युद्धों को उत्सव मत बनाइए!

समाचार माध्यमों में हमले कर 'दुश्मन' के संसाधनों को तहस-नहस किए जाने की ख़बरें तो भरपूर आ रही हैं, लेकिन निर्दोष नागरिकों के जान माल को पैदा हुए संकटों की बाबत खबरों का अकाल पड़ा हुआ है. न्यूज चैनलों पर युद्धों को नाटकीय संगीत और ग्राफिक्स के साथ कुछ इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, जो उसे जानकारीपरक बनाने के बजाय 'मनोरंजक' बनाए दे रहा है.

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तेहरान, 23 मार्च 2026: अमेरिका-इज़रायल हमले में क्षतिग्रस्त इमारत पर राहत और बचाव कार्य करते लोग. (फोटो: एपी/पीटीआई)

अपने देश में सम्राट अशोक के बारे में कहा जाता है कि कलिंग पर कब्जे के इतिहास प्रसिद्ध युद्ध में विजय के लिए भीषण रक्तपात के बाद उनको शांति, करुणा व अहिंसा का मार्ग श्रेयस्कर लगने लगा और उन्होंने उस पर चलने के लिए ‘बौद्ध धम्म’ अपनाया तो दीपदान का उत्सव शुरू किया. उनके निकट यह धम्म (नैतिक) विजय का उत्सव था.

लेकिन आज की शोषण व गैरबराबरी की व्यवस्था से आक्रांत दुनिया में संचार क्रांति के जाये दृश्य माध्यमों की बलिहारी, कि उन्होंने सीधे-सीधे युद्धों को ही उत्सव बना डाला है.

यों, इन माध्यमों द्वारा युद्धों को उत्सव के रूप में पेश करने की शुरुआत 19वीं शताब्दी के मध्य में 1850 के दशक में हुई मानी जाती है, जब क्रीमिया युद्ध (1854-1856) के दौरान पहली बार किसी युद्ध की व्यवस्थित फोटोग्राफी हुई और फोटोग्राफरों ने उसमें उसकी भयावहता के बजाय किसी पक्ष की ‘विजय’ व ‘साहस’ दर्शाने वाले दृश्य कैद किए.

इसके बाद विश्व युद्धों के दौर में मीडिया व कला प्रदर्शनियों की मार्फत युद्धों को सैनिकों के बलिदान के ‘वीरोचित’ उत्सव और उसके गौरवशाली रोमांच से जोड़कर पेश किया गया. कहने की जरूरत नहीं कि इसके लिए उन्हें ‘देशभक्ति’ का लबादा भी खूब ओढ़ाया गया.

बाद में न्यूज फिल्मों ने भी यही राह अपना ली और युद्धों का उत्सव मनाते हुए उनकी पीड़ादायक वास्तविकताओं को छिपाने लग गईं.

दूसरे विश्वयुद्ध के अंतिम चरण में हर हाल में अपनी चौधराहट के आकांक्षी अमेरिका ने 6 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा और 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर जापान से आत्मसमर्पण करवा लिया तो भी उनका ढर्रा बहुत नहीं बदला और उनके निकट युद्ध उतने निंदनीय नहीं हुए, जितने हो जाने चाहिए थे. भले ही दुनिया आज भी परमाणु हमले की आशंकाओं से सिहरी रहती है.

लेकिन अब लगता है कि उनका कड़वी सच्चाइयों को वह छिपाना तो एक शुरुआत भर था, जिसका चरम पहले खाड़ी युद्ध (2 अगस्त, 1990 – 28 फरवरी, 1991) के दौरान देखने में आया. तब, जब सजीव और सीधे प्रसारणों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा.

बहुत से लोगों को अभी भी याद होगा, तब उन्नत तकनीक वाले दृश्य माध्यमों ने इराक द्वारा दो अगस्त,1990 को कुवैत पर कब्जे के लिए किए गए आक्रमण के विरुद्ध अमेरिका के नेतृत्व में 34 देशों के संयुक्त राष्ट्र-अधिकृत गठबंधन की ‘डेजर्ट स्टार्म’ नामक सैन्य कार्रवाई को आतिशबाजी का सा रूप दे दिया था. जैसे कि बमवर्षक विमान बम गिराते हों तो वे फूल की तरह गिरते व फुलझड़ी की तरह फूटते हों और हाहाकार के बजाय हर्ष उत्पन्न करते व आह्लादित करते हों.

