ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, भारतीय संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित हो चुका है. लेकिन इस विधेयक को ट्रांसजेंडर समुदाय अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानकर इसका विरोध कर रहा है.
2014 के ऐतिहासिक नालसा (NALSA) फैसले में, उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि जेंडर (लिंग) का संबंध आत्म-पहचान से है. यानी कोई भी व्यक्ति अपना जेंडर अपनी अनुभूति के अनुरूप स्वयं तय कर सकता है.
इसी तर्क को भारत सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में स्वीकार किया. लेकिन 2026 के ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक में, जेंडर निर्धारण के मानकों में आत्म-पहचान की सुविधा को समाप्त कर दिया गया है. नए बिल के अनुसार ‘ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सरकार द्वारा नामित एक मेडिकल बोर्ड की सिफारिशों के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट से ट्रांसजेंडर का पहचान प्रमाण पत्र प्राप्त करना होगा. इस मेडिकल बोर्ड का नेतृत्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सी एम ओ) या उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी करेंगे’ यानी वर्तमान विधेयक ट्रांसजेंडर की लैंगिक पहचान तय करने का सर्वाधिकार मेडिकल बोर्ड और जिला अधिकारी को देता है.
किंतु जेंडर मन में होता है, देह में नहीं. जेंडर एक अनुभूति है जो व्यक्ति के आंतरिक हिस्से में होती है, बाहरी देह या गुप्तांग में नहीं. इतनी सामान्य सी बात यह बिल बनाने वाले क्यों नहीं समझते?
इस विधेयक का सबसे खतरनाक और स्याह पक्ष यह है कि यह जेंडर तय करने का अधिकार व्यक्ति को नहीं मेडिकल बोर्ड और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को प्रदान करता है. यह विधेयक जैव-राजनीति का खतरनाक रूप पेश करता है, जिसकी आड़ में ट्रांसजेंडर और क्वियर समुदाय पर मेडिकल निगरानी बढ़ेगी. इस विधेयक की भयावहता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि, ट्रांसजेंडर समुदाय इसे अपने जीवन-अस्तित्व के लिए संहारक मान रहा है.
क्या इस बिल के सूत्रधारों ने औपनिवेशिक भारत में ट्रांसजेंडर और क्वियर समुदाय पर मेडिकल निगरानी के दमनकारी अनुभव से कोई सबक नहीं लिया? क्या उन्हें नहीं पता कि ट्रांसजेंडर की देह को चिकित्सकीय दृष्टि से जांचने की प्रथा औपनिवेशिक युग में शुरू हुई थी?
इतिहासकार जेसिका हिंची ने अपनी पुस्तक ‘गवर्निंग जेंडर एंड सेक्सुअलिटी इन कॉलोनियल इंडिया’ में विस्तार से लिखा है कि औपनिवेशिक भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय को चिकित्सा के माध्यम से प्रताड़ित किया जाता था. उदाहरण के लिए, 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (आपराधिक जनजाति अधिनियम) के भाग II में प्रावधान था कि ‘जन्म के समय जिन व्यक्तियों का लिंग (सेक्स) पुरुष का है और जो चिकित्सीय परीक्षण में स्पष्ट रूप से नपुंसक प्रतीत होते हैं, उन्हें हिजड़ा के रूप में श्रेणीबद्ध किया जाएगा… औपनिवेशिक चिकित्सक आमतौर पर उनके गुप्तांगों को नग्न कर परीक्षण करते थे और उनकी बनावट पर टिप्पणी करते थे.’
जेसिका हिंची ने यह भी लिखा है कि औपनिवेशिक भारत में ‘क्रॉसड्रेसर्स (स्त्री वस्त्र धारण करने वाले पुरुष), हिजड़ा, जनाना और नपुंसक पुरुषों के शरीर का चिकित्सा परीक्षण, सिविल सर्जन और फिजिशियन डॉक्टर करते थे.’
किन्नर एक्टिविस्ट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी इस विधेयक पर अपना क्षोभ प्रकट करते हुए कहती हैं, ‘यह बिल हमें मेडिकल बोर्ड के सामने नग्न करना चाहता है.’ क्या हमें इस बात का अंदाजा है कि डॉक्टर की निगाह और ट्रांसजेंडर की नग्न देह के मध्य जो सत्ता संबंध निर्मित होगा, वह ट्रांसजेंडर को दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर छोड़ेगा?
यह विधेयक औपनिवेशिक भारत में हिजड़ा समुदाय के साथ हुए भयावह विभीषिका को पुनर्स्थापित कर रहा है. इसके तहत ट्रांसजेंडरों की दैहिक निजता तथा दैहिक स्वायत्तता का घोर उल्लंघन होगा. आजकल उपनिवेशवाद से मुक्ति के बड़े-बड़े दावे उत्साहपूर्वक किए जाते हैं. लेकिन विडंबना यह है कि समय-समय पर हमारी राजनीतिक सत्ता, उपनिवेशवाद की विकृतियों को दोहराती भी रहती है. ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक इसी प्रवृत्ति का ताजा उदाहरण है.
