क्या आज का ‘लोकतंत्र’ नवाबों के ज़माने से भी गया-गुज़रा हो चला है?

आज लोकतंत्र में हाल यह हो गया है कि असहमतियों की बरबस अवहेलना कर उन्हें ख़ामोश कराने की सरकारी 'परंपरा' इतनी सुदृढ़ हो चली है कि अब गंभीर आलोचनाओं की कौन कहे, हंसी-मज़ाक के स्तर पर भी उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जा रहा. कार्टून और एनीमेटेड वीडियो तक सेंसर किए जा रहे हैं. ऐसी टिप्पणियां, जिन्हें हंसकर टाला जा सकता है, उनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराई जा रही है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय के वी-डेम इंस्टिट्यूट द्वारा प्रकाशित ‘डेमोक्रेसी रिपोर्ट 2026 : अनरैवेलिंग द डेमोक्रेटिक एरा’ रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में 2017 में आई ‘चुनावी तानाशाही’ की उम्र लगातार लंबी होती जा रही है और वह लिबरल डेमोक्रेसी इंडेक्स में 179 देशों में 105वें स्थान पर जा पहुंचा है, जबकि पिछले वर्ष 100वें स्थान पर था.

इसके चलते असहमतियों की बरबस अवहेलना कर उन्हें खामोश कराने की सरकारी ‘परंपरा’ इतनी सुदृढ़ हो चली है कि अब उसे गंभीर आलोचनाओं कौन कहे, हंसी मजाक के स्तर पर भी बर्दाश्त नहीं किया जा रहा. और तो और, कार्टून और एनिमेटेड वीडियो तक सेंसर किए जा रहे हैं और सरकारों, खासकर प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्रियों के विरुद्ध ऐसी टिप्पणियों को भी, जिन्हें हंसकर टाला जा सकता है, आपत्तिजनक करार देकर पुलिस द्वारा उन्हें करने वालों पर एफआईआर दर्ज कराई जा रही और जेल तक भेजा जा रहा है.

स्थिति को कुछ इस तरह समझा जा सकता है कि पिछले दिनों द वायर हिंदी को क्षुब्ध होकर अपने एक संपादकीय का शीर्षक ‘(सरकार पर) हंसना मना है‘ देना पड़ा. साथ ही, अपना पक्ष रखते हुए यह भी कहना पड़ा कि लोकतंत्र तब कमज़ोर होता है जब सत्ता में बैठे लोग हंसी से डरते हैं, और उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू करते हैं.

अयोध्या में रहने वाले अवध के मामलों के कई जानकार बताते हैं कि इस ‘चुनावी तानाशाही’ जैसी ‘तानाशाही’, कम से कम अवध में नवाबों के वक्त भी नहीं थी.

तब भी इतना लोकतंत्र था

तब भी नहीं, जब इन नवाबों ने अपने को दिल्ली की ढह रही मुगल बादशाहत से आज़ाद बादशाह घोषित कर लिया था और इसके बावजूद कि ईस्ट इंडिया कंपनी बढ़ी चली आ रही थी, उनकी तूती भरपूर बोला करती थी. लोग यहां तक कहते थे कि नवाबी चटकी हुई है.

इन जानकारों के अनुसार, नासिरुद्दीन हैदर (जो 1827 में अवध के बादशाह बने और 1837 तक रहे) के राज में इतना ‘लोकतंत्र’ था कि उनको सरे दरबार गधा तक कहा और बदले में पुरस्कृत हुआ जा सकता था.

पढ़कर आप चकित हो रहे होंगे, लेकिन इस बाबत एक वाकया अब किस्सा बनकर प्रचलित है. यह कि नासिरुद्दीन हैदर अपनी रियाया का सच्चा हाल जानने के लिए की बार रातों को भेष बदलकर लखनऊ की गलियों में घूमा करते थे और उस दौरान होने वाले अजीबोगरीब अनुभवों से बहुत कुछ ‘सीखते’ व उनकी रौशनी में राजकाज का ढर्रा सुधारते थे.

एक अंधियारी रात को वे अपने वजीर के साथ लखनऊ के ऐतिहासिक चौक से आगे स्थित मंसूरनगर पहुंचे और एक पुरानी हवेली के सामने थोड़ी देर रुककर चलने को हुए तो उसके अंदर से एक लड़की को कहते सुना, ‘वह जा रहा है.’

उसकी यह बेअदबी उनको अंदर तक बेध गई, लेकिन चूंकि उस वक्त उन्होंने भेष बदला हुआ था, इसलिए अपने गुस्से को अंदर ही अंदर पी गए. लेकिन तभी दूसरी लड़की बोल पड़ी, ‘वह नहीं होगा.’ फिर जैसे तीसरी से भी चुप नहीं रहा गया. वह भी कह उठी, ‘वह होता तो जाता ही क्यों?’

