भारतीय राजनीति में स्त्री के साथ सबसे पुराना छल यह नहीं है कि उसे राज्यसभा, लोकसभा, विधानसभा के भीतर या अन्य मंचों पर पुरुषों जैसी गरिमा और उन जैसे अनुपात में नहीं बुलाया गया; उससे भी सूक्ष्म छल यह है कि उसे बुलाया तो गया, पर शर्त यह रखी गई कि वह दीए की तरह टिमटिमाती रहे, सूरज न बने; प्रतीक बनी रहे, ध्रुव न बने और आरती की लौ तो रहे, लेकिन अग्निकुंड न बने.
हमारे यहां स्त्री का महिमामंडन अक्सर उसके अधिकारों से बहुत पहले पहुंच जाता है. उसे देवी कहने की आतुरता उसे निर्णयकारी मनुष्य मान लेने की नैतिक परिपक्वता से तेज़ निकल जाती है. यही कारण है कि ‘नारी शक्ति’ का उद्घोष इस देश की सार्वजनिक वाक्पटुता में जितना ऊंचा है, उतना ही संकोची उसका व्यवहार है, जब वही नारी सचमुच शक्ति बनकर सामने खड़ी हो जाए; अपना कद लेकर, अपना अहं लेकर, अपना प्रशासनिक दिमाग लेकर, अपनी स्वतंत्र वफादारियां लेकर और अपना जनाधार लेकर.
यहीं भाजपा का विलोम सबसे तीखे रंग में दिखाई देता है. वह ‘नारी शक्ति वंदन’ की भाषा बोलती है, स्त्री-सशक्तिकरण को अपने नैतिक अभियान की तरह प्रस्तुत करती है और महिला आरक्षण पर विपक्ष को कठघरे में खड़ा करती है; लेकिन इसी कथा के भीतर एक दूसरी और इससे कहीं अधिक बेचैन करने वाली कथा भी चलती रहती है.
वह अकथ कथा, जिसमें पार्टी स्त्री को शक्ति के रूप में नहीं, नियंत्रित शक्ति के रूप में पसंद करती है. यानी वह शक्ति, जो पार्टी की केंद्रीय धुरी के चारों ओर परिक्रमा करे; वह नहीं, जो निर्णायक धुरी स्वयं बन जाए.
त्याग है, ‘शक्ति’ है, बस संप्रभुता नहीं
महिला आरक्षण की कहानी ही इस विडंबना का पहला पाठ है. 2023 के नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने लोकसभा और विधानसभा में एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान तो किया, लेकिन उसे उस जनगणना के प्रकाशन और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ा, जो अधिनियम के बाद हो. पीआरएस ने भी यही दर्ज किया था.
फिर 2026 के प्रस्तावित 131वें संविधान संशोधन विधेयक के कारण पत्र ने साफ़ लिखा कि अगली जनगणना और उसके बाद का परिसीमन ‘काफ़ी समय’ लेगा, जिससे महिलाओं की प्रभावी भागीदारी में देर होगी; उधर गृह मंत्री ने संसद में यह भी कहा कि मूल अधिनियम के तहत आरक्षण 2026 के बाद की जनगणना और परिसीमन में सुनिश्चित होगा और विपक्ष पर इस विषय में अड़चन खड़ी करने का आरोप लगाया. अर्थात् राजनीतिक भाषण में दोष बाहर का है, पर विधिक स्थापत्य में विलंब भीतर से निर्मित है.
समाजशास्त्रीय भाषा में कहें या उस नज़रिए से देखें, तो यह पितृसत्ता का क्लासिक व्यवहार है. पितृसत्ता स्त्री से घृणा नहीं करती; वह उससे कहीं अधिक जटिल काम करती है. वह स्त्री के चारों ओर एक प्रशंसात्मक पिंजरा बनाती है. उसमें फूल हैं, अलंकार हैं, मिथक हैं, मातृत्व है, संस्कृति है, राष्ट्र है, त्याग है, ‘शक्ति’ है. बस संप्रभुता नहीं है.
