर पर फैले कंटीले तारों से घिरे बदसूरत सुरक्षा शिविरों को हटाना चाहिए और उन ज़मीनों को ग्रामीणों को वापस करना चाहिए, जिनसे ये छीनी गई थीं. अभी भले ही वहां शांति हो, लेकिन यह शांति न्याय से रहित है.

नंदिनी सुंदर ‘दी बर्निंग फ़ॉरेस्ट : इंडियाज वार अगेन्स्ट माओइस्ट’ की लेखिका हैं.

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(मूल अंग्रेजी से कुमार निशांत द्वारा अनूदित)