पहला टीवी युद्ध

इस कारण इसे मानव इतिहास का पहला टेलीविजन युद्ध भी कहा जाता है, जिसमें सीएनएन ने इराक की राजधानी बगदाद से बमबारी के लाइव दृश्य दिखाकर अपने दर्शकों को युद्ध को रोमांच से भर दिया था.

अनंतर, 2003-2011 के बीच अमेरिकी गठबंधन ने इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का तख्ता पलटने की नीयत से उनके सामूहिक विनाश के हथियारों (जो कहीं थे ही नहीं) के कथित भंडार को नष्ट करने के बहाने ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ नामक दूसरा खाड़ी युद्ध (जिसे अक्सर इराक युद्ध कहा जाता है) छेड़ा, तो युद्ध को उत्सव बनाने की दृश्य माध्यमों की होड़ चरम पर जा पहुंची.

इस कदर कि सद्दाम हुसैन के पकड़े और फांसी पर लटकाने जाने तक का भरपूर सेलीब्रेशन हुआ और युद्ध से जुड़ी अनेक गंभीर चिंताएं नेपथ्य में डालकर भुला दी गई. हालांकि तब तक युद्ध दो सेनाओं के बीच का टकराव भर नहीं रह गए थे, जो महज़ युद्ध क्षेत्र में लड़े जाते हों. यह टकराव युद्ध क्षेत्र के बाहर भी फैल गया था और उसकी जद में सैकड़ों हजारों मील दूर बैठे वे नागरिक भी आ गए थे, जिनका उससे कोई वास्ता था तो बस यही कि वे ऐसे देश में रहते थे, जो उस स्थिति का सामना करने को अभिशप्त था.

तब से अब तक दुनिया की नदियों में बहुत पानी बह चुका है और अब हम देख रहे हैं कि भले ही दुनिया एक साथ कई-कई युद्धों का सामना करने को अभिशप्त है और विश्वयुद्ध तक का अंदेशा झेल रही है, युद्ध उत्सव ही बने हुए हैं और उनसे पैदा हुआ अमानवीय उन्माद हाहाकारी तौर उनसे जुड़े सारे मानवीय पहलुओं की छाती पर सवार होकर उनके गले घोंट रहा है.

इस स्थिति का असर समाचार माध्यमों में ही नहीं बल्कि दुनिया के उन स्वनामधन्य चौधरियों के दिलो-दिमाग में भी दिखाई देता है, जो दुनिया को बारूद के ढेर पर बैठा, शांतिकामना का ढोंग रचते और कई-कई युद्धों को रुकवाने का दावा करते हैं. अमेरिका के स्वनामधन्य राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को तो ऐसा करते हुए अपने लिए शांति के नोबेल पुरस्कार का आकांक्षी हो जाने में भी कोई विडंबना नहीं दिखाई देती.

विनाश का आनंद!

क्या आश्चर्य कि इसके चलते समाचार माध्यमों में विमानों द्वारा बम बरसाकर या मिसाइल लॉन्चरों द्वारा हमले कर ‘दुश्मन’ के संसाधनों को तहस-नहस किए जाने की खबरें तो भरपूर आ रही हैं, लेकिन इन सबके बीच निर्दोष नागरिकों (जिनमें मेहनतकश और आर्थिक रूप से कमजोर लोग सबसे ज्यादा होते हैं) के जान माल को पैदा हुए संकटों की बाबत खबरों का अकाल पड़ा हुआ है.

दूसरी ओर न्यूज चैनलों पर युद्धों को नाटकीय संगीत और आकर्षक ग्राफिक्स के साथ कुछ इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, जो उसे जानकारीपरक बनाने के बजाय ‘मनोरंजक’ बनाए दे रहा है. खासकर उन लोगों के लिए जो मनुष्यता के विनाश के उपक्रमों से आनंदित होने से भी परहेज़ नहीं करते.

