‘बीकना थेके एक जोन लोक एश्चे. आपनार शोंगे देखा कोरते चाय (बीकना से एक व्यक्ति आया है. आपसे मिलना चाहता है)’ चौकीदार ने आकर बताया. रविवार का दिन था और मैं अपने ढाई साल के बेटे के साथ खेल रहा था. आज कौन आया है, वह भी आवास पर? पर बीकना से अगर है तो कोई परिचित ही होगा सोचता हुआ मैं बाहर बरामदे पर निकला. आकर देखा तो वहां रामेश्वर खड़ा था. अस्त-व्यस्त बाल, गिरेबान से फटी हुई शर्ट और चेहरे से पस्त दिखता इस ढोकरा के कौशलवान शिल्पकार ने अपनी यह कैसी दुर्गति कर ली थी?
बातचीत से जो कुछ पता चला उसका सार यह था कि पिछली रात शराब पीकर उसके भाई ने (और शायद रामेश्वर ने भी) कुछ लोगों के साथ पहले तो हुड़दंग मचाया और फिर मारपीट की. किसी ने थाने में ख़बर कर दी और पुलिस ने आकर तीन-चार लोगों को गिरफ़्तार कर लिया, जिनमें रामेश्वर का भाई भी शामिल था. अब रामेश्वर मेरे पास अपने भाई की रिहाई के लिए पैरवी करने आया था.
बांकुड़ा ज़िले में अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट के पद पर काम करते हुए मुझे करीब साल भर हो चुका था. 1994 के अक्तूबर के दिन थे और पिछले एक वर्ष में मैं बीकना गांव कई बार जा चुका था.
बांकुड़ा शहर के उत्तर में द्वारकेश्वर नदी पार करने के चंद किलोमीटर बाद सड़क के किनारे फैले बीकना गांव के एक छोर पर बसी थी आदिवासियों की यह छोटी सी बस्ती जहां पर निर्मित ढोकरा, या डोकरा, हस्तशिल्प की कृतियां उस वक्त भी नाम कमा चुकी थीं.
कुछ तो लोक संस्कृति में निजी रुचि की वजह से, और कुछ ज़िले में कुटीर उद्योग के विकास के अभिप्राय से मैं कई बार बीकना जा चुका था क्योंकि ज़िले में यह इकलौता गांव था जहां ढोकरा की वस्तुओं का निर्माण होता था और जहां इसे बनाने वाले लोग बसे हुए थे. इसके अलावा पश्चिम बंगाल में एक ही और ऐसा गांव था- बर्दवान ज़िले में स्थित, दरियापुर.
झारखंड में बीते मेरे बचपन की गूंजती यादों में एक है, शीतकाल की धूप भरी दोपहरी में खिड़की की ग्रिल से छनकर आती हुई तेज पुकार ‘मूढ़ीऽऽऽ, मूढ़ीऽऽऽ…’ (बंगनामा 6) और फिर सड़क पर सामने से आता हुआ दिखाई देता मूढ़ी वाला. सिर पर एक विशालकाय मूढ़ी के बोरे को संतुलित किए, आवाज़ लगाता, वह दुबला पतला व्यक्ति दिन भर चलता रहता था.
बर्दवान या बांकुड़ा ज़िले से आकर मूढ़ी के ऐसे विक्रेता छोटा नागपुर के क़स्बों और शहरों में इसी तरह पैदल घूम-घूमकर मूढ़ी बेचते थे. इनके मूढ़ी तौलने का एक माप हुआ करता था- पाव भर मूढ़ी नापने के लिए पीतल का एक सुंदर फूलदार कटोरा- जिसे पयला कहते थे. कनस्तर से चावल निकालने के लिए मेरी मां ने हमारे मोहल्ले में नियमित रूप से आने वाले एक मूढ़ी वाले से ऐसा ही एक पयला खरीदा था.
यह बात मुझे बहुत बाद में मालूम हुई कि यह कटोरा डोकरा शिल्प का ही एक शानदार नमूना है. मुझे संदेह नहीं कि इन मूढ़ी वालों के पयले दरियापुर या बीकना में बनाए गए थे.
