पश्चिम बंगाल में ‘देयाल लिखन (दीवार लेखन)’ के बारे में मैंने पहली बार 1991 के मार्च महीने में सुना था, मेरे प्रशासनिक सेवा के ज़िला प्रशिक्षण के दौरान. बारासात शहर के एक पाड़ा में दो दलों के बीच ‘देयाल दख़ल (दीवार दख़ल)’ यानी की दीवारों को क़ब्ज़े में लेने की प्रचेष्टा संग्राम बन गई और बात सिर-फुट्टौव्वल से आगे निकल ही रही थी कि पुलिस आ गई.
उस दिन ऐसी तीन चार घटनाएं ज़िला मुख्यालय में ही घट गई थीं इसलिए खबर मेरे कानों तक पहुंची. दरअसल 6 मार्च को चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दिया था और एक सप्ताह पश्चात राष्ट्रपति वेंकटरामन ने लोकसभा भंग कर दी, और चुनाव की घोषणा हो गई. लोकसभा भंग होते ही बंगाल में राजनीतिक दल हरकत में आ गए थे और उन सबका प्रथम प्रयास यही था कि हर शहर, क़स्बे और गांव में सारी दीवारों को अपने क़ाबिज़ कर लें.
35 वर्ष पूर्व भी बंगाल में राजनीतिक दलों के लिए यह एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रक्रिया बन चुकी थी. जिस तरह शहर के हर बिजली के खंभे पर गली के श्वानों का पहला अधिकार है उसी तरह हर पाड़ा या मोहल्ले में रास्तों के साथ चलती दीवारों पर- वह घरों की हों, दुकानों की, अहातों की या किसी भी तरह के भवन की- पहला अधिकार अवश्य ही राजनीतिक दलों का है. इसीलिए चुनाव की औपचारिक घोषणा से कहीं पहले दलों के कार्यकर्ता हर पाड़ा में दीवारों पर फुर्ती से अपना अधिकार जमाने और जताने का काम करने लगते थे.
दीवारों पर वह दल के ‘आधिकारिक’ रंगों से अपने दल का नाम तथा चुनावी प्रतीक अंकित कर घोषणा कर देते थे कि यह दीवार उनकी पार्टी के लिए संरक्षित हो चुकी है, इस स्थान पर कोई और दल कूची फेरने की धृष्टता न करे.
समस्या उन बस्तियों में न थी जहां किसी एक दल के लोगों का बहुमत था. संघर्ष की संभावना उन इलाक़ों में रहती थी जहां कोई भी दल बहुसंख्यक न था. उन पाड़ाओं में अक्सर बातचीत के माध्यम से दलों के बीच दीवारों का बंटवारा हो जाता था या फिर संग्राम छिड़ता था. दीवारों के लिए संग्राम होना स्वाभाविक था क्योंकि सर्वप्रथम जनमानस तक पहुंचने का, राजनीतिक दलों की बातों को जनता के बीच रखने का, उनके चुनावी इश्तिहार को उजागर करने का यही सबसे विस्तृत माध्यम हुआ करता था. लेकिन दीवार लेखन राजनीतिक दलों का इश्तिहार मात्र न तो तब था और न ही अब है.
चुनावी प्रचार का प्रभाव और मूल्य
कुछ ही दिनों में बंगाल में फिर चुनाव होने हैं, इस बार विधानसभा के लिए. सभी दलों की तैयारी ज़ोर शोर से चल रही है. यह ठीक है कि पहले के अनुपात में दीवार लेखन द्वारा चुनावी प्रचार का प्रभाव तथा मूल्य उतना नहीं रह गया है जितना 35 वर्ष पहले था. लेकिन आज भी ‘देयाल दख़ल’ ज़िंदा हैं और भिन्न राजनीतिक पार्टियां ‘देयाल लिखन’ में व्यस्त हैं.
चुनाव की ऋतु में दीवार लेखन जनता को पार्टियों का संवाद है, उस क्षेत्र में उनके उम्मीदवारों का परिचय है. यह दीपावली पर चीनी बल्बों सा जगमगाता उनके वादों का घोषणा पत्र है और उनकी बेवजह गूंजती प्रतिज्ञाओं का प्रमाण भी. यह राजनीतिक दलों का परस्पर लगाए तीक्ष्ण अभियोगों का रजिस्टर भी है तथा प्रतिद्वंद्वियों पर उनके वाक-पटु, व्यंगात्मक और कटु टीका-टिप्पणियों की पत्रिका भी.
