नई दिल्ली: ‘मुझे कुछ कहना है क्योंकि मैं अपनी मां की बेटी हूं और मुझे हिम्मत जुटाकर यह कहना ही होगा. यह उस युद्ध के बारे में एक छोटा-सा बयान है जो पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेने वाला है.’
यह बात 9 मार्च को दिल्ली के कमानी सभागार में लेखिका अरुंधति रॉय ने अपनी किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ पर चर्चा के बाद कही. उन्होंने ईरान पर अमेरिका-इज़रायल हमले को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें सामने रखीं. साथ ही मौजूदा समय में जारी पूरे पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान भारत सरकार की चुप्पी पर भी सवाल उठाए.
उन्होंने कहा, ‘मुझे पता है कि हम आज यहां ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ के बारे में बात करने के लिए इकट्ठा हुए हैं. लेकिन उन खूबसूरत शहरों – तेहरान, इस्फ़हान और बेरूत – के बारे में बात किए बिना हम इसे कैसे खत्म कर सकते हैं जो आग की लपटों में घिरे हैं?’
अरुंधति रॉय ने आगे कहा, ‘अपनी मां मैरी की स्पष्टवादिता और बेबाकी के अनुरूप, मैं इस मंच का उपयोग अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए बिना किसी कारण और अवैध हमले के बारे में कुछ कहने के लिए करना चाहूंगी. यह निश्चित रूप से ग़ाज़ा में अमेरिकी-इज़रायली नरसंहार की निरंतरता है. ये वही पुराने नरसंहार करने वाले हैं जो वही पुरानी रणनीति अपना रहे हैं. महिलाओं और बच्चों की हत्या करना. अस्पतालों पर बमबारी करना. शहरों पर अंधाधुंध बमबारी करना. और फिर खुद को पीड़ित दिखाना.’
‘ईरान ग़ाज़ा नहीं है, युद्ध का दायरा पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकता है’
उन्होंने आगे जोड़ा, ‘लेकिन ईरान ग़ाज़ा नहीं है. इस नए युद्ध का दायरा पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकता है. हम परमाणु तबाही और आर्थिक पतन की कगार पर हैं. जिस देश ने हिरोशिमा और नागासाकी पर बमबारी की, वही दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक पर बमबारी करने की तैयारी कर रहा हो सकता है. इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने के और भी अवसर आएंगे, इसलिए अभी मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि मैं ईरान के साथ खड़ी हूं. पूरी तरह से. अमेरिका, इज़रायल और हमारी सरकार सहित, जिन भी शासन व्यवस्थाओं को बदलने की ज़रूरत है, उन्हें जनता द्वारा बदला जाना चाहिए, न कि किसी अहंकारी, झूठे, धोखेबाज, लालची, संसाधन हड़पने वाले, बम गिराने वाले साम्राज्यवादी और उसके सहयोगियों द्वारा, जो पूरी दुनिया को अपने अधीन करने की कोशिश कर रहे हैं.’
अरुंधति रॉय के अनुसार, ‘ईरान इन चुनौतियों का डटकर सामना कर रहा है, जबकि भारत डरपोक बना हुआ है. मुझे शर्म आती है कि हमारी सरकार कितनी कायर और रीढ़विहीन रही है. बहुत समय पहले हम एक गरीब देश थे, जहां बहुत गरीब लोग रहते थे. लेकिन हमें गर्व था. हमारे पास सम्मान था. आज हम एक समृद्ध देश हैं, जहां बहुत गरीब और बेरोजगार लोग रहते हैं, जिन्हें असली भोजन के बजाय नफरत, जहर और झूठ परोसा जाता है. हमने अपना गौरव खो दिया है. हमने सम्मान खो दिया है. हमने साहस खो दिया है. सिवाय हमारी फिल्मों के.’
