‘सतलुज’ विवाद के बीच ओटीटी की फिल्मों के लिए प्रमाणन अनिवार्य करने पर विचार कर रही सरकार

मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्मकार हनी त्रेहन की फिल्म 'सतलुज' को ओटीटी पर रिलीज़ किए जाने के दो दिन के भीतर ही हटा दिया गया था. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अब केंद्र सरकार आईटी एक्ट में संशोधन पर विचार कर रही है, जिसके तहत सीधे ओटीटी पर रिलीज़ होने वाली फिल्मों के लिए भी प्रमाणन अनिवार्य बनाया जा सकता है.

सतलुज फिल्म का एक दृश्य. (फोटो साभार: ज़ी5)

नई दिल्ली: दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ के रिलीज़ के तुरंत बाद विवादों में घिरने के बाद केंद्र सरकार सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) एक्ट में संशोधन पर विचार कर रही है. इसके तहत सभी फिल्मों, यहां तक कि सीधे ओटीटी पर रिलीज़ होने वाली फिल्मों के लिए भी प्रमाणन (सर्टिफिकेशन) अनिवार्य बनाया जा सकता है.

इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि सरकार इस कदम पर कुछ समय पहले से विचार कर रही थी, लेकिन हाल ही में पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की बायोपिक ‘सतलुज’ को पिछले वीकेंड ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी5 से अचानक हटाए जाने पर हुए विवाद के बाद इस मामले ने तेज़ी पकड़ ली है.

उल्लेखनीय है कि यह फिल्म पिछले लगभग तीन वर्षों से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी), यानी सेंसर बोर्ड में अटकी हुई थी. फिल्म को पहले ‘पंजाब 95’ नाम से सेंसर बोर्ड के पास भेजा गया था. सेंसर बोर्ड ने फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज के लिए प्रमाण पत्र देने से पहले 127 कट और बदलाव करने को कहा था, जिसे फिल्म निर्माताओं ने मानने से इनकार कर दिया था और यह फिल्म कभी सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच सकी. अब इस फिल्म को बिना किसी कांट-छांट के 3 जुलाई को ‘सतलुज’ नाम से ज़ी5 पर रिलीज़ किया गया था.

हालांकि, ओटीटी पर रिलीज़ होने के दो दिन बाद ही ज़ी5 ने ‘मौजूदा घटनाक्रम’ का हवाला देते हुए फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटा दिया. लेकिन चुनावी राज्य पंजाब में यह मुद्दा राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है.

सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) और विपक्षी शिरोमणि अकाली दल (शिअद) इस कदम का ज़ोरदार विरोध कर रहे हैं.

एक ओर आप ने जहां ओटीटी प्लेटफॉर्म से फिल्म हटाए जाने का कड़ा विरोध करते हुए इसके लिए भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया है, वहीं अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी पंजाब के गांवों और कस्बों में यह फिल्म दिखाएगी ताकि ‘नई पीढ़ी को कांग्रेस के शासनकाल में सिख समुदाय पर हुए अत्याचारों के बारे में जागरूक किया जा सके.’

मालूम हो कि पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में इस मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है.

बिना कांट-छांट के ओटीटी पर लाई गई ‘सतलुज’

इस संबंध में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों ने अखबार को बताया कि जनता के देखने के लिए उपलब्ध किसी भी फिल्म, जो किसी भी प्लेटफॉर्म पर रिजीज़ हो, के लिए सर्टिफिकेशन अनिवार्य करने के लिए आईटी नियमों में बदलाव की मांग तेज़ हो गई है.

एक अधिकारी ने कहा, ‘चूंकि दर्शक पारंपरिक माध्यमों से हटकर ओटीटी और दूसरे प्लेटफॉर्म्स की ओर चले गए हैं, इसलिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सामने जनता के लिए दिखाए जाने वाले कंटेंट को रेगुलेट करने का प्रस्ताव है.’

सूत्रों के मुताबिक, यह फिल्म 2022 में सीबीएफसी के पास पहुंची थी, जिसके बाद निर्माताओं ने 2023 में बॉम्बे हाईकोर्ट में सीबीएफसी की आपत्तियों को चुनौती दी थी, लेकिन बाद में याचिका वापस ले ली.