प्रसिद्ध समाजशास्त्री मिशेल फूको ने अपनी पुस्तक ‘द बर्थ ऑफ द क्लिनिक’ (1963) में जिस चिकित्सकीय निगाह (मेडिकल गेज़) की चर्चा की थी, वह ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक के संदर्भ में प्रासंगिक है. फूको के अनुसार आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में ‘डॉक्टर की दृष्टि, सत्य का अंतिम स्रोत बन जाती है, और मरीज के वैयक्तिक विचार और भाव महत्वहीन हो जाते हैं.’ डॉक्टर के समक्ष एक मरीज की तो फिर भी कुछ शक्ति होती है, लेकिन ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक में मेडिकल बोर्ड के समक्ष ट्रांसजेंडर को लाचार और शक्तिहीन बना दिया गया है. हमें ट्रांसजेंडर को चिकित्सकीय निगाह जांचने परखने की ग्रंथि से बाहर निकलना होगा, ऐसा कर के हम यह स्थापित करते रहते हैं कि ट्रांसजेंडर होना बीमारी का लक्षण है, जबकि ऐसा नहीं है.
इस विधेयक के तहत ‘अस्पतालों के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे जेंडर-परिवर्तन की शल्य चिकित्सा करवाने वाले व्यक्ति का विवरण सीधे जिला मजिस्ट्रेट को सौंपें.’ इस तरह के प्रावधान से ट्रांसजेंडरों की लिंग-परिवर्तन वाली शल्यचिकित्सा में नौकरशाही की जकड़बंदी मजबूत होगी. इसका दुष्परिणाम यह होगा कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों द्वारा गुप्त ढंग से, गैर-पेशेवर सर्जनों द्वारा लिंग परिवर्तन या जेंडर परिवर्तन सर्जरी करवाने की घटनाओं में वृद्धि होगी. पूर्वी उत्तरप्रदेश में ट्रांसजेंडर समुदाय के बीच काम करते हुए मुझे ऐसे उदाहरण मिले.
वहां के स्थानीय अस्पतालों में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग गैर-पेशेवर सर्जन से सर्जरी करवाते रहे हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से घातक होती है. कुछ ट्रांसजेंडर की तो संक्रमण से मृत्यु भी हो जाती है. अब इस विधेयक के पश्चात इस तरह की घटनाएं और भी बढ़ सकती हैं.
यह विधेयक ट्रांसजेंडर को एक स्वायत्त व्यक्ति के रूप में स्वीकार नहीं करता. इस विधेयक के अनुसार जो व्यक्ति हिजड़ा, जोगती, अरावनी और किन्नर जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक पंथों से जुड़ा होगा उसे ही ट्रांसजेंडर माना जाएगा. इस बिल का संदेश साफ है कि जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति अपने परिवार के साथ रह रहा है, उसके लिए ट्रांसजेंडर पहचान की मान्यता प्राप्त करना मुश्किल होगा.
लेकिन ट्रांसजेंडर जब तक अपने परिवार के साथ नहीं रहेंगे उन्हें शिक्षा नहीं प्राप्त होगी. इसके परिणामस्वरूप उन्हें नौकरी और गरिमामय जीवन में अड़चन आएगी. वैसे भी मात्र तीन प्रतिशत ट्रांसजेंडर अपने परिवार के साथ रहते हैं. तो क्या इस विधेयक के निर्माता चाहते हैं कि ट्रांसजेंडर सिर्फ हिजड़ा, किन्नर, अरवानी और जोगती बन कर हमारे लिए सांस्कृतिक और बधाई रस्म को पूर्ण करते रहें.
हम अक्सर गर्व से कहते हैं कि हमारे धर्म और संस्कृति में उभयलिंगता, क्लीबत्व और तृतीय प्रकृति को उच्च दर्जा प्राप्त है. हम शिव के अर्धनारीश्वर रूप, विष्णु के मोहिनी रूप, महाभारत के शिखंडी और वृहन्नला जैसे उभयलिंगी रूपों को, भारतीय संस्कृति में ट्रांसजेंडर की स्वीकार्यता के प्रमाण के तौर पर पेश करते हैं. लेकिन धर्म और संस्कृति से इतर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए कितनी जगह हमने प्रदान किया है? क्या ट्रांसजेंडर का काम सिर्फ सांस्कृतिक रस्म निभाना भर है? क्या हम उनकी पहचान को सिर्फ नृत्य और सांस्कृतिक प्रदर्शन के वाहक में सीमित रखना चाहते हैं.