हद तो यह कि इजरायल द्वारा गाजा पर थोपा गया नरसंहार तक इसका अपवाद नहीं रह गया है. फिर रूस व यूक्रेन और इजरायल अमेरिका व ईरान के युद्ध या पाकिस्तान अफगानिस्तान के टकराव ही अपवाद क्योंकर हो सकते हैं. इसका अपवाद तो पाकिस्तान के विरुद्ध भारत का चार दिन का ऑपरेशन सिंदूर भी नहीं ही बन पाया.

सोचिए जरा: यह स्थिति तब है, जब युद्धजनित विभीषिकाओं से आम लोगों का जीना-मरना लगभग एक जैसा हो गया है. यानी वे ऐसी हालत में पहुंच गए हैं कि कहा जा सके कि न जी पा रहे हैं, न मर. लेकिन चूंकि वर्तमान मनुष्य विरोधी व्यवस्था में आर्थिक ढांचों के नुकसान जानी नुकसानों से बड़ी चीज हो गए हैं, इसलिए किसी को भी उनकी परवाह नहीं है.

ऐसा सत्ताधीशों की इस कुटिल ‘समझदारी’ के चलते है कि ‘दुश्मन’ के आर्थिक ढांचों को तबाह कर घुटनों के बल लाने के लिए निर्दोष नागरिकों का जीवन बेमोल या युद्धोन्माद की भेंट हो जाता है तो उसकी बहुत फिक्र करने की जरूरत तब तक नहीं है, जब तक उससे उनके अपने भविष्य या संभावनाओं पर असर नहीं पड़ता.

ऐसे में समझा जा सकता है कि क्या कारण है कि युद्धों में सैनिकों से ज्यादा निर्दोष व नागरिक हताहत होते हैं. लेकिन आर्थिक ढांचों को नुकसान न पहुंचे तो इसे बड़ी बात नहीं माना जाता और इससे जुड़ी खबरों को ढक तोपकर, छिपाकर या सेंसर करके काम चलाया जाता रहता है. कैसे?

वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने ‘द वायर हिंदी’ के अपने नियमित स्तंभ ‘कभी कभार’ की 29 मार्च, 2026 की कड़ी में लिखा है:

हर कहीं व्यापक समाज युद्ध के विरुद्ध ही होता है. (इसलिए) सबसे अधिक जनधन हानि समाज को ही उठानी पड़ती है. बड़ी संख्या में नागरिक हताहत होते हैं और सामान्य जनजीवन प्रभावित होता है….युद्ध के दौरान सत्ताएं जानबूझकर समाज का स्वयं स्थानापन्न बनने और उसे लगभग अतिक्रमित या स्थगित करने का उपक्रम करती हैं. माहौल ऐसा बनाया जाता है कि युद्ध के दौरान राज ही समाज है और समाज की स्वतंत्र सत्ता ग़ायब हो जाती है या कर दी जाती है.

वह कौन रोता है वहां

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ इस स्थिति के विरुद्ध गुस्सा जताते हुए बहुत पहले पूछ गए हैं:

वह कौन रोता है वहाँ-
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहू का मोल है
प्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है;
जो आप तो लड़ता नहीं,
कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता,
शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की?

***

ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्त्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी.
विश्व-मानव के हृदय निर्द्वेष में
मूल हो सकता नहीं द्रोहाग्नि का;
चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,
फैलतीं लपटें विषैली व्यक्तियों की साँस से.

लेकिन जहां उनके सवालों के जवाब अभी तक नदारद हैं, वहीं युद्धोत्सव के बीच उन महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की चिंताएं भी लगातार नेपथ्य में बनी हुई हैं (कहना चाहिए, जबरदस्ती नेपथ्य में डाल दी गई हैं), जो जानें कब से युद्धों की सबसे ज्यादा कीमत चुकाने को अभिशप्त होते आए हैं.