यहां कैलीग्राफ़ी भी है और कार्टून भी, निवेदन भी और कटाक्ष भी. यहां गद्य भी है और पद्य भी. यहां एक पंक्ति का नारा भी है और दो पंक्तियों की कविता भी और कई बार कविता ही नारा बन जाती है, ज्यों 1970 के दशक की यह लघु कविता-नारा, ‘आमार नाम तोमार नाम, वीएतनाम-वीएतनाम’ (मेरा नाम तुम्हारा नाम, विएतनाम-विएतनाम). इस तरह की कविता जो हर स्तर के चुनाव और अन्य प्रतिवाद आंदोलनों के समय दीवारों पर प्रकट होती है इतनी आम है कि पश्चिम बंगाल में इसे दीवार कविता के नाम से जाना जाता है.
दीवार पर व्यक्त जिस संवाद को आप एक नज़र में पकड़ लेते हैं अक्सर उसे अंकित करने में किसी ने कई घंटे गुज़ार दिए होते हैं. 30-35 वर्ष पूर्व इस कार्य में राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता पूरी तरह से जुड़े हुए थे और आज भी कई दलों के कार्यकर्ता इस काम में भागीदार हैं. पर कुछ अंतर आ गया है. उस वक्त पार्टियां दीवार लेखन का दायित्व अपने कर्मियों को ही देती थीं. वाम पार्टियां इसके लिए चुने हुए कर्मियों के लिए दीवार लेखन पर कार्यशालाओं का आयोजन भी करती थीं जिनमें उन्हें बांग्ला कैलीग्राफ़ी, रंगों का मिश्रण एवं व्यवहार, तथा दीवारों और पोस्टर पर लिखने की विधि सिखाई जाती थी. लेकिन आजकल यह काम पेशेवर दीवार लेखक और चित्रकार कर रहे हैं.
दीवार लेखन में रंगों का चयन आकस्मिक या विचारहीन नहीं होता है क्योंकि राजनीतिक दलों को भली-भांति ज्ञात है कि उनकी पहचान बनती तो उनके नाम और चुनाव चिह्न से है पर पक्की होती है उनके रंगों से. इसीलिए आप बंगाल के दीवार लेखन में पाएंगे कि कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (सीपीएम) मूलतः लाल और काला रंग, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) हरा, नारंगी, और काला तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भगवा और काले रंग का व्यवहार करते हैं. हालांकि यह भी सच है कि पिछले दो चुनावों में टीएमसी के दीवार लेखन व पोस्टरों में कुछ और भी रंग झलकने लगे हैं, विशेषकर नीला.
प्रचार की बदलती पद्धति
अंतर सिर्फ़ रंगों के चयन में ही नहीं आया है. वक्त के साथ चुनाव प्रचार पद्धति भी बदलती रही है और इस पर संचार माध्यमों और सूचना प्रौद्योगिकी के अति द्रुत विकास का प्रभाव सबसे विस्तृत रहा है. पिछली शताब्दी के अंत और नई सदी के आरंभ के कुछ वर्षों तक दलों के पताके, पोस्टर, पर्चे, दीवार लेखन, और लाउडस्पीकर ही चुनावी प्रसार में सबसे अधिक व्यवहार किए जाते थे.
हां, तब भी पोस्टर हस्तलिखित न होकर छापे जाते थे, लाउडस्पीकर सिर्फ़ बहुमुखी वैन रिक्शा पर ही नहीं गाड़ियों पर भी कैसेट प्लयेर के माध्यम से बजाए जाते थे. इसके अलावा प्रत्याशियों और पार्टी कर्मियों द्वारा चुनावी क्षेत्र में घर-घर जाकर वोटरों से मिलना, जुलूस निकालना, नुक्कड़ सभा करना और दल के वरिष्ठ नेताओं द्वारा बड़ी-बड़ी रैलियां संबोधित करवाना भी चुनावी प्रकरण के अंश थे. इनमें से ज़्यादातर प्रचार और जनसंपर्क के तरीक़े अभी भी ज़्यादातर जगहों पर इस्तेमाल किए जाते हैं पर बदलाव उन में भी आ चुका है.