स्त्री को पूजा जा सकता है, बशर्ते वह शासन की भाषा अपने होंठों से नहीं, किसी और की लिपि को पढ़कर बोले. उसे सिंहासन के पास रखा जा सकता है, बशर्ते वह सिंहासन की वैध उत्तराधिकारी न बन बैठे. यही वह महीन और त्वचा के नीचे तक उतर जाने वाली राजनीति है, जिसमें वंदन और वंचना एक ही वाक्य में साथ रहते हैं.
कई हैं उदाहरण
इस मामले में राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का उदाहरण इसलिए इतना महत्त्वपूर्ण है कि वह केवल एक महिला नेता नहीं हैं; वह एक सशक्त, निडर और निर्णायक राजनीतिक केंद्र थीं. राजस्थान की वे ‘पहली और अब तक की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री’ थीं. उनकी राजनीतिक परवरिश विजयराजे सिंधिया जैसी नेता की विरासत में हुई, जिन्हें आपातकाल के दौरान गिरफ़्तार कर जेल में रखा गया था.
इस पृष्ठभूमि ने वसुंधरा राजे को केवल कुलीन सामाजिक पहचान नहीं दी; उसने उन्हें संघर्ष, वैचारिक स्मृति और संगठनात्मक स्वाभिमान की एक अलग मुद्रा भी दी. राजस्थान के चुनावी इतिहास में उनका कद आकस्मिक नहीं है. 2003 में उनके नेतृत्व में भाजपा 120 सीटें जीतकर सत्ता में आई थी. उन्होंने कांग्रेस के बेहद लोकप्रिय और लोककल्याणकारी मुख्यमंत्री की छवि बना चुके अशोक गहलोत जैसे ज़मीनी नेता वाली सरकार को ऐसे समय अप्रत्याशित रूप से उखाड़ा था, जिन्होंने सूखे और अकाल के उस भयावह दौर में जन-जन के बीच नभस्पर्शी छवि बना ली थी.
वसुंधरा राजे की सरकार बनी तो अभी एक ही साल नहीं हुआ था कि संघनिष्ठ नेताओं और उनके बीच ठन गई. उनकी सरकार चली गई. लेकिन 2013 में उसी वसुंधरा राजे ने प्रदेश भर की धुआंधार यात्राएं कीं और भाजपा ने जहां 200 में से 163 सीटें जीतीं, कांग्रेस महज 21 सीटों के शर्मनाक आंकड़े पर जा टिकी.
यह राजस्थान की राजनीति में किसी एक नेता की निर्णायक पकड़ का असाधारण क्षण था. इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि वसुंधरा राजे केवल भाजपा की नेता नहीं रहीं; वे एक समय राजस्थान में भाजपा की राजनीतिक देह भी थीं और उसकी वैचारिक भाषा भी. उसकी चाल, उसका आत्मविश्वास, उसका शक्ति-प्रदर्शन सब कुछ अलग था.
और शायद यही समस्या भी थी.
दलों को शक्तिशाली स्त्रियां अक्सर तब तक प्रिय लगती हैं, जब तक वे पार्टी की कुल कथा को गौरवान्वित करती रहें; लेकिन जैसे ही वे स्वयं कथा का केंद्रीय पात्र बनने लगती हैं, बेचैनी शुरू हो जाती है. वसुंधरा का अपराध यही था कि वे नियुक्त शक्ति नहीं, अर्जित शक्ति थीं. उनके पास पद से अधिक व्यक्तित्व था; संगठनात्मक मुहर से अधिक निजी जनाधार था और इसीलिए मोदी-उत्तर भाजपा की केंद्रीयकरण-प्रधान राजनीति में वे सहज नहीं बैठती थीं.
2023 के बाद राजस्थान में भाजपा ने भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री चुनकर एक ‘सरप्राइज़ पिक’ दिया और 2025 में मीडिया के कुछ हिस्सों ने राजे की वापसी-संबंधी अटकलों के बीच उन्हें लगभग ‘एक्साइल’ से बाहर आती नेता की तरह वर्णित किया. यह केवल व्यक्ति की उपेक्षा नहीं थी; यह संघीय-कद वाली क्षेत्रीय स्त्री-शक्ति पर केंद्रीय सत्ता की असहजता का लक्षण भी था.