युद्ध कोई भी और किन्हीं भी पक्षों के बीच हो, तद्जनित हिंसा, यौन शोषण, विस्थापन और अकाल वगैरह के सबसे बड़े शिकार यही तबके हुआ करते हैं. वे युद्धों में अपने घर, शिक्षा, परिवार और बुनियादी सुरक्षा आदि सब कुछ खोकर आजीवन सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, नैतिक व मनोवैज्ञानिक नुकसान झेलने को विवश होते हैं.

इस दौरान महिलाओं को यौन हिंसा और बलात्कार आदि की अभूतपूर्व यातनाओं का सामना करना पड़ता है, जबकि बच्चों को कभी जबरन सशस्त्र बलों में भर्ती किया जाता है, कभी बरबस अपहरण जैसी घटनाओं का शिकार बनाया जाता है. भोजन, स्वच्छ पानी और चिकित्सा आदि की कमी से नाना प्रकार की कुपोषणजनित बीमारियां फैलती हैं, जिनका उनके शारीरिक और संज्ञानात्मक विकास पर बहुत बुरा खबर पड़ता है.

इतना ही नहीं, बच्चों की शिक्षा भी बाधित होती है और वे एक ‘खोई हुई पीढ़ी’ बन जाते हैं. लगातार बमबारी और हिंसा का साया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करता है, जिसके आघात से वे आजीवन उबर नहीं पाते. उनके परिवारों को अपने घर छोड़कर शरणार्थी बनना पड़ता है, तो वे बुनियादी सुविधाओं के अभाव में असुरक्षित जीवन जीने को मजबूर होते हैं और अनाथ हो गए तो उनके दुखों की इंतिहा ही नहीं रह जाती.

आदमीयत का तकाजा

लेकिन युद्ध के उत्सव के बीच आज भी किसी भी स्तर पर इन सबकी कोई खास चिंता नहीं दिखाई देती, जबकि गाजा और यूक्रेन जैसे संघर्ष क्षेत्रों में भी लगभग 70 प्रतिशत तक मौतें महिलाओं और बच्चों की ही हुई हैं और इराक और अमेरिका व इजरायल का युद्ध भी इसका अपवाद बनने नहीं जा रहा.

याद कीजिए: गाजा में बच्चों और महिलाओं के मारे जाने के विरुद्ध कुछ आवाजें उठीं भी तो बेशर्म और दुर्दांत इजरायल ने उनको कान देना जरूरी नहीं समझा. और अब अमेरिका द्वारा ईरान के एक स्कूल पर बम बरसाने से सैकड़ों बच्चियों की मौत हो गई तो उसे लेकर सवाल पूछे जाने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संवेदनहीन-सा जवाब है कि वे जांच करा रहे हैं. अपनी सेना की इस हैवानियत को लेकर उनमें न कोई अपराधबोध दिखता है, न ही चिंता.

यों, यह चिंता कितनी जरूरी है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि एक जानकारी के अनुसार 40 करोड़ से अधिक बच्चे युद्ध क्षेत्रों में रह रहे हैं और लगभग 47.2 मिलियन विस्थापन का सामना कर रहे हैं. विडंबना यह कि एक ओर वे युद्ध को नाटकीय दृश्यों से भरे उत्सव बनते देख रहे हैं (जिनके ग्लैमर की आड़ में उनकी भयावहता से जुड़े कड़वे सच छिपे जा रहे हैं) और दूसरी ओर अपने घर, स्कूल व अस्पताल नष्ट व जीवन दुश्वार होते और मिट्टी व पानी में जहर घुलते हुए.

काश, हम और किसी नहीं तो इस स्थिति से ही विचलित होते और आदमीयत के तकाजे से कम से कम इतना समझते कि युद्ध सिर्फ और सिर्फ मृत्यु और विनाश के उत्सव हो सकते हैं. तब हम उनके शिकार हो रहे बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों और महिलाओं के लिए कम से कम उतने तो दुखी होते, जितने अपने लिए रसोई गैस की किल्लत को लेकर हो रहे हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)