नई दिल्ली: अब्दुल रशीद लोन को सितंबर 2018 के उस शुक्रवार की सुबह आज भी याद है, जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के एक अधिकारी ने उन्हें फोन पर बताया था कि उनके बेटे परवेज़ रशीद, जो इंजीनियरिंग में पोस्टग्रेजुएशन कर रहा था, को आतंकी संगठन आईएसआईएस से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है.
परवेज़ के अंतिम सेमेस्टर के इम्तिहान बस कुछ ही दिन दूर थे, जब सब कुछ अचानक बदल गया. आठ साल बाद शोपियां के गनोपोरा गांव में अपने घर पर बैठे लोन अपनी भावनाओं को संभालने की कोशिश करते नजर आते हैं. लोन एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी हैं.
लोन ने कहा, ‘इस कानूनी लड़ाई ने हमारी जमापूंजी, हमारी शांति और इसके साथ उसकी पढ़ाई के पांच साल भी छीन लिए. इस लड़ाई ने हमें हर तरह से तोड़ दिया, आर्थिक रूप से, मानसिक रूप से, हर तरह से.’ लोन गनोपोरा में अपनी पत्नी के साथ रहते हैं.
24 साल के परवेज़ उस समय उत्तर प्रदेश के गजरौला स्थित श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय से एमटेक कर रहे थे. 7 सितंबर 2018 को दिल्ली में लाल किले के पास स्पेशल सेल की टीम ने उन्हें शोपियां के ही बलपोरा गांव के रहने वाले जमशेद ज़हूर पॉल के साथ गिरफ्तार किया था.
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के तत्कालीन डीसीपी प्रमोद सिंह कुशवाहा ने उस समय मीडिया को बताया था कि इन दोनों ‘अत्यधिक कट्टरपंथी’ युवकों से चार मोबाइल फोन बरामद किए गए, जिनमें ‘आतंकियों से जुड़े वीडियो’ थे.
कुशवाहा ने दावा किया था कि परवेज़ पर अपने भाई फिरदौस लोन की मौत का ‘गहरा प्रभाव’ था, जिसे जनवरी 2018 में एक मुठभेड़ में मार गिराया गया था. इसके बाद परवेज़ आईएसआईएस के जम्मू-कश्मीर मॉड्यूल से जुड़ गया.
पुलिस ने यह भी दावा किया था कि उस समय 19 वर्षीय पॉल, जो इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर रहे थे, आईएसआईएस-जेके के तत्कालीन प्रमुख उमर इब्न नज़ीर और उसके सहयोगी आदिल ठोकर से ‘एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स’ के जरिए ‘सीधे संपर्क’ में थे.
चार्जशीट में पुलिस ने कहा कि दोनों आरोपी उत्तर प्रदेश से जम्मू-कश्मीर हथियार ले जा रहे थे, जब उन्हें गिरफ्तार किया गया. उनके पास से दो पिस्तौल, 10 कारतूस, मोबाइल फोन और कुछ नोटबुक बरामद होने का दावा किया गया.
पुलिस के अनुसार, ‘रशीद ने अप्रैल 2018 में उत्तर प्रदेश के डिडौली से हासिल 9 मिमी पिस्तौल एक आईएसजेके संपर्क को दी थी.’
दिल्ली पुलिस ने दोनों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 18 (साजिश की सजा) और 20 (आतंकी संगठन का सदस्य होने की सजा) के साथ-साथ आर्म्स एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था.
‘कोई ठोस या संतोषजनक वजह नहीं’
हालांकि, करीब आठ साल जेल में बिताने के बाद दिल्ली की एक अदालत ने गुरुवार (19 मार्च) को दोनों को सभी आरोपों से बरी कर दिया और जांच में खामियों को लेकर दिल्ली पुलिस को कड़ी फटकार लगाई. 79 पन्नों के आदेश में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमित बंसल ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा.
अदालत ने पाया कि जब्त किए गए मोबाइल फोन करीब दो महीने तक जांच अधिकारी की कस्टडी में बिना सील के पड़े रहे, जिसके बाद उन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया. इससे साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका पैदा होती है.
अदालत ने कहा, ‘यह एक मजबूत संदेह पैदा करता है कि मोबाइल फोन से छेड़छाड़ हुई हो सकती है, क्योंकि बिना किसी ठोस या संतोषजनक वजह के ये उपकरण लंबे समय तक जांच अधिकारियों के पास बिना सील के रहे.’
अदालत ने उन स्क्रीनशॉट्स को भी खारिज कर दिया, जिन्हें कथित तौर पर दोनों आरोपियों और उनके तथाकथित आतंकी हैंडलर्स के बीच बातचीत बताया गया था. अभियोजन ने दावा किया था कि दोनों ब्लैकबेरी मैसेंजर ऐप (बीबीएम ऐप) के जरिए आईएसआईएस-जेके के कमांडरों के संपर्क में थे, लेकिन अदालत को इसका कोई प्रमाण नहीं मिला.