ढोकरा की वस्तुएं का उपयोग गृहस्थी तक ही सीमित नहीं
सच तो यही है कि ढोकरा के शिल्पकार मूलतः ग्रामीण जनजीवन के रोज़मर्रे में काम आने वाली चीज़ों को बनाते थे जैसे पयला, करछी, पलटा, कटोरी, नाना तरह के दीपक – कुछ सीधे-सादे ढिबरीनुमा तो कुछ इतराते मोर के आकार में, तो कुछ अन्य लंबे पतले संतुलित मीनार पर बैठे सजीले दीप- सिंदूरदान, आभूषणों में हार तथा पायजेब, शिशुओं के खिलौने, इत्यादि. ढोकरा की वस्तुएं का उपयोग गृहस्थी की लौकिक क्रियाओं तक ही सीमित हो ऐसी बात नहीं.
धार्मिक संस्कारों के लिए भी मनोहर मूर्तियां, दीपक, पंचदीप, अंबियां, एवं कई अन्य वस्तुएं भी यही वनवासी आश्चर्यजनक दक्षता के साथ बनाते हैं. घर में उपयोगी ढोकरा की अधिकतर वस्तुओं और सभी सजावटी कृतियों पर महीन नक़्क़ाशी या कढ़ाई की गई दिखती है जो उनके सौंदर्य को ही नहीं निखारती बल्कि ढोकरा तकनीक का निशान भी है.
ढोकरा शिल्प भारत के पुरातन शिल्पों में एक है, जिसमें धातु उद्योग के प्राचीनतम विधि लुप्त मोम विधि (सिरे पेरड्यू) का व्यवहार होता है. यह हस्तशिल्प हमारे देश में कम से कम 4000 वर्षों से चली आ रही है तथा इसका सबसे पुरातन एवं प्रसिद्ध उदाहरण है मोहन जोदड़ो की ‘नृत्य करती लड़की’.
ढोकरा की कलाकृतियों के निर्माण के लिए कुछ चीजों का व्यवहार आवश्यक है: धातु – तांबे और टिन/कांस्य या फिर तांबे और पीतल का मिश्रण, साल का रेज़िन और तेल, मिट्टी, धान की भूसी, कोयला और एक ज़मीन में खोदकर बनाई गई भट्ठी.
सर्वप्रथम मोटी मिट्टी और धान की भूसी में पानी से मिलाकर बनाई जाने वाली वस्तु के आकार का सांचा बनाया जाता है. इस सांचे के ऊपर महीन मिट्टी का लेप लगाया जाता है और उसके सूखने पर साल के रेज़िन/मोम और तेल को मिलाकर बने नरम मिश्रण के महीन तारों से पहले सांचे को ढक दिया जाता है और फिर आवश्यकतानुसार उसी तार से सुंदर कढ़ाई की जाती है.
सजावट के पश्चात रेज़िन/मोम से ढंके समूचे सांचे को पहले मिट्टी की महीन और फिर मोटी परतों से पूरी तरह से ढक दिया जाता है. सिर्फ़ सांचे के निचले छोर पर मोम की परत तक गहरा एक छेद छोड़ दिया जाता है. पूरी तरह सूख जाने पर सांचे को भट्ठी में जलते हुए कोयलों के मध्य रखा जाता है और पास ही में आग पर धातु को भी गलाया जाता है.
कुछ देर पश्चात अंदर का मोम जलकर भाप और धुंआ बन कर छोड़े गए छेद से निकल जाता है और मिट्टी की दो परतों के बीच अंदर बना जाता है एक गुहा. ढोकरा शिल्पकार उसी छेद से गर्म तरल धातु को मिट्टी की तहों के बीच बने सांचे में ढाल देते हैं. इस सांचे के ठंढा हो जाने पर मिट्टी की परतों को तोड़कर हटा दिया जाता है और प्रयोजनीय वस्तु अपने पूरे रूप और आकार में समक्ष आ जाती है.