‘हम किस तरह के लोग हैं जिनकी चुनी हुई सरकार अमेरिका द्वारा दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों के अपहरण और हत्याओं की निंदा करने के लिए खड़ी नहीं हो सकती? क्या हम चाहेंगे कि हमारे साथ भी ऐसा ही हो? हमारे प्रधानमंत्री का ईरान पर हमले से कुछ ही दिन पहले इज़रायल जाकर बेंजामिन नेतन्याहू को गले लगाना- इसका क्या मतलब है?
हमारी सरकार का अमेरिका के साथ एक ऐसा व्यापार समझौता करना जो हमारे किसानों और कपड़ा उद्योग को पूरी तरह से बर्बाद कर देता है, और यह सब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के टैरिफ को अवैध घोषित किए जाने से कुछ ही दिन पहले हुआ- इसका क्या मतलब है? अब हमें रूस से तेल खरीदने की ‘अनुमति’ दी जा रही है- इसका क्या अर्थ हुआ? हमें और किस चीज़ के लिए अनुमति चाहिए? बाथरूम जाने के लिए? काम से छुट्टी लेने के लिए? अपनी मां से मिलने के लिए?’
वे सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहती हैं, ‘हर दिन डोनाल्ड ट्रंप समेत अमेरिकी राजनेता सार्वजनिक रूप से हमारा मज़ाक उड़ाते हैं और हमें नीचा दिखाते हैं. लेकिन हमारे प्रधानमंत्री अपनी वही खोखली हंसी हंसते हैं और गले मिलते रहते हैं. ग़ाज़ा में नरसंहार के चरम पर भारत सरकार ने निष्कासित फिलिस्तीनी कामगारों की जगह लेने के लिए हजारों गरीब भारतीय कामगारों को इजरायल भेजा था. आज, जब इजरायली बंकरों में शरण लिए हुए हैं, तो खबरें आ रही हैं कि उन भारतीय कामगारों को उन आश्रयों में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है. आखिर इन सबका मतलब क्या है? किसने हमें दुनिया के इस बेहद अपमानजनक, बेशर्म और घिनौने स्थान पर पहुंचा दिया है?’
वे आगे कहती हैं, ‘आपमें से कुछ लोगों को याद होगा कि हम उस अतिरंजित, बढ़ा-चढ़ाकर कही गई चीनी कम्युनिस्ट कहावत, ‘साम्राज्यवाद का पिछलग्गू,’ का कैसे मज़ाक उड़ाते थे. लेकिन अभी, मैं कहूंगी, यह शब्द हम पर सटीक बैठता है. सिवाय उन विकृत, विषैली फिल्मों के जिनमें हमारे हीरो एक के बाद एक काल्पनिक युद्ध जीतते हुए, मूर्ख और अत्यधिक ताकतवर बनकर घूमते हैं. अपनी बेवजह की हिंसा और दिमाग की गंदगी से हमारी अतृप्त रक्तपिपासा को और भड़काते हैं.’
‘…क्योंकि मैं अपनी मांं की बेटी हूं…’
उल्लेखनीय है कि लेखिका अरुंधति रॉय ने अपनी बात की शुरुआत ‘…क्योंकि मैं अपनी मांं की बेटी हूं…’ से की थी , यह कोई संयोग नहीं था. यह बात उन्होंने अपनी किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ पर हुई चर्चा के बाद कही, जिसे पिछले साल पेंगुइन रैंडम हाउस ने प्रकाशित किया है.
दिल्ली के कमानी सभागार में अरुंधति लेखिका और स्तंभकार नीलांजना रॉय के साथ बातचीत कर रही थीं. उनकी किताब की तरह ही उस शाम की चर्चा में अरुंधति का अपनी तेजतर्रार, क्रांतिकारी और प्रभावशाली मां मैरी रॉय के साथ उतार-चढ़ाव भरा रिश्ता, अपने अनुपस्थित और शराबी पिता के साथ संक्षिप्त मुलाकातें, स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में बिताया समय और एक लेखिका के रूप में उनका उदय शामिल था.
