नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (12 मार्च) को पश्चिम एशिया में शुरू हुए संघर्ष के 12 दिन बाद पहली बार ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से फोन पर बात की. इस बातचीत में उन्होंने क्षेत्र में मौजूद भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और वस्तुओं तथा ऊर्जा आपूर्ति के निर्बाध प्रवाह को लेकर चिंता जताई.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए मोदी ने कहा कि दोनों नेताओं ने क्षेत्र की ‘गंभीर स्थिति’ पर चर्चा की, क्योंकि ईरान और अमेरिका-इज़रायल गठबंधन के बीच संघर्ष लगातार फैलता जा रहा है.
उन्होंने कहा कि उन्होंने तनाव बढ़ने, नागरिकों की मौत और नागरिक बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान पर गहरी चिंता व्यक्त की.
मोदी ने यह भी कहा कि ‘भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और वस्तुओं तथा ऊर्जा की निर्बाध आवाजाही भारत की सर्वोच्च प्राथमिकताएं हैं.’ उन्होंने शांति और स्थिरता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराते हुए संवाद और कूटनीति के माध्यम से समाधान का आग्रह किया.
यह बातचीत 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद भारत और ईरान के शीर्ष नेतृत्व के बीच पहली सीधी बातचीत है. इससे कुछ दिन पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 9 मार्च को संसद में कहा था कि संकट के दौरान ईरानी नेतृत्व से संपर्क करना मुश्किल हो रहा है.
उन्होंने कहा था, ‘कोशिशें की गई हैं, लेकिन इस समय ईरान के शीर्ष नेतृत्व से संपर्क करना स्पष्ट रूप से कठिन है.’
ईरान के राष्ट्रपति ने बुधवार (11 मार्च) को कई क्षेत्रीय नेताओं से बात की, जिनमें ओमान के सुल्तान, रूस के राष्ट्रपति और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शामिल हैं.
पिछले डेढ़ हफ़्ते में मोदी ने खाड़ी क्षेत्र के कई नेताओं से भी बातचीत की है, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति, कतर के अमीर और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस, साथ ही कुवैत, बहरीन, ओमान और जॉर्डन के शासक शामिल हैं.
आधिकारिक विवरणों के अनुसार, इन बातचीतों में मोदी ने खाड़ी देशों पर हुए हमलों की निंदा की थी, जिन्हें तेहरान ने क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया बताया था, हालांकि भारत ने सीधे तौर पर ईरान का नाम नहीं लिया.
बुधवार को भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के उस प्रस्ताव का सह-प्रायोजन (co-sponsored) किया, जिसमें खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसीस) के देशों और जॉर्डन पर ईरान के हमलों की निंदा की गई थी.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने युद्ध शुरू होने के बाद से तीन बार बातचीत की है. 9 मार्च को हुई ताज़ा बातचीत में शिपिंग सुरक्षा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर खास तौर पर चर्चा हुई.
गुरुवार को साप्ताहिक ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने इस महत्वपूर्ण आपूर्ति मार्ग को लेकर पैदा हुए तनाव पर चर्चा की है, जिसने ऊर्जा व्यापार को प्रभावित कर दिया है.
जायसवाल ने कहा, ‘पिछले कुछ दिनों में विदेश मंत्री और ईरान के विदेश मंत्री के बीच तीन बार बातचीत हुई है. आखिरी बातचीत में जहाजों की सुरक्षा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई. इससे आगे अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी.’
ये चर्चाएं ऐसे समय में हो रही हैं जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ (समुद्री मार्ग) को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है. फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है. इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों से भारत जो तेल आयात करता है, उसका बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता है.
खबर है कि भारत ने यह आश्वासन मांगा है कि भारत के लिए आने वाले तेल टैंकर बढ़ते संघर्ष के बावजूद इस मार्ग से सुरक्षित गुजर सकेंगे. हालांकि अभी तक तेहरान की ओर से ऐसी किसी व्यवस्था पर सहमति का संकेत नहीं मिला है.
तनाव तब और बढ़ गया जब ईरान के नए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई ने संकेत दिया कि अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दबाव बनाने के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को बंद रखा जा सकता है. ईरानी सरकारी टीवी पर प्रसारित बयान में उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना जारी रखेगा और यदि युद्ध जारी रहा तो संघर्ष का दायरा और बढ़ सकता है.
इस स्थिति का असर खाड़ी क्षेत्र में काम कर रहे जहाजों और चालक दल पर भी पड़ा है. भारतीय अधिकारियों के अनुसार क्षेत्र में जहाजों से जुड़े कई घटनाक्रमों में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो चुकी है और एक अब भी लापता है, जबकि कुछ अन्य घायल हुए हैं लेकिन उनकी स्थिति स्थिर बताई गई है.
गुरुवार को एक ब्रीफिंग में बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने कहा कि फारस की खाड़ी में जहाजों से जुड़े कई समुद्री हादसों में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई है और एक अब भी लापता है.
प्रभावित विदेशी ध्वज वाले जहाजों पर मौजूद 78 भारतीय नाविकों में से 70 सुरक्षित बच निकले, जबकि चार घायल हुए हैं लेकिन उनकी स्थिति स्थिर है.