शिल्पकारों के खानाबदोश आदिवासी समुदाय
इस शिल्प ने अपना नाम धातु शिल्पकारों के खानाबदोश आदिवासी समुदाय ढोकरा डामरों के नाम से लिया है. यह आदिवासी समुदाय मुख्यतः छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल में पाए जाते हैं. झारखंड में इन्हें मल्होर के नाम से भी जाना जाता है. परंपरा के अनुसार, हर कुछ सालों पर दो तीन ढोकरा डामर परिवारों के दल जंगल के किनारे अपना घर बनाते थे और वहीं से आस पास के गांवों में जाते थे.
उनके इस भ्रमण का उद्देश्य केवल ढोकरा की वस्तुओं और कला कृतियों को बिक्री करना न था बल्कि लोगों के घरों में पड़े पुराने टूटे हुए तांबे, कांसे और पीतल की चीज़ों को इकट्ठा करना भी था जिन्हें गलाकर घरेलू या धार्मिक क्रियाओं में उपयोगी ढोकरा की नई चीज़ों की रचना की जा सके.
1980 के दशक से आरंभ होकर ढोकरा लोकप्रिय होता चला गया, कुछ तो लोकसंस्कृति में बढ़ती दिलचस्पी के कारण और कुछ सरकार द्वारा प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रोन्नत किए जाने की वजह से. लोक शिल्प के क्षेत्र में केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा पांरपरिक मेलों का पुनरुत्थान और कई नए मेलों और प्रदर्शनियों का वार्षिक आयोजन भी किया जाने लगा.
इस तरह अन्य हस्त-शिल्पों के संग ढोकरा का भी शहरी आबादी के बीच अनावरण हुआ और इसकी लोकप्रियता भी बढ़ी. 1999 में बस्तर, जो कि ढोकरा का गढ़ है, के पांचू राम सागर को उनकी कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
आर्थिकी और बदलाव
21वीं सदी के आरंभ होने तक ढोकरा कलाकृतियों का सुनाम और प्रचलन विदेश भी पहुंच गया था और वहां इसकी मांग भी बढ़ रही थी. लेकिन इसका लाभ ढोकरा शिल्पियों को नहीं मिल रहा था. उन्हें अक्सर केवल दिहाड़ी से ही संतोष करना पड़ता था जबकि लाभ बिचौलियों और व्यापारियों को जा रहा था.
पिछले बीस सालों में केंद्र और राज्य सरकारों ने ढोकरा के शिल्पकारों को समूहों में संगठित कर आर्थिक समर्थन भी दिया है और लोक-शिल्प प्रदर्शनियों का आयोजन कर विक्रय तथा जायज़ दाम के अवसर भी दिए हैं.
1994 में बीकना ग्राम में शिल्पकारों की इस बस्ती में, जिसका नाम शिल्पग्राम भी है, ढोकरा आदिवासियों के मात्र चौदह-पंद्रह परिवार छोटे, भौंडे, मिट्टी और फूस से बने, खिड़की-विहीन झोंपड़ियों में रहते थे. घरों के बीच में गोलाकार खुली जगह थी जिसमें अक्सर ही कुछ अर्द्ध नग्न शिशु खेलते दिखते थे. कुछ घरों के सामने ज़मीन खोदकर बनाए गई भट्ठियां थीं. लेकिन समय और अवसरों ने काफ़ी कुछ बदल दिया है.
अब बीकना में ही क़रीब 60 आदिवासी परिवार ढोकरा शिल्प में काम कर रहे हैं. बस्ती के बच्चे स्कूल जाते हैं. सरकारी और ग़ैर-सरकारी संस्थानों ने मिलकर यहां उन्नत भट्ठियां लगाई हैं और उनमें निर्मित वस्तुओं के डिज़ाइनों में भी विकास और विस्तार हुआ है.
बीकना गांव की यह बस्ती पश्चिम बंगाल में ढोकरा का केंद्र बन चुकी है और यहां बनी कलाकृतियां देश-विदेश में जाती हैं. यह सब जानकर मुझे अच्छा लगता है लेकिन साथ में यह संशय भी है कि क्या रामेश्वर को अपने भाई को छुड़ाने के लिए अब भी थाने जाना पड़ता है?
(चंदन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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