आशा भोसले: इस पल के आगे की हर शय फ़साना है…

स्मृति शेष: आशा भोसले एक ऐसे दौर की उपज रहीं, जहां शास्त्रीयता के लिए आवाजाही थी, प्रयोगों के लिए खुला आसमान था, मैलोडी युक्त प्रणय गीतों के लिए उतनी ही सुंदर और शोख़ फिल्में बनाई जा रही थीं. उनके जाने से एक बड़ी रिक्तता तो आई है, मगर उनकी आवाज़ का वज़न हमेशा मौजूद रहेगा.

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हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में आशा भोसले की आवाज़ की गमक बची रहेगी, जो हर दिन संगीत के क्षेत्र में शैली, शिल्प और तकनीकी बदलाव के बाद और भी अधिक प्रासंगिक होती जाएगी. (फोटो: पीटीआई)

उनकी आवाज़ ऐसे समय की नवोन्मेष से भरी हुई पुकार थी, जिसने पिछली सदी के साठ से लेकर नब्बे के दशक को अपनी शोखी और बांकपन के सहारे थामा हुआ था. एक प्रकार की आधुनिकता के वरण जैसा मामला, जिसे युवाओं ने ख़ुद के लिए स्वायत्त किया था. मंगेशकर घराने में होकर भी, उससे विचलन का मामला, जिसे शास्त्रीय संगीत के कुल में घरानेदारी से अलगाव मानते हुए प्रयोगों वाली जिद समझा जाता है. इसी ने, आशा भोसले को अलग-सा बाना भी दिया.

लता मंगेशकर की शुद्ध सात्विक स्वर संगति से अलग, खिलखिलाती हुई जद्दोजहद, उन्मुक्तता को सुरीलेपन से सजाने का खेल…

कंपन और दोलन को संतुलित ढंग से साधने की कोशिश, जिसे व्याकरण में कण, तान, पलटे, खटका और मुरकी के सहोदर में विकसित किया जाता है. याद करें उन गानों को जिनमें कानाफूसी सी शरारत, बच्चों की चमकती आंखों-सी तलब और युवाओं का मदमस्त उत्साह शामिल रहा- ‘रात अकेली है’ (ज्वेलथीफ), ‘कर ले प्यार कर ले के दिन हैं यही’ (तलाश), ‘दईया ये मैं कहां आ फंसी’ ( कारवां), ‘हुस्न के लाखों रंग’ (जॉनी मेरा नाम), ‘हाय बिछुआ डस गयो रे’ (झील के उस पार), ‘ओ मिस्टर बैंजो इशारा तो समझो’ (हम सब चोर हैं)… इतनी नायाब, लीक से हटी हुई और प्रयोगों से भरी धुनों पर बाकमाल गायिकी, जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है.

उनको मालूम था कि सफलता तो एक बार किसी गीत के हिट होने से मिल सकती है, मगर शीर्ष के पास जाकर सालों-साल ठहरना, एक मुश्किल काम है. फिर भी उन्होंने इसे कर दिखाया.

सारी दुविधाओं को परे धरकर, अपनी शर्तों और अपनी शैली में संगीत के एक नए आकाश का सृजन… जैसे लता और आशा मिलकर दो दुनियाएं, दो आकाशगंगाएं, दो अलग धरती संगीत में रच रही हों. उनके खाते में दर्ज ढेरों गीतों से उस मेयार को समझा जा सकता है, जो आशा जी की फिल्म संगीत को देन है. यहां कुछ कम प्रचलित गीतों का स्मरण कर रहा हूं, जो आशा भोसले मुहावरा बनाते हैं- ‘हम तेरे बिन जी न सकेंगे सनम’ (ठाकुर जरनैल सिंह), ‘मेरे मन के मानसरोवर में’ (भगवान परशुराम), ‘बैठे हैं रहगुज़र पर दिल का दिया जलाए’ (चालीस दिन), ‘फुर्र उड़ चला हवाओं के संग जाने किधर’ (तेरे मेरे सपने), ‘बांसुरी तिहारी नंदलाल’ (साजन), ‘बेकसी हद से जब गुजर जाए’ (कल्पना), ‘होने लगी है रात जवां’ (नैना), ‘अम्बर की इक पाक सुराही’ (कादम्बरी), ये फ़ेहरिस्त बढ़ती चली जाएगी, मगर आशा भोसले की आवाज़ का नवाचारी स्वरूप फिर भी बचा रहेगा.

