नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम टिप्पणी में कहा है कि पुलिस का काम अपराधों की जांच करना है, न कि स्वेच्छा से शादी करने वाले जोड़ों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर, उनका पीछा करना. ऐसा करके पुलिस घोर अन्याय कर रही है.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति बालिग हो जाता है तो किसी को भी यह बताने का अधिकार नहीं है कि वह किसके साथ रहेगा, किससे शादी करेगा या अपना जीवन कैसे बिताएगा.
इस संबंध में जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने पुलिस द्वारा अन्य अपराधों की जांच करने के बजाय सहमति से हुए विवाहों की एफआईआर दर्ज कर, जांच करने की ‘चिंताजनक प्रवृत्ति’ को उजागर करते हुए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को ऐसे मामलों में सुधारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है.
इस साथ ही पीठ ने इस मामले में याचिकाकर्ता दंपति के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया.
दरअसल, सहारनपुर के थाना सदर बाजार में एक पिता ने याची के ख़िलाफ़ उनकी बालिग बेटी का अपहरण करने और विवाह के लिए मजबूर करने के आरोप में मामला दर्ज करवाया था. हालांकि, लड़की का कहना था कि उन्होंने अपनी मर्जी से शादी की है. पिता द्वारा लड़के के ख़िलाफ़ बीएनएस की धारा 87 के तहत दर्ज की गई एफआईआर को चुनौती देते हुए दंपति ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी.
इस मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अब देश के हर नागरिक को यह संदेश जाना चाहिए कि बालिग होने की उम्र और संवैधानिक संस्कृति का सम्मान किया जाना चाहिए.
मामले के तथ्यों और याचिका के साथ दाखिल उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी विवाह प्रमाण पत्र पर ध्यान देते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि गुमशुदगी की शिकायत के लिए पुलिस को एफआईआर दर्ज नहीं करनी चाहिए थी.
इसके अलावा हाईकोर्ट ने हैरानी जताई कि इस मामले में पुलिस ने न केवल गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया, बल्कि जोड़े को परेशान करना भी शुरू कर दिया. लड़की से बातचीत करने के बाद पीठ ने एफआईआर को ‘दोनों याचिकाकर्ताओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन’ बताया.
पिता और आम जनता को कड़ा संदेश देते हुए न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि संविधान किसी भी वयस्क को, चाहे रिश्ता कोई भी हो, कानून के अनुसार बालिग दूसरे वयस्क की इच्छा पर हावी होने या शासन करने की अनुमति नहीं देता.
वहीं, इस तरह के मामलों में पुलिस की भूमिका पर आपत्ति जताते हुए पीठ ने कड़े शब्दों में कहा, ‘निःसंदेह, नाबालिग बच्चों का मामला अलग है. लेकिन पुलिस इस तरह की एफआईआर दर्ज करके और उससे भी बढ़कर, युवा जोड़े का पीछा करके, कभी-कभी उन्हें जबरन अलग करने और दुल्हन को उसके माता-पिता या परिवार के पास वापस भेजने के गुप्त इरादे से, घोर अन्याय कर रही है. ये सभी कार्य पूरी तरह से अवैध हैं और इनमें से कुछ अपराध हैं.’
आखिर में अदालत ने डीजीपी को ऐसे मामलों में सुधारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश देते हुए एफआईआर रद्द कर दी.
पीठ ने प्रतिवादियों, जिनमें लड़की के पिता भी शामिल हैं, को याचिकाकर्ताओं के वैवाहिक घर में प्रवेश न करने और उनके शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा न डालने का आदेश जारी किया.