21वीं सदी की शुरुआत तक टीवी प्रचार का एक बड़ा साधन बन चुका था और चुनाव के लिए भी यह अत्यंत ही कारगर सिद्ध हुआ. टीवी पर हर क़िस्म के दल हर तरह के छोटे-बड़े वीडियो द्वारा अपनी बात वोटर के ज़ेहन पर छापने की कोशिश करने लगे थे. ग्रामीण इलाक़ों में टेलीविज़न (टीवी) के पीछे-पीछे केबल टीवी का आगमन हो चुका था. इसका व्यवहार सबडिवीज़न और ज़िला स्तर पर सरकार के विनियम एवं विकास की स्कीमों की जानकारी गांवों तक पहुंचाने के लिए किया जा रहा था, मैंने भी किया था. साथ ही में राजनीतिक दलों ने भी केबल टीवी का अपने चुनावी प्रचार में जमकर उपयोग करना आरंभ किया.
उस जमाने के टीवी और लोकल केबल चैनलों पर दिखाए गए तथा पोस्टरों और बैनरों पर फहराए नारों में बहुत फ़र्क़ नहीं हुआ करता था. जैसे 2011 के विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल की मुख्य पार्टियों, टीएमसी और सीपीएम, के ये दो नारे- ‘बदला नय, आमरा बदल चाई’ (बदला नहीं हमें बदलाव चाहिए) तथा ‘कृषि आमादेर भित्ति, शिल्पो आमादेर भबिश्यत’ (कृषि हमारी नींव है, शिल्प हमारा भविष्य) टीवी, दीवारों और पोस्टरों – हर जगह दिखाई दिए.
इसी दौरान शहरों और उनके आसपास एफएम रेडियो पर भी चुनावी प्रचार ने ज़ोर पकड़ा और लोगों के मन में पैठने के लिए हर पार्टी के नारे भरे गानों में होड़ लग गई.
सोशल मीडिया स्मार्टफोन और इंटरनेट का व्यवहार
नई सदी के दूसरे दशक तक सोशल मीडिया स्मार्टफोन तथा इंटरनेट का व्यवहार भी पूरे देश में तेज़ी से बढ़ने लगा. इस चुनाव में भाजपा ने अपने नामित प्रधानमंत्री उम्मीदवार- नरेंद्र मोदी की छवि को देश के विभिन्न भागों में सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों के बीच स्थापित करने में अभूतपूर्व सफलता हासिल की. चूंकि 2014 के आम चुनाव में राजनीतिक दलों ने फेसबुक, ट्विटर तथा यूट्यूब का व्यापक व्यवहार किया इसे अक्सर पहला ‘डिजिटल राष्ट्रीय चुनाव’ भी चिह्नित किया जाता है. अन्य पार्टियों के लिए इस चुनाव में एकाधिक सबक थे, जिनमें मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया की तिकड़ी का चुनावी संभावनाएं भी शामिल थीं.
फिर 2016 सितंबर में रिलायंस जिओ कंपनी मोबाइल टेलीफोन के क्षेत्र में कमर कसकर उतर पड़ी. जिओ ने अपने नए ग्राहकों को तीन महीने (जो बढ़कर अंततः छह महीने हुए) तक इंटरनेट के साथ मुफ़्त मोबाइल सेवा स्वागत बोनस देकर लुभाया. फलस्वरूप कर तीन माह में यह कंपनी दस करोड़ से भी अधिक ग्राहक बनाने में सफल रही. सस्ते स्मार्ट फोन और सस्ती मोबाइल इंटरनेट परिसेवा ने सोशल मीडिया की विज्ञापनों की भूखी दीवारों को लगभग हर आर्थिक स्तर तथा हर क्षेत्र के लोगों के हाथ में पहुंचा दिया.
पश्चिम बंगाल में सोशल मीडिया का प्रभाव 2019 के आम चुनाव, जिसे ‘वॉट्सऐप चुनाव’ भी कहा जाता है, से दिखना आरंभ हो गया था.
(क्रमशः)
(चंदन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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