इस संबंध में एक अधिकारी ने अखबार से कहा, ‘मई 2023 में सीबीएफसी ने निर्माताओं को एक सूचना भेजी थी, जिसमें कारण बताते हुए फिल्म की रिलीज़ पर रोक लगा दी गई थी. वे शुरू में कोर्ट गए थे, लेकिन बाद में बोर्ड द्वारा बताए गए कारणों को देखने के बाद उन्होंने केस वापस लेने का फ़ैसला किया.’

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 7 जनवरी, 2025 को इस मामले का निपटारा कर दिया था. अधिकारी ने कहा, ‘जनवरी 2025 में कोर्ट से याचिका वापस लेने के बाद से फिल्म निर्माताओं ने सीबीएफसी के साथ इन मामलों को सुलझाने की कोई कोशिश नहीं की.’

मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि ओटीटी पर रिलीज़ की गई फिल्म सतलुज में नाम के अलावा कुछ और नहीं बदला गया है. इस पर जब मंत्रालय की ओर से स्पष्टीकरण मांगा गया तो ज़ी5 ने दावा किया कि उसे इन घटनाक्रमों (2022 और 2023 में हुए) की जानकारी नहीं थी.

‘सरकार के पास रोक लगाने की वजहें’

अधिकारियों का कहना है कि सरकार के पास इस फिल्म पर रोक लगाने के कई कारण हैं. उनके अनुसार, फिल्म की मुख्य कहानी यह है कि बड़े पैमाने पर हत्याओं, लोगों के गायब होने और गैर-कानूनी तरीके से अंतिम संस्कार के लिए राज्य (सरकार/प्रशासन) ज़िम्मेदार था.

अधिकारियों ने कहा कि यह फिल्म कुछ खास ज्यादतियों की आलोचना से आगे बढ़कर, उग्रवाद-विरोधी कार्रवाई को राज्य के दमन की एक कथित मशीनरी के तौर पर पेश करती है.

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, पंजाब में सुरक्षा की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह खतरा अभी भी बना हुआ है, यह कोई पुरानी बात नहीं है; क्योंकि पंजाब एक संवेदनशील सीमावर्ती राज्य है जहां खालिस्तान से जुड़ा प्रोपेगैंडा, विदेशों से अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा और विरोधी सूचना अभियान लगातार चल रहे हैं. उन्होंने तर्क दिया कि उग्रवाद के दौर से जुड़े भावनात्मक कंटेंट का इस्तेमाल युवाओं और विदेशों में रहने वाले लोगों के बीच पुरानी मसलों को फिर से हवा देने के लिए किया जा सकता है.

रिलीज़ के 48 घंटों के अंदर ही हटाई गई

गौरतलब है कि ‘सतलुज’ को तीन जुलाई 2026 को बिना किसी प्रचार या बड़े एलान के सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी5 पर रिलीज़ किया गया था. लेकिन महज दो दिन बाद, 5 जुलाई को इस फिल्म को भारत में ज़ी5 प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया.

हालांकि, ओटीटी प्लेटफॉर्म ने अभी तक फिल्म हटाने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया है. प्लेटफॉर्म की ओर से सिर्फ इतना कहा गया है कि मौजूदा घटनाक्रम के कारण फिल्म को हटाना पड़ा है और वे ‘सतलुज’ को दोबारा दर्शकों के लिए उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहे हैं.

फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहन के मुताबिक, निर्माता सेंसर बोर्ड द्वारा मांगे गए बदलावों के पक्ष में नहीं थे, जिसके कारण फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज़ नहीं हो सकी. इसी विवाद के चलते निर्माताओं ने इसे बिना कट के सीधे ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर ‘सतलुज’ नाम से रिलीज़ किया.

गौरतलब है कि भारत में ‘सिनेमैटोग्राफ एक्ट’ के तहत सीबीएफसी फिल्मों को रिलीज़ करने के लिए प्रमाणपत्र जारी करता है, लेकिन यह कानून मुख्य रूप से सार्वजनिक सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फिल्मों पर लागू होता है.

वहीं, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्म रिलीज़ करने के लिए सेंसर बोर्ड के प्रमाणपत्र की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं होती. ओटीटी आईटी अधिनियम, 2021 के तहत आते हैं, जहां उम्र के आधार पर वर्गीकरण, सेल्फ रेगुलेशन और आचार संहिता (कोड ऑफ एथिक्स) जैसी व्यवस्थाएं लागू होती हैं. ऐसे में इस फिल्म को ओटीटी से हटाए जाने के बाद कई सवाल उठने लगे हैं.