यह भी महत्त्वपूर्ण है कि वसुंधरा के साथ तनाव कोई अचानक जन्मी घटना नहीं था. उनके शासनकाल के दौरान राजस्थान भाजपा में अंतर्कलह और समानांतर शक्ति-केंद्रों की खबरें बार-बार सामने आती रहीं. उस समय के प्रमुख संघनिष्ठ नेता ललित किशोर चतुर्वेदी, अभी पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया, राज्यसभा सदस्य घनश्याम तिवाड़ी, शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के संघनिष्ठ खेमे और तत्कालीन सीएम वसुंधरा राजे के बीच टकराव इतना खुला था कि वह हर दिन सुर्खियां बटोरता था.
2023 तक भी ‘राजस्थान में वसुंधरा’ जैसे नारों के साथ उनके समर्थकों का अलग शक्ति-प्रदर्शन और प्रतिद्वंद्वी गुटों की समानांतर सक्रियता दिखती रही. यानी समस्या केवल एक नेता की नहीं थी; समस्या यह थी कि एक महिला नेता ने दल के भीतर अपना स्वतंत्र अक्ष बना लिया था. पुरुष नेताओं के मामले में इसे ‘मास बेस’ कहा जाता है; स्त्रियों के मामले में वही चीज़ अक्सर ‘समस्या’ बन जाती है.
मध्य प्रदेश की पूर्व सीएम उमा भारती का प्रसंग तो और भी दिलचस्प है. वे राम जन्मभूमि आंदोलन की अग्रिम पंक्ति के चेहरों में थीं. उन्होंने 2003 में मध्य प्रदेश में भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया; लेकिन बाद के वर्षों में वही उमा भारती पार्टी की मुख्यधारा से धीरे-धीरे दूर होती चली गईं. वे इतना अधिक हाशिए पर धकेल दी गईं कि 2023 के विधानसभा चुनावों तथा 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान वे मध्य प्रदेश भाजपा के स्टार प्रचारक सूची तक से बाहर रहीं.
गुजरात की पूर्व सीएम आनंदीबेन पटेल का मामला थोड़ा अलग प्रतीत होता है, पर अर्थ वही है. वे 22 मई 2014 से 7 अगस्त 2016 तक गुजरात की मुख्यमंत्री रहीं. अभी उत्तर प्रदेश की राज्यपाल के रूप में वे पश्चिम बंगाल, केरल या जम्मू कश्मीर के राज्यपालों की तरह शायद ही कभी चर्चा में आती हों.
राजनीतिक अर्थ में यह परिवर्तन हमें बताता है कि कभी-कभी स्त्री-नेतृत्व को निर्वाचित, संघर्षशील, जनादेश-आधारित शक्ति से हटाकर संवैधानिक, मर्यादित, प्रतीकात्मक गरिमा के दायरे में स्थानांतरित कर दिया जाता है. संभवत: इसे ‘हाशिए’ का शब्दशः प्रमाण नहीं माना जाए, इसका ऐसा आभास एक युक्तिसंगत राजनीतिक निष्कर्ष है.
सियासी हमाम में सब नंगे?
लेकिन क्या महिलाओं के ऐसे मामलों में सिर्फ़ भाजपा अकेली दोषी है? लगभग सारी भारतीय राजनीतिक पार्टियां स्त्री के साथ किसी-न-किसी रूप में यही करती रही हैं. सीपीआई और सीपीएम के महासचिव पद पर आज तक शायद ही कोई महिला पहुंची हो, जबकि उसके पास एक से एक बेहतरीन और पुरुषों से इक्कीस महिला नेता रही हैं.
और इस मामले में समाजवादी दलों का रिकॉर्ड तो बहुत ही ख़राब है; हालांकि कांग्रेस का इतिहास भी कोई बहुत अच्छा नहीं है. लेकिन भाजपा का मामला इसलिए अधिक तीखा हो जाता है कि उसकी सार्वजनिक शब्दावली स्त्री को लेकर अत्यंत अलंकृत है.
मां, शक्ति, संस्कृति, राष्ट्र, देवी, वंदन जैसे शब्द हर भाजपा नेता के भाषणों में प्राय: रहते हैं. जब कोई दल स्त्री के सम्मान को अपने नैतिक स्वत्व का केंद्रीय हिस्सा बना ले, तब उसके भीतर शक्तिशाली स्त्री-नेताओं के साथ होने वाला व्यवहार केवल संगठनात्मक निर्णय नहीं रह जाता; वह वैचारिक परीक्षा बन जाता है.