असल सवाल तो यह है कि ट्रांसजेंडर समुदाय को परिवार संस्था में आत्मसात कर, उन्हें शिक्षा और सामाजिक गरिमा से लैस कर, देश के विभिन्न संस्थानों में प्रतिनिधत्व कैसे दिया जाए. क्या ट्रांसजेंडर हमारे लिए सांस्कृतिक और धार्मिक रूपक बन कर ही सदा रहेंगे? हम ट्रांसजेंडर को एक मनुष्य और नागरिक के तौर पर कब स्वीकारेंगे?
वर्तमान ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक, मेडिकल बोर्ड और नौकरशाही को असीमिति शक्ति प्रदान करता है. लेकिन कितने मुख्य चिकित्सा अधिकारी और जिलाधिकारी ऐसे होंगे जिनके पास ट्रांसजेंडर को समझने की वस्तुनिष्ठ क्षमता, कुशलता और संवेदनशीलता होगी? उदाहरण के लिए, कितने चिकित्सा अधिकारी,और नौकरशाह ऐसे होंगे जो ट्रांसविमेन, ट्रांसमेन और इंटरसेक्स के बीच लैंगिक भिन्नता को बता पाएंगे? इसलिए उचित तो ये होता कि पहले इन अधिकारियों को ट्रांसजेंडर लैंगिकता के विषय में प्रशिक्षण दिया जाता.
यह विधेयक ट्रांसजेंडर समुदाय की समूची प्रगति को पीछे धकेल देगा. 2014 के नालसा फैसले और 2019 के ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम के परिणामस्वरूप ट्रांसजेंडर समुदाय को काफी आत्मविश्वास और भरोसा अर्जित हुआ था. इसका असर हम ट्रांसजेंडर की बढ़ती सार्वजनिक उपस्थिति के रूप में महसूस कर सकते थे. जैसे, पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों ट्रांसजेंडरों ने पॉडकास्ट, रियलिटी शो और विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म पर आकर बेधड़क अपनी कहानियां रखीं.
ये कहानियां काफी सशक्त और मार्मिक ढंग से ट्रांसजेंडर जीवन और उनकी अनुभूति के अनछुए पहलुओं को व्यापक समाज के समक्ष रखती हैं. इन कहानियों में ट्रांसजेंडर को ट्रांसजेंडर की नज़र से देखने का आग्रह है. इन कहानियों ने हमारे समाज और परिवार के भीतर ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर एक सकारात्मक हलचल पैदा किया. तथ्य और आंकड़ों के जरिए पैदा हुआ सत्य महत्वपूर्ण होता. लेकिन कहानी से पैदा हुआ सत्य ज्यादा मर्मस्पर्शी और प्रभावी होता है, इसलिए ट्रांसजेंड समुदाय ने अपने उत्थान के लिए अपनी कहानी कहना आरम्भ किया.
इन कहानियों का असर यह हुआ कि छोटी जगहों पर भी ट्रांसजेंडर खुल कर अपनी मूल पहचान को प्रकट करने लगे. मैंने पूर्वी उत्तरप्रदेश में नालसा जजमेंट के पश्चात ट्रांसजेंडर समुदाय की दृश्यमानता में बेतहाशा वृद्धि देखा है. पहले वहां के ट्रांसजेंडर अक्सर बॉम्बे ,कलकत्ता या अन्य बड़े शहरों में पलायन कर जाते थे. उनके लिए अपने क्षेत्र में अपनी ट्रांसजेंडर पहचान को खुलकर व्यक्त करना मुश्किल था. लेकिन नालसा जजमेंट (2014) और ट्रांसजेंडर विधेयक (2019) के पश्चात अब वे स्थानीय शहरों, कस्बों और छोटे बाजारों में अधिवास करने लगे थे. इन छोटी जगहों पर ट्रांसजेंडर परेड मार्च आरंभ हुए, जो स्थानीय और कस्बाई ट्रांसजेंडरों के आत्मविश्वास और साहस का सूचक है. हम कह सकते हैं कि पिछले कुछ वर्ष, कस्बाई या आंचलिक ट्रांसजेंडरों के उभार का दौर रहा है.
लेकिन इस विधेयक ने सारी प्रगति को सिर के बल खड़ा कर दिया है.
यह मानवीय और संवैधानिक नैतिकता का तकाजा है कि, कोई भी व्यक्ति अपने भीतर जिस जेंडर को महसूस करता है उसे वही जेंडर प्रकट करने का अधिकार प्राप्त हो. जेंडर अभिव्यक्ति का अधिकार, जीवन के अधिकार के समान है. इसलिए लिए इस विधेयक का वापस होना जरूरी है.
(लेखक जेएनयू में शोधार्थी हैं.)