अदालत ने कहा, ‘अभियोजन यह साबित करने में भी विफल रहा कि आरोपी उमर बिन नज़ीर और आदिल ठोकर के साथ बीबीएम ऐप पर संपर्क में थे.’
’20–25 लाख की कानूनी लड़ाई’
अपनी आपबीती सुनाते हुए लोन ने बताया कि उनका बेटा 2013 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उत्तर प्रदेश गया था, जो उसके भाई फिरदौस के उग्रवाद से जुड़ने से तीन साल पहले की बात है.
उन्होंने कहा, ‘परवेज़ ने 2016 में अमरोहा के एक कॉलेज से बीटेक किया और फिर आगे पढ़ाई शुरू की. उसके फोन में अपने भाई की तस्वीरें थीं, जिससे शायद शक पैदा हुआ, वरना वह कभी ऐसे रास्ते पर नहीं था.’
लोन ने कहा, ‘उसका भविष्य उज्ज्वल था, लेकिन हमें अंदाजा नहीं था कि अचानक हमारे साथ ऐसा हो जाएगा.’
लोन की दो बेटियां और एक अन्य बेटा शादीशुदा हैं और उनसे अलग रहते हैं. लोन कश्मीर की ‘अनिश्चित स्थिति’ का हवाला देते हुए बेटे की गिरफ्तारी पर बहुत सावधानी से बोलते हैं. इस कानूनी लड़ाई में उनका 20-25 लाख रुपये खर्च हो चुका है, जिसमें से अधिकांश क़र्ज़ लिया गया था.
उन्होंने कहा, ‘मैं अब और परेशानी नहीं चाहता.’
हालांकि अदालत ने परवेज़ को निर्दोष करार दे दिया है, लेकिन लोन भविष्य को लेकर निराश दिखते हैं. उन्होंने पांच साल बेटे की पढ़ाई में लगाए और फिर लगभग आठ साल उसके खिलाफ लगे आरोपों को झूठा साबित करने में गुजर गए. अब जब बेटे की बेगुनाही साबित हो चुकी है, तब इन वर्षों का बोझ उनके चेहरे पर साफ दिखता है. उनकी आंखें बार-बार नम हो जाती हैं. उन्होंने दुखी स्वर में कहा, ‘इन 13 सालों के नुकसान का जवाब कौन देगा?’
गुरुवार को बरी होने की खबर आने के बाद से उनके घर पर फल और मिठाई के साथ रिश्तेदारों और पड़ोसियों का आना-जाना लगा हुआ है.
उनका बेटा और दोनों बेटियां भी घर लौट आए हैं, ताकि परवेज़ का स्वागत कर सकें, जो इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक दिल्ली से शोपियां लौट रहे थे. परिवार के अनुसार, उन्हें गुरुवार शाम तिहाड़ जेल से रिहा किया गया.
‘सबसे जरूरी है कि मेरा बेटा घर लौट रहा है’
परवेज़ के घर से करीब 500 मीटर दूर, शोपियां के बलपोरा गांव के एक दो-मंजिला घर में जश्न का माहौल है. घर के मालिक ज़हूर अहमद पॉल, जिन्होंने कुछ साल पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस की नौकरी छोड़ दी थी, अपने बेटे के साथ जम्मू से लौट रहे थे, जिन्हें 2018 में परवेज़ के साथ गिरफ्तार किया गया था और उन्होंने भी तिहाड़ जेल में लंबा समय बिताया.
पॉल की पत्नी शाहज़ादा ने कहा, ‘मेरे पति ने बेटे की गिरफ्तारी के बाद आध्यात्मिक रास्ता अपनाया और अक्सर सूफी दरगाहों पर जाते रहे. उनकी यह लड़ाई आखिरकार सफल हुई.’
वह आंगन में नल के पास बर्तन धो रही थीं, जबकि परिवार ईद-उल-फितर की तैयारी में जुटा था, जो लगभग आठ साल बाद पहली बार पॉल के साथ मनाई जाएगी. अपने बेटे के बारे में मीडिया से बात करने से इनकार करते हुए शाहज़ादा ने कहा, ‘यहां हालात ठीक नहीं हैं, जैसा कि आप जानते हैं.’
उन्होंने कहा, ‘इन सालों में हमने कैसे वक्त बिताया, इससे क्या फर्क पड़ता है? सबसे जरूरी बात यह है कि मेरा बेटा घर लौट रहा है. मुझे बस उसी की परवाह है.’
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