फिर तो वे आपा खोने और लड़कियों को मजा चखाने पर आमादा हो उठे. लेकिन वजीर ने खुद तो वक्त की नजाकत समझी ही, उन्हें भी उनके भेष, छवि और वक्त तीनों की नजाकत समझाई और कहा कि इतनी रात गए इस बात को लेकर हवेली में हड़बोंग मचाना ठीक नहीं होगा. हां, वे चाहें तो इन गुस्ताख लड़कियों को अगले दिन दरबार में तलब कर जो चाहें, वह सबक सिखा सकते हैं.

नासिरुद्दीन हैदर मान गए. लेकिन लड़कियां उम्मीद से कहीं ज्यादा ढीठ निकलीं. तलब की गईं तो सहमी-सहमी नहीं, बल्कि हंसती-हंसती दरबार में पेश हुईं और रात की बात की कैफियत तलब की जाने लगी तो उलटे पूछ बैठीं, ‘कोई अपने घर में किसी से कुछ भी कहे-सुने, बादशाह को उससे क्या? उन्होंने चुपके से हमारी बातें सुनीं ही क्यों?’

फिर वे बादशाह और दरबारियों को आश्चर्य के सागर में छोड़ आपस में ही बातें करने लगीं. पहली बोली, ‘मुझे तो ये वही लगता है.’ दूसरी ने संदेह जताया, ‘वह होता तो क्या वे न होते?’ और तीसरी ने जवाब दिया, ‘ऐसे भी होते हैं, जिनके वे नहीं होते.’

बेअदबी पर बेअदबी! गुस्से से भरे नासिरुद्दीन हैदर ने हुक्म दिया, ‘ले जाओ, आफत की इन परकालाओं को दरबार से और जेल में डाल दो.’

जेल जाने से भला किसको डर नहीं लगता? अब तक बेधड़क दिख रही लड़कियां भी जेल भेजी जाने के नाम से डर गईं और एक के बाद एक अपने राज खोलने शुरू कर दिए.

तीनों लगभग एक साथ बोलीं: इन दिनों हमारा बड़ी गर्दिश से सामना है हुजूर. किसी तरह इज्जत-आबरू बचाकर चिकन का काम करके गुजारा कर रही हैं और नहीं चाहतीं कि कोई हमारा खस्ताहाल जाने. रात आपने हमारी बातें सुनीं, तो हम काम में व्यस्त थीं. तभी दीया बुझने लगा तो हममें से एक ने इशारे से बाकी दोनों से अपना-अपना काम समेट लेने को कहा, क्योंकि वह (दीया) जा रहा (बुझने वाला) था. इस पर दूसरी ने, तेल शब्द जुबान पर लाए बिना, कहा कि उसमें ‘वह नहीं होगा’ और तीसरी ने हामी भर दी, ‘वह होता तो जाता ही क्यों?’

किसी के पूछने से पहले ही उन्होंने यह भी बता दिया कि उनके इस तरह इशारों-इशारों में बातें करने का सबब यह था कि कोई उनकी बात सुन भी ले तो अंदाजा न लगा सके कि उनके घर में ऐसी गरीबी है कि उनको दीये में तेल तक मयस्सर नहीं.

बात पूरी कर वे शिकायत पर उतर आईं हमें क्या मालूम था हुजूर कि चुपके-चुपके आप हमारी बातें सुन रहे हैं और ठीक से दरयाफ्त किए बिना ही अगले दिन यहां दरबार में तलब कर लेंगे. यह भी नहीं सोचेंगे कि हम सयानी व परदेदार हैं और ऐसी तलबी से हमारी बड़ी हेठी होगी.

बादशाह ने सुना तो जैसे आसमान से सीधे जमीन पर गिर पड़े! ऐसे कि अटकने के लिए खजूर भी नसीब नहीं हुआ उनको.

लेकिन ‘मुझे तो ये वही लगता है’ को लेकर उनका सवाल अभी भी अपनी जगह बाकी था. पूछा तो लड़कियों ने बताया, ‘मुझे तो ये वही लगता है’ में ‘वही’ का मतलब है- आदमी के जामे में जानवर.

यह भी इकबाल कर लिया कि पहली लड़की ने यह बात बादशाह के लिए ही कही थी. यह सोचकर कि उन जैसी सयानी लड़कियों को बिना वजह अपने दरबार में बुलवाने वाले बादशाह आदमी तो कतई हो ही नहीं सकते. इस पर दूसरी ने पूछा था कि जानवर होते तो उनके सींग न होते और तीसरी ने जवाब दिया था, ‘जानवरों में गधे भी तो होते हैं, जिनके सींग नहीं होते.’

इतना जानकर सोचिए जरा, खुद को गंवा कहें जाने को लेकर बादशाह कितने झुंझलाये होंगे? कहीं उन्होंने लड़कियों की गरदनें धड़ से अलग करने का हुक्म तो नहीं दे डाला?

नहीं, दिवंगत लखनऊविद योगेश प्रवीन लिख गए हैं: नहीं भाई, कतई नहीं. लखनऊ यों ही लखनऊ नहीं बना और अवध की तहजीब के गुन यों ही नहीं गाते जाते. लड़कियों की साफगोई और सलीके के कायल होकर बादशाह ने उन्हें भरपूर इनाम-इकराम तो दिए ही, उनकी शादियों का बंदोबस्त भी किया.’