संगीतकारों का साथ और प्रयोगधर्मिता

उनके बनने में सभी दिग्गज संगीतकारों का योगदान रहा, मगर जिन लोगों ने आशा जी के हुनर को अलग ही तराश दिया, उनमें ओपी नैय्यर, रवि, जयदेव, आरडी बर्मन और ख़य्याम के नाम प्रमुखता से उभरते हैं. जयदेव तो उनको एक मुश्किल राह पर ले जाते हुए ग़ैर फिल्मी गीतों की तरफ मोड़ पाए, जिनमें जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा के गीतों, कविताओं का गायन एक सधी हुई पार्श्वगायिका से धीर, मंथर प्रवाह में सुनना चकित करता रहा.

नैय्यर ने उनका करिअर खड़ा किया, तो पंचम उसमें आधुनिक संस्पर्श लेकर आए. रवि के लिए कोमल भावनाओं को ‘मिनिमिलिस्ट’ टोन में गाने की उनकी जिम्मेदारी देखते ही बनती है. ख़य्याम तो इतने प्रयोगधर्मी हुए कि ‘उमराव जान’ के लिए बेस वॉयस पाने के फेर में उनकी सुरपट्टी से डेढ़ सुर नीचे उतारकर पार्श्वगायन कराया.

रवि के संदर्भ में अलग से रेखांकित करने वाला एक तथ्य यह भी है कि उन्होंने लता मंगेशकर के मुक़ाबले आशा भोसले के लिए ज़्यादा ख़ूबसूरत ढंग से तर्ज़ें बनाईं. आशा भोसले के गीतों की विरासत में हमेशा ओपी नैय्यर एवं आरडी बर्मन का नाम लिया जाता है, मगर जल्दी से रवि के योगदान की चर्चा नहीं होती. आशा जी की विविधतापूर्ण सांगीतिक धरातल का मूल्यांकन रवि की इन श्रेष्ठतम धुनों से कर सकते हैं, जो उनके संगीतकार व्यक्तित्व का एक अलग कोमल पक्ष व्यक्त करती हैं. इसने भी दूसरे ढंग से आशा भोसले का सांगीतिक वृत्त रचा है, जो कहीं पंचम और नैय्यर के बीच उतने ही दमसाज ढंग से उपस्थित है.

आप भी इन गीतों को गुनगुनाना चाहेंगे- ‘चन्दा मामा दूर के’ (वचन), ‘तुम संग लागी बलम मोरी अंखियां’ (अलबेली) ‘इस तरह तोड़ा मेरा दिल’ (शहनाई), ‘सितारों आज तो हम भी तुम्हारे साथ’ (राखी), ‘तोरा मन दरपन कहलाए’, ‘मेरे भइया मेरे चन्दा मेरे अनमोल रतन’ (काजल), ‘दिल की कहानी रंग लाई है’ (चौदहवीं का चांद), ‘कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी’, ‘चेहरे पे ख़ुशी छा जाती है’, ‘आगे भी जाने न तू’ (वक्त), ‘शीशे से पी या पैमाने से पी’ (फूल और पत्थर), ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ (ये रास्ते हैं प्यार के), ‘मत जइयो नौकरिया छोड़ के’, ‘जब चली ठण्डी हवा’ (दो बदन), ‘सैयां ले गई जिया तेरी पहली नज़र’ (एक फूल दो माली), ‘ग़रीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा’ (दस लाख), ‘ये तोहफ़ा तुम्हारे प्यार का’ (नई रोशनी), ‘हमें तुमसे मुहब्बत है’ (औरत), ‘तुमने आंखों से पी हो तो’ (नर्तकी) एवं ‘ज़िन्दगी इत्तेफ़ाक़ है’ (आदमी और इन्सान).

