धर्म परिवर्तन से अपने आप अनुसूचित जनजाति का दर्जा समाप्त नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धर्म परिवर्तन से अपने आप अनुसूचित जनजाति का दर्जा समाप्त नहीं हो जाता; इसके लिए यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति जनजातीय परंपराओं और रीति-रिवाजों का परित्याग करे.

(इलस्ट्रेशन: द वायर)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धर्म परिवर्तन यह तय करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता कि किसी अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति ने अपनी जनजाति की सदस्यता खो दी है.

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने मंगलवार को यह साफ किया कि जहां एक हिंदू दलित का ईसाई या इस्लाम धर्म में परिवर्तन तत्काल और अपने आप अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए निर्धारित सभी वैधानिक लाभ, संरक्षण, आरक्षण, प्राथमिकताएं और अधिकार समाप्त कर देता है, वहीं अनुसूचित जनजातियों के मामले में स्थिति अलग है.

पीठ ने कहा कि धर्म परिवर्तन से अपने आप अनुसूचित जनजाति का दर्जा समाप्त नहीं हो जाता; इसके लिए यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति जनजातीय परंपराओं और रीति-रिवाजों का परित्याग करे.

अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्तियों के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता. संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत धर्म-आधारित बहिष्करण का प्रावधान है, जबकि संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में ऐसा कोई मानदंड नहीं है.

केरल सरकार बनाम चंद्रमोहन (2004) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि ‘जनजाति’ को एक ऐसे सामाजिक समूह के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसके सदस्य एक समान बोली बोलते हैं, एक ही शासन व्यवस्था होता है और किसी साझा उद्देश्य के लिए साथ मिलकर कार्य करते हैं.

अदालत ने कहा, ‘इसलिए अनुसूचित जनजाति का दर्जा केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर तय नहीं किया जा सकता, बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि दावा करने वाला व्यक्ति अब भी जनजातीय पहचान के मूल तत्वों – जैसे पारंपरिक प्रथाएं, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित जनजातीय समुदाय द्वारा स्वीकृति – को बनाए रखता है या नहीं. यदि धर्म परिवर्तन या उसके बाद के आचरण के कारण व्यक्ति का जनजातीय जीवन से पूर्णतः विच्छेद हो जाता है और उसे समुदाय की मान्यता नहीं मिलती, तो अनुसूचित जनजाति के दर्जे का आधार समाप्त हो जाएगा.’

अदालत ने आगे कहा, ‘इसके विपरीत, यदि ये विशेषताएं स्पष्ट रूप से बनी रहती हैं या वास्तव में पुनः स्थापित हो जाती हैं और जनजातीय समुदाय द्वारा स्वीकार कर ली जाती हैं, तो ऐसे दावे को यांत्रिक रूप से खारिज नहीं किया जा सकता. ऐसे मामलों में मूल्यांकन तथ्यों पर आधारित होगा और सक्षम प्राधिकारी द्वारा संवैधानिक सिद्धांतों के अनुसार किया जाएगा.’

उल्लेखनीय है कि बीते 24 मार्च को दिए एक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट  ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के 30 अप्रैल, 2025 के फैसले को बरकरार रखा. इस फैसले में कहा गया था कि जाति व्यवस्था ईसाई धर्म से असंगत है और इसी आधार पर मदिगा समुदाय से संबंधित दलित ईसाई पादरी चिंथड़ा आनंद को अपने गांव के गैर-अनुसूचित जाति हिंदुओं के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रावधानों का उपयोग करने से रोका गया था.