नीलांजना के सवाल और अरुंधति के जवाब न केवल इस पुस्तक तक सीमित थे – जिसे अरुंधति संस्मरण कहना पसंद नहीं करतीं, जब तक कि आप इसे ‘उपन्यासकार का संस्मरण’ न कहें – बल्कि अरुंधति के व्यापक कार्य और गतिविधियों को भी दर्शा रहे थे. इसलिए ईरान के बारे में उनका अंतिम कथन शाम का एकमात्र राजनीतिक क्षण नहीं था.
उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बारे में बात की, कि कैसे ‘एआई’ धीरे-धीरे ‘वास्तविक मेधा’ को नष्ट कर रही है, क्योंकि पांच गोरे पुरुषों ने हमारी कल्पना से परे संसाधनों – प्राकृतिक संसाधनों और सदियों के मानव संसाधनों – का उपयोग कर लिया है.
भारत के विश्वविद्यालयों के भगवाकरण के बारे में दर्शकों के एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि कैसे न केवल शिक्षा प्रणाली बल्कि वे सभी संस्थान जिन पर भारतीय कभी गर्व कर सकते थे, आज शर्म का कारण बन गए हैं.
भारत में हालात बदले हैं?
उनकी एक विदेशी मित्र, जिनसे उनकी आखिरी मुलाकात 2017-18 में हुई थी, ने हाल ही में उनसे पूछा कि क्या तब से भारत में हालात बदले हैं.
उन्होंने कहा, ‘तब हम एक फासीवादी सरकार से लड़ रहे थे. अब हम एक फासीवादी समाज से लड़ रहे हैं.’ सफलता के बारे में बात करते हुए और यह बताते हुए कि अरुंधति को ‘खोखली सफलता’ के जश्न में खुशी क्यों नहीं मिलती, उन्होंने बताया कि जिन विषयों पर वह लिखती हैं – कॉरपोरेट वैश्वीकरण, युद्ध, बांध, विस्थापन, साम्राज्यवाद- उनके कारण खुद को सही मायने में सफल मानना मुश्किल हो जाता है.
चर्चा का ज्यादातर समय मैरी रॉय और उनके बच्चों, अरुंधति और उनके भाई के साथ उनके रिश्ते पर बातचीत करते हुए बीता. एक मां के रूप में मैरी रॉय अक्सर सख्त थीं, तो वहीं एक शिक्षिका और सीरियाई ईसाई महिलाओं के लिए समान उत्तराधिकार अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली महिला के रूप में दयालु, प्रेरणादायक और क्रांतिकारी.
‘मदर मैरी कम्स टू मी’ उनके हर पहलू को समर्पित एक श्रद्धांजलि है, और एक बेटी का दुनिया के सामने एक जटिल महिला की छवि प्रस्तुत करने का प्रयास है. पुस्तक और अरुंधति के शब्दों से यह स्पष्ट होता है कि इस रिश्ते ने उनके जीवन को कितना प्रभावित किया है, और शायद इसीलिए, जब उनसे पूछा गया कि क्या वे इस रिश्ते को दोहराना चाहेंगी या किसी दूसरी मां को पसंद करेंगी, तो उन्होंने कहा कि वे ‘सौ प्रतिशत’ इसे दोबारा चाहेंगी.
पूरी चर्चा के दौरान यह संकेत मिलते रहे कि आखिर में कुछ ऐसा होगा जिसका इंतज़ार करना सार्थक होगा और ऐसे में जब उन्होंने अपना अंतिम बयान दिया, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ दृढ़ता से खड़े होकर भारतीय सरकार की निंदा की, जो ऐसा करने में असमर्थ है, तो दर्शकों ने खड़े होकर उनके साथ एकजुटता जाहिर की. तालियों की गड़गड़ाहट पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने मुस्कुराते हुए हाथ से विक्ट्री साइन दिखाते हुए कहा, ‘दिल्ली में हम हमेशा पलटकर लड़ते हैं.’
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