उन आठ लोगों की मौत की खबर सुबह मेरे कलक्टरेट पहुंचने के पूर्व ही मुझे ज़िला मैजिस्ट्रेट ने फ़ोन कर के बताई और मौक़े पर जा कर जांच करने का निर्देश दिया. घटना तालडांगरा ब्लॉक में घटी थी. कल संध्या की ज़बरदस्त काल बैसाखी के बाद रात होते न होते इन आठों लड़कों के शव एक बड़े आम के वृक्ष के नीचे मिले थे. कल शाम को ज़िले में कई जगहों से बाज गिरने का समाचार आया था पर किसी के मारे जाने की सूचना नहीं मिली थी. और अब एक साथ आठ लोग…
1994 के अप्रैल महीने के अंतिम सप्ताह के दिन थे. उस वक्त मैं बांकुड़ा ज़िले में अतिरिक्त ज़िला मैजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत था. पश्चिम बंगाल के पश्चिमी भूभाग में स्थित इस ज़िले का पूर्वी तिहाई हिस्सा गांगीय मैदानी इलाक़े में और बाक़ी छोटा नागपुर पठार में मिलित होता लाल मिट्टी वाले क्षेत्र में आता है. इस वर्ष प्रकृति का अनिश्चित तांडव मार्च माह के अंत से ही शुरु से हो चुका था. सामान्यतः मार्च, अप्रैल तथा मई का पहला पखवाड़ा ‘काल बोइशाखी’ का समय होता है.
इस दौरान पूर्वी भारत में आने वाली बिजली, बारिश और ओलों से लैस विनाशकारी आंधी को, जिसे अंग्रेज़ी में नॉर्वेस्टर कहते हैं, बंगाल में काल बैसाखी के नाम से जाना जाता है. ‘काल’ का तात्पर्य यहां मृत्यु से है और ‘बैसाखी’ क्योंकि बैसाख में इनकी व्यापकता रहती है. काल बैसाखी अक्सर ही तबाही का संदेश ले कर आती है.
काल बैसाखी का तांडव
आंधी के संग ज़ोरदार वृष्टि या कठोर ओलों की मार आऊस धान को तहस-नहस कर देती है या बिजली गिरने से लोगों की जानें जाती है. बांकुड़ा आने पर मुझे बताया गया था कि यहां कुछ क्षेत्रों में काल बैसाखी के समय दिल दहलाने वाले शब्द के साथ भीषण बिजली गिरती है और हर साल कई लोगों की जान ले लेती है. तालडांगरा ब्लॉक का यह हादसा इस बात का ही भयंकर प्रमाण था.
वह आम का पेड़ सड़क से थोड़ा पीछे खड़ा था. मैं जब वहां पहुंचा तो तालडांगरा के बीडीओ वहां दो तीन स्थानीय बाशिंदों के साथ मेरा इंतज़ार कर रहे थे. उनसे पता चला कि आठ में से पांच लड़के पास के गांव से फ़ुट्बॉल खेल कर लौट रहे थे और तीन युवक खेतों में काम कर के. उसी समय आंधी के साथ बारिश होने लगी थी और बहुत ज़ोरों से बिजली चमक रही थी.
संभवत: इसीलिए उन आठों ने आम के वृक्ष के नीचे शरण ली थी. काल बैसाखी के थमने के काफ़ी देर बाद एक वैन रिक्शा वाले ने उन आठों को एक दूसरे से बिलकुल सट कर बैठा पाया. उनमें से तीन या चार लड़के तो तब भी गलबहियाँ बाँधे बैठे थे मानो कोई रोमांचक कहानी साझा कर रहे हों—केवल उनके प्राणहीन शरीर सामने की ओर झुक गए थे.
घटना स्थल को देखने और गांव के लोगों से बात करने के पश्चात ब्लॉक स्वास्थ्य केंद्र में पहुंच कर मैने स्वास्थ्य अधिकारी से बात की. उन्होंने बताया कि मृतकों के शरीर पर किसी तरह का स्पष्ट निशान नहीं था. उनके बिजली गिरने से मृत्यु होने की पुष्टि करते हुए डॉक्टर ने एक शव के पैर के अंगूठे पर हलका नीला बिंदु दिखाया. बाज गिर जाने से मृत्यु होने का बस यही एक निशान था. आठों एक ही गांव के थे.
यह थी बांकुड़ा में 1994 में भीषण गर्मी की शुरुआत.
मुझे ज्ञात था कि बांकुड़ा ज़िले में अच्छी खासी गर्मी पड़ती है और वहां का तापमान अक्सर 45 डिग्री तक पहुंच जाता है. लेकिन 1994 में मई के अंत तक ज़िले में कई जगहों पर पारा 48 डिग्री पार कर चुका था और झुलसाने वाली लू चल रही थी. ग्रीष्म काल में गर्मी तो अपेक्षित होती है लेकिन इस बार लोग सूखे की बात करने लगे थे. कुछ ब्लॉकों से जलस्रोतों के सूख जाने की जानकारी आ रही थी.
बांकुड़ा शहर के कुछ वार्डों से भी पानी की कमी की शिकायतें आने लगीं. ज़िला मैजिस्ट्रेट ने हर बीडीओ और एसडीओ से त्वरित ज़मीनी रिपोर्ट मांगी और मुझे इस कार्य के समन्वय का भार दिया. चूंकि दफ़्तर में बैठ कर पर्यवेक्षण करने में मेरा विश्वास कभी नहीं रहा, मैं खुद लोगों की स्थिति जानने के उद्देश्य से गर्मी से सबसे बुरी तरह प्रभावित इलाक़ों का दौरा करने लगा.