इसी समय जयदेव भी याद आते हैं, जिनके यहां आशा भोसले का वह रूप उभरा, जो लोक संगीत, राग रागिनियों और एक ख़ास क़िस्म की शास्त्रीय आवाजाही का पुट लिए हुए था. जयदेव ने उनके लिए ग़ैर फिल्मी गीतों के अलावा फिल्मों में भी कुछ महान प्रयोग किए, जिनके कुछ गीत याद करने चाहिए. ख़ासकर- ‘सुख और दुख के रास्ते’ (हम दोनों), ‘नदी नारे न जाओ श्याम’ (मुझे जीने दो), ‘जा री पवनिया पिया के देस जा’ (रेश्मा और शेरा), ‘मिलन कैसे होए री’ (आन्दोलन), ‘मेरे हाथों में लगे तो रंग लाल’ (तुम्हारे लिए), ‘मुझको भी राधा बना ले नन्दलाल’ (अनकही) जैसे बेहतरीन गाने, जिन्होंने उस अर्थ में आशा जी को पार्श्वगायन का एक अलग ही मुकाम दिया, जिस तरह उनके शुरुआती दौर में उन्हें स्वयं नौशाद ने ‘अमर’ और ‘कोहिनूर’, एसडी बर्मन ने ‘सुजाता’ और ‘बंदिनी’ और ‘लाजवन्ती’, मदन मोहन ने ‘वो कौन थी’ और ‘मेरा साया’ और शंकर जयकिशन ने ‘श्री 420’, ‘शिकार’ और ‘तीसरी क़सम’ में मौके दिए थे.

इन्हीं सबके बीच न जाने कितने गाने उन्होंने एसडी बर्मन, सलिल चौधरी, मदन मोहन, रोशन, चित्रगुप्त, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनन्दजी के अलावा एआर रहमान, अन्नू मलिक, बप्पी लाहिड़ी, शंकर-एहसान-लॉय और विशाल भारद्वाज के लिए गाए होंगे, जिन्हें एक स्मृति लेख में समेट पाना मुश्किल भरा काम है.

स्मरण के लिए हम नुमाइन्दगी के तौर पर मदन मोहन का ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में’ (मेरा साया), एसडी बर्मन के गीतों में ‘नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर’ (काला पानी), शंकर जयकिशन के लिए ‘पान खाए सैंया हमारो’ (तीसरी क़सम), सलिल चौधरी के लिए ‘बाग में कली खिली’ (चन्दा और सूरज), रोशन के लिए ‘निगाहें मिलाने को जी चाहता है’ (दिल ही तो है) और कल्याणजी-आनन्दजी के लिए ‘ये मेरा दिल यार का दीवाना’ (डॉन) हमेशा ही अमर रह जाने वाली गीतों की बानगियां हैं.

पंचम और आशा की संगत

आशा भोसले और आरडी बर्मन का युग एक कभी न भूला जाने वाले अध्याय है, जो हिंदी सिनेमा में उसी तरह समादृत रहेगा, जिस तरह लता मंगेशकर के साथ मदन मोहन और एसडी बर्मन का संगीत, नूरजहां और शमशाद बेगम के साथ नौशाद तथा किशोर कुमार के साथ आरडी बर्मन का युग याद किया जाता है.