मगर अजब-गजब भी!

गौरतलब है कि यह तब था, जब उनके पिता बादशाह गाजीउद्दीन हैदर (1814-1827) और उनके वजीर आगामीर अपने वक्त में शासन व्यवस्था की सुचारुता से ज्यादा अपने अजब-गजब कारनामों के लिए जाने जाते थे.

इनमें गाजीउद्दीन का ‘अजब’ यह था कि वे गुस्साते तो आगामीर के ऊंचे पद तक का लिहाज न करते और उन पर ताबड़तोड़ थप्पड़ व घूंसे बरसाने लगते. एक बार तो उन्होंने एक बावर्ची की इस शिकायत पर भी आगामीर को पीट डाला था कि उन्होंने उनके (नासिरुद्दीन हैदर) के पराठे पकाने के लिए उसको दिए जाने वाले घी की मात्रा एक चौथाई कर दी है.

पीटने के साथ ही उन्होंने उन्हें झिड़ककर यह तक कह दिया था, ‘खुद तो सारी सल्तनत लूटे जाते हो और बावर्ची थोड़ा ज्यादा घी ले लेता है तो बर्दाश्त नहीं कर पाते.’

लेकिन आगामीर का जवाबी ‘गजब’ भी कुछ कम न था. नासिरुद्दीन के हाथों कई बार पिटने के बावजूद उन्होंने कभी ‘उफ’ तक नहीं किया, न ही वजारत छोड़ी. गाजीउद्दीन भी उनके हाथों ‘सल्तनत की लूट’ के बावजूद उन्हें लंबे वक्त तक सहते रहे.

कारण यह कि आगामीर और गाजीउद्दीन बचपन के दोस्त थे. इसलिए गाजीउद्दीन ने गद्दी पर बैठते ही आगामीर को वजीर बना दिया था. गोकि वे उनकी रग-रग से वाकिफ थे. बाद में अंग्रेज गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्ज के बहकावे में आकर उन्होंने खुद को ‘दिल्ली के दबदबे से आज़ाद अवध का स्वतंत्र बादशाह’ घोषित किया तो कहते हैं कि आगामीर ही सबसे ज्यादा खुश हुए थे. यह सोचकर कि बेलगाम बादशाह की लगाम अब एकमात्र उन्हीं के हाथ रहेगी.

प्रसंगवश, आगामीर मीर तकी तुर्कमानी के बेटे थे और उनका माता-पिता का दिया नाम सैयद मुहम्मद खां था. वजीर बने तो उन्हें मोतमउद्दौला मुख्तार-उल-मुल्क सैयद मुहम्मद खां बहादुर उर्फ आगामीर का खिताब मिला, जो बाद में आगामीर भर रह गया. इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने ऐसी विलक्षण बुद्धि पाई थी, जो सूबे का खजाना भरने की करामातों में तो उनकी मदद करती ही थी, अपना घर भरने से भी मना नहीं करती थी.

अपनी वजारत के दौरान उन्होंने सूबे का खजाना इतना भर दिया था कि वह उन दिनों खस्ताहाल ईस्ट इंडिया कंपनी को बड़े-बड़े कर्ज दिया करता था. इतना ही नहीं, उन्होंने लखनऊ में अपने नाम की एक ड्योढ़ी भी बनवाई थी, जो आज उसके एक मुहल्ले का नाम है.

यह ड्योढ़ी बन रही थी तो उन्होंने एक इत्रफरोश से उसका सारा इत्र खरीदकर उसे गारे में मिलवाया और उसी से दीवारों का पलस्तर करवाया था. ताकि दीवारें दूर-दूर तक खुशबू बिखेरती रहें. उन्होंने अपने नाम से एक सराय भी बनवाई थी.

आगामीर की करामातें

योगेश प्रवीन ने अपनी पुस्तक ‘नवाबी के जलवे’ में लिखा है कि एक समय सूबे में आगामीर की मर्जी के बगैर पत्ता तक नहीं हिलता था और उनकी ‘करामातों’ की चहुंओर चर्चा होती थी.

लेकिन पानी सर से ऊपर हो गया तो मजबूर बादशाह ने उन्हें बर्खास्त कर दिया. फिर भी वे नहीं सुधरे. लखनऊ के चौक में यह प्रचार कर धन उगाही करने लगे कि बादशाह उधर से एक नहर निकालने का मंसूबा बना रहे हैं.

नहर निकलती तो वहां के बाशिंदे बेघर-बेदर हो जाते. इसलिए उन्होंने चांदी के सिक्कों से भरे तोड़े (थैले) आगामीर की नजर करने शुरू कर दिए. इस प्रार्थना के साथ कि जैसे भी बने, बादशाह का मंसूबा बदलवाएं. लेकिन वजारत की तनखाह से कई गुनी यह रकम आगामीर को फली नहीं. बात बादशाह तक पहुंची तो उन्होंने खीझकर उन्हें सूबे से निर्वासित कर दिया. निर्वासन में ही कानपुर में उनका इंतकाल हो गया.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)