सिन्हा ने बताया कि इस समय फारस की खाड़ी क्षेत्र में भारत के 28 भारतीय ध्वज वाले जहाज काम कर रहे हैं. इनमें से 24 जहाज, जिन पर 677 भारतीय नाविक हैं, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के पश्चिम में हैं, जबकि चार जहाज 101 भारतीय चालक दल के साथ इसके पूर्व में हैं.
उन्होंने कहा, ‘वहां मौजूद सभी भारतीय जहाजों और उनके चालक दल की सुरक्षा की सक्रिय निगरानी की जा रही है.’
तीसरे भारतीय नाविक की मौत की पुष्टि इराक स्थित भारतीय दूतावास ने की. दूतावास के अनुसार अमेरिका के स्वामित्व वाला कच्चे तेल का टैंकर सेफसी विष्णु इराक के बसरा के पास समुद्री क्षेत्र में हमले का शिकार हुआ. जहाज पर मौजूद बाकी 15 भारतीय नाविकों को सुरक्षित निकाल लिया गया है.
भारत के लिए होर्मुज़ से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा का सीधा असर उसकी ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ता है. इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से आयात किया जाने वाला अधिकांश कच्चा तेल इसी संकरे जलमार्ग से गुजरकर अरब सागर तक पहुंचता है. भारत की लगभग 90% गैस आपूर्ति भी इसी मार्ग से आती है, जिसके कारण सरकार ने व्यावसायिक गैस सिलेंडरों पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं.
भारत ने अब तक ईरान पर अमेरिका या इज़राइल के हमलों की सीधे आलोचना नहीं की है, लेकिन जहाजों और अपने प्रवासी नागरिकों की सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय सरकारों के साथ कूटनीतिक संपर्क बढ़ा दिया है.
इस बीच विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव ने भारत से ईंधन आपूर्ति का अनुरोध किया है.
उन्होंने कहा, ‘यह उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश को डीज़ल निर्यात 2017 से बड़े पैमाने पर जारी है. हालांकि भारत की रिफाइनिंग क्षमता, हमारी अपनी ज़रूरतें और डीज़ल की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए ही फैसले लिए जाएंगे. इसके अलावा हमें श्रीलंका और मालदीव सहित कई अन्य देशों से भी ऐसे अनुरोध मिले हैं.’
बता दें कि नई दिल्ली ने हाल ही में मालवाहक जहाज ‘मयूरी नारी’ पर हुए हमले की भी निंदा की. यह जहाज़ गुजरात के कांडला बंदरगाह की ओर जा रहा था. भारत ने कहा कि इस संघर्ष के बीच आम नागरिकों के जहाज़ों को निशाना बनाना बिल्कुल भी मंज़ूर नहीं है.
भारत ने ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के शुरुआती हमलों की औपचारिक तौर पर निंदा करने से भी परहेज़ किया है. यह भारत के पहले के रुख से बिल्कुल अलग है. पिछले साल जब इज़रायल और ईरान के बीच छोटा-मोटा टकराव हुआ था, तब ब्राज़ील की अध्यक्षता में ब्रिक्स (बीआरआईसी) के तहत भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन की बात उठाई थी. भारत की मौजूदा ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत इस गुट ने इस संघर्ष पर कोई भी साझा बयान जारी नहीं किया है.
इस बीच, सरकार को विपक्षी पार्टियों की आलोचना का सामना करना पड़ा है. विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि इस संघर्ष के दौरान नई दिल्ली अमेरिका और इज़रायल के बहुत ज़्यादा करीब हो गई है. आलोचकों का कहना है कि भारत ने खाड़ी देशों पर हुए उन हमलों की तो निंदा की, जिनका आरोप ईरान पर लगा था, लेकिन ईरान के ठिकानों पर अमेरिका या इज़रायल की सैन्य कार्रवाई की सीधे तौर पर आलोचना करने से परहेज़ किया.
कांग्रेस ने मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने 25 और 26 फ़रवरी को इज़रायल का दौरा करके अमेरिका और इज़रायल के हमलों को ‘एकतरफ़ा समर्थन और मौन स्वीकृति’ दी. यह दौरा ईरान पर हमला शुरू होने से 48 घंटे से भी कम समय पहले हुआ था.
नई दिल्ली ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर औपचारिक तौर पर तब संज्ञान लिया, जब अमेरिका और इज़रायल के हमलों में उनकी मौत को पांच दिन बीत चुके थे. भारत सरकार की ओर से विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने तेहरान में शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए. भारत ने ईरान के नए सर्वोच्च नेता के तौर पर मोजतबा खामेनेई के चुनाव का स्वागत करते हुए भी कोई बयान जारी नहीं किया है. अब तक भारत ने ईरान के मिनाब शहर में 160 से ज़्यादा स्कूली छात्राओं की हत्या की निंदा नहीं की थी. इस घटना को व्यापक रूप से संघर्ष के पहले दिन हुए अमेरिकी हमलों से जोड़ा गया है.
भारत की चुप्पी के बारे में पूछे जाने पर प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘जहां तक उन स्कूली बच्चों के सवाल का सवाल है जिनके बारे में आपने बात की है… जैसा कि मैंने कहा है, हमने चल रहे संघर्ष पर कई बयान जारी किए हैं. हमने सभी नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है. हमें खोई हुई कीमती जानों का अफ़सोस है और हम इस संबंध में अपना दुख व्यक्त करते हैं.’