आरडी बर्मन की गंभीर और क्रान्तिकारी संगीत के तत्त्वों को समझने के विमर्श में सिर्फ़ उनके ऑर्केस्ट्रेशन के महानतम लोगों केसी लॉर्ड, मनोहरी सिंह, जरीन दारुवाला, बासु चक्रवर्ती, ब्रजेन विश्वास, टोनी वॉज़ या दिलीप नायक को ही याद नहीं किया जाएगा, बल्कि आशा जी वहां प्रमुखता से मौजूद मिलेंगी. उनकी जुगलबन्दी के गीतों को याद करने से बेहतर है, उस पूरे दौर को ध्यान में रखा जाए, जहां ‘तीसरी मंज़िल’ से लेकर ‘कारवां’, ‘मेरे जीवन साथी’, ‘मनोरंजन’, ‘अनामिका’, ‘झील के उस पार’, ‘अपना देश’, ‘चरित्रहीन’, ‘शालीमार’, ‘द ग्रेट गैम्बलर’, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’, ‘खेल-खेल में’, ‘अंगूर’, ‘ख़ूबसूरत’, ‘नमकीन’, ‘खुशबू’ और ‘इजाज़त’ जैसी फिल्में शामिल हैं.

पंचम और आशा के लीक से हटे हुए कुछ गाने हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी थाती के रूप में शुमार हैं. ‘तीसरी मंज़िल’ के ‘ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली’ के अलावा ‘दम मारो दम’ (हरे रामा हरे कृष्णा), ‘आओ न गले लगा लो ना’ (मेरे जीवन साथी), ‘चोरी-चोरी सोलह सिंगार करूंगी’ (मनोरंजन), ‘लोगों न मारो इसे’ (अनामिका), ‘जब तक रहे तन में जिया’ (समाधि), ‘दो लफ़्ज़ों की है दिल की कहानी’ (द ग्रेट गैम्बलर), ‘रोज-रोज डाली-डाली’ (अंगूर), ‘तेरी मेरी यारी बड़ी पुरानी’ (चरित्रहीन), ‘पिया तू अब तो आ जा’ (कारवां), ‘पिया बावरी’ (खूबसूरत), ‘मेरा कुछ सामान’ (इजाज़त) कहां तक आशा जी के योगदान को याद किया जाए?

सब कुछ शानदार, समय के सरगम को आलाप वृत्त से बाहर खींचता हुआ और रूहानी ढंग से भीतर जज़्ब होता हुआ, जैसे सावन की पहली बारिश में मिट्टी पर पड़ी हुई फुहार सोंधी गमक से भर जाती है.

दरअसल आशा भोसले एक ऐसे दौर की उपज रही हैं, जहां शास्त्रीयता के लिए आवाजाही थी, प्रयोगों के लिए खुला आसमान पसरा था, मैलोडी युक्त प्रणय गीतों के लिए उतनी ही सुंदर और शोख़ फिल्में बनाई जा रही थीं और इन सबसे बढ़कर मुख्य नायिका वाली फिल्मों में सह-नायिका के लिए स्पेस होता था, जहां हेलेन, मुमताज़, शशिकला, बिन्दु, पद्मा खन्ना, फरीदा जलाल जैसी अभिनेत्रियों के लिए कुछ बेहद भावप्रवण लीक से हटे गीत आशा जी गा रही थीं.

आज उनके जाने से एक बड़ी रिक्तता तो आई है, मगर उनकी आवाज़ का वज़न हमेशा मौजूद रहेगा, जिस तरह एक इत्र की शीशी खुलकर बिखर जाने के बाद भी अपने भीतर बरसों तक उस सुगंध को बसाए रखती है, जो कभी उसमें मौजूद थी.

हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में भी यही होगा कि भविष्य में आशा भोसले की आवाज़ की गमक बची रहेगी, जो हर दिन संगीत के क्षेत्र में शैली, शिल्प और तकनीकी बदलाव के बाद और भी अधिक प्रासंगिक होती जाएगी. आशा जी का जाना, उस आवाज़ का थमना है…. जिनके गीतों पर पिछले सत्तर सालों से आज तक नई पीढ़ी थिरकती रही है, बिना थके, बिना रुके, बिना थमे…. ‘हम दोनों’ के गीत का उनका वर्जन सहसा याद आता है- ‘अगर मैं रुक गई अभी, तो जा न पाऊंगी कभी, यही कहोगे तुम सदा कि दिल अभी नहीं भरा…’

(लेखक संगीत, सिनेमा और संस्कृति के अध्येता हैं.)