सफल हैंड पंप मॉडल
प्रथम दिन मैंने छातना ब्लॉक में देखा कि गांवों के रास्तों के किनारे मार्क दो हैंड पंप, जिन्हें मैं चांपा कल के नाम से जानता था, लगे हुए हैं. नब्बे के दशक में मार्क दो सबसे उन्नत तथा सफल हैंड पंप मॉडल था जिसका व्यवहार पूरे देश में किया जा रहा था. यह 150-200 फुट की गहराई से भी पानी निकालने में समर्थ था. फिर भी यहां लोगों को जल नहीं मिल रहा था. मेरे ध्यान में यह भी आया कि अधिकतर हैंड पंपों से मैंने किसी को पानी लेते नहीं देखा था.
एक गांव में रास्ते के किनारे गुमसुम परंतु नयेपन की चमक लिए खड़े हैंड पंप को देख कर मैं रुक गया. हैंड पंप चलाया तो पाया कि न तो वह ठीक से चल रहा था और न ही उससे पानी निकल रहा था. मेरी गाड़ी के रुकने पर दो-तीन व्यक्ति प्रकट हुए थे. उनमें से एक अधेड़ व्यक्ति ने स्वतः ही मुझसे कहा, ‘खाराप होय गिएचे (खराब हो गया है).’ मैंने पूछा, ‘नोतुन मोन होच्चे. खाराप होलो की कोरे (नया लग रहा है. खराब हुआ कैसे)?’ ‘आशे-पाशेर पाड़ार लोकेरा भेंगे दीएचे (अग़ल-बग़ल के मोहल्ले के लोगों ने तोड़ दिया है),’ पान चबाते हुए उन्होंने स्पष्टीकरण किया. क्षण भर के लिए भौंचक्का मैं उन्हें देखता रह गया. फिर मैंने पूछा, ‘केनो? केनो भेंगे दिएचे (क्यों? क्यों तोड़ डाला?).
सरकारी गाड़ी के पास खड़े सुरक्षा गार्ड की ओर देख कर उन्होंने मेरी ओर देखा फिर मोरम रास्ते के किनारे बने पक्के मकान की ओर इशारा करते हुआ बताया कि वह घर पंचायत के उप-प्रधान का था और यह मार्क दो चांपा कल उनकी सहूलियत के लिए यहां बिठाया गया था. इसकी यहां ज़रूरत नहीं थी क्योंकि मुश्किल से पचास फुट आगे एक मार्क दो हैंड पंप पहले से ही मौजूद था. गांव में तीन ऐसे पाड़ा थे जहां से महिलायें उस पुराने हैंड पंप से जल लेने आती थीं. इस नए हैंड पंप की आवश्यकता उन मोहल्लों में कहीं अधिक थी.
मेरे अगले प्रश्न ने एक बुनियादी समस्या से मेरा परिचय करवाया. मेरा प्रश्न था कि टूटे हुए हैंड पंप की मरम्मत क्यों नहीं हुई है? उत्तर सहज था, क्योंकि हैंड पंप बनाने का जानकार मकैनिक दूर-दूर तक कहीं मौजूद न था. यह समस्या मुझे बहुत सारे गांवों में देखने को मिली. हैंड पंप में बहुत छोटी सी गड़बड़ी भी हो तो भी वह तब तक यूँ ही नाकाम पड़ा रहता था जब तक ब्लॉक या ग्राम पंचायत से विशेष मरम्मत करने का प्रबंध नहीं किया जाता था. लेकिन इन हैंड पंपों के साथ सारी समस्यायें तकनीकी नहीं थीं.
सालतोड़ा ब्लॉक के बीडीओ ने मुझे बताया था कि एक गांव से सभी जल स्रोतों के सूख जाने की खबर मिली है. अगले दिन मैं वहां पहुंचा तो पाया कि गांव के सबसे बड़े कुएँ के उल्टी तरफ़ मोरम रास्ते के पार एक हैंड पंप है.
कुएं के समीप इकट्ठे लोगों ने, जिनमें महिलाएं भी थीं, बताया कि पानी की विकट समस्या है और उनके ऊपर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. गांव के बाक़ी सारे निजी कुंए लगभग पूरी तरह सूख चुके हैं, बस इसी सार्वजनिक और सबसे पुराने कुएँ में फुट-दो फुट पानी बचा हुआ है. इस तपते मौसम में वह भी किसी दिन भाप बन कर उड़ जाएगा.
कुएं में झांक कर देखा तो सचमुच उसकी छिछली तली दिख रही थी. मैंने पूछा कि यहां तो मार्क दो हैंड पंप भी है. आप उसका व्यवहार क्यों नहीं करते? क्या वह खराब हो गया है? यह पूछते-पूछते मैंने सड़क पार कर के हैंड पंप का हत्था ऊपर नीचे किया तो टोंटी से पानी गिरने लगा. हमारी बातचीत में कुछ क्षणों के लिए चुप्पी का विराम लग गया. फिर एक महिला ने कहा, ‘रान्ना ते तो हैंड पंपेर जोल व्यवहार करा जाय ना. दाले शाद आशे ना (खाना पकाने में तो हैंड पंप का पानी व्यवहार नहीं किया जा सकता. दाल में स्वाद नहीं आता है).’
ऐसी होती हैं आदतों कि बेड़ियां जो यदा-कदा विकास के पथ पर बढ़ते समाज के पांव भी बांध देती हैं…
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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