भाजपा इस परीक्षा में बार-बार एक अजीब बेचैनी के साथ पकड़ी जाती है. उसे स्त्री का तेज चाहिए, पर उसकी स्वतंत्र लौ नहीं; उसे स्त्री का आशीर्वाद चाहिए, पर उसकी स्वायत्त महत्वाकांक्षा नहीं; उसे स्त्री का चेहरा चाहिए, पर उसकी अपनी दर्प से उठी सतेज आंख नहीं.
क्या नारी शक्ति महज़ आरक्षण का प्रतिशत है?
नारी-शक्ति का असली अर्थ क्या है? क्या वह केवल आरक्षण का प्रतिशत है? क्या वह प्रचार-पंक्ति है? क्या वह चुनावी मंच पर कुछ स्तुतियां और कुछ योजनाएं हैं? क्या वह राष्ट्र के नाम संबोधन है? या फिर उसका अर्थ यह भी है कि दल अपनी सबसे प्रभावशाली महिला नेताओं के साथ वैसा ही व्यवहार करे, जैसा वह प्रभावशाली पुरुष नेताओं के साथ करता है. उनकी असहमति को गद्दारी न माने, उनके जनाधार को खतरा न समझे और उनकी स्वतंत्रता को अनुशासनहीनता न माने?
लोकतंत्र में शक्ति का सम्मान तभी सिद्ध होता है, जब आप उस शक्ति को अपने समानांतर खड़ा सह सकें. जो स्त्री केवल आपकी बगल में सुशोभित हो, वह सशक्त नहीं; जिसे आप अपने सामने बैठाकर बातचीत कर सकें, वही सशक्त है.
इसलिए भाजपा की विडंबना केवल यह नहीं कि उसने कुछ महिला नेताओं को किनारे किया; उसकी बड़ी विडंबना यह है कि उसने स्त्री को एक ऊंचे, उजले, लगभग कामनात्मक-भव्य रूपक में तो प्रतिष्ठित किया, पर जब वही स्त्री राजनीति की मिट्टी, पसीने, आदेश, निर्णय, दांव, संगठन और सत्ता की वास्तविक देह में प्रकट हुई तो उसे लेकर संशयग्रस्त हो गई.
यह वही पुरानी पुरुष-सत्ता है, जो स्त्री के माथे पर चंदन लगाती है, पर उसके हस्ताक्षर से डरती है; जो उसकी आंखों की ज्वाला पर कविता लिखती है, पर उसकी स्वतंत्र अग्नि से अपने कक्ष का तापमान बिगड़ता देख घबरा जाती है. भारतीय पुरुष किसी संघर्ष में पराजय का सामना करता है तो वह स्त्री के हाथ में तलवार देखने का नहीं, उसे सती होते देखने का अभ्यस्त रहा है.
भारतीय लोकतंत्र को अब ‘नारी वंदन’ से आगे बढ़ना होगा. वंदन में हमेशा एक ऊंच-नीच छिपी रहती है. कोई ऊपर है, कोई नीचे, कोई हाथ जोड़ रहा है, कोई पूजित है. लोकतंत्र का संबंध वंदन से नहीं, सहभागिता से है; समर्पण से नहीं, समता से है. स्त्री को देवी कहने से पहले उसे प्रतिद्वंद्वी, साझेदार, निर्णयकर्ता और सत्ता-केंद्र मानना सीखना होगा. जो दल यह नहीं सीखते, वे अंततः स्त्री का नहीं, अपनी ही भाषा का अपमान करते हैं.
भाजपा की कथा में यही सबसे गहरा विलोम है. वह नारी-शक्ति का स्तोत्र पढ़ती है, पर नारी-शक्ति की स्वतंत्र धड़कन से अब भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं है. और जब तक यह आश्वस्ति नहीं आती, ‘वंदन’ एक सुंदर शब्द रहेगा; पर अधूरा, संशयी और भीतर से कुछ-कुछ भयभीत. वैसे ही जैसे भारतीय मीडिया में महिलाओं के पक्ष में बहुत कुछ कहा जाता है; लेकिन निर्णायक पदों पर पुरुष सत्ता ही बनी रहती है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
