महत्वपूर्ण से अति महत्वपूर्ण होते अमित शाह: भाजपा में मोदी के बाद कौन?

2024 के बाद के घटनाक्रम इस सवाल को जन्म देते हैं कि क्या अमित शाह सिर्फ दूसरे नंबर के नेता हैं, जिन्हें नरेंद्र मोदी अपनी राजनीति मज़बूत करने के लिए आगे कर रहे हैं, या फिर 2029 पर नज़र टिकाए भाजपा, जो 2024 जैसी स्थिति दोबारा नहीं चाहती, किसी उत्तराधिकार योजना पर काम कर रही है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

22 अप्रैल को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण मतदान के ठीक पहले ग्रेटर कोलकाता मेट्रोपॉलिटन एरिया के दक्षिण चौबीस परगना के सोनारपुर दक्षिण विधानसभा में रोड शो करते हुए वहां अमित शाह दिखाई देते हैं, न कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

चुनाव अभियान वाली गाड़ी की छत से हाथ लहराते हुए शाह के रोड शो में सड़क के दोनों तरफ विशाल जनसमूह की कतार दिखाई दे रही थी. उसी दिन सुबह शाह ने एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें वो अपने उन समर्थकों से बात करते दिखाई दे रहे थे, जो बांस की घेराबंदी के पास अपने हाथों में फोन लिए उनकी तस्वीर ले रहे थे.

केंद्र में लगातार तीन बार सरकार बनाने के बावजूद इस राज्य में सत्ता हासिल करने में असफल भाजपा ने इस बार अपना पूरा ज़ोर लगा रखा है. गृह मंत्री उनसे विधानसभा के इस निर्णायक चुनाव में भाजपा को वोट करने को कह रहे थे.

5 अगस्त 2019 को संसद भवन के बाहर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह. (फोटो: पीटीआई/फाइल)

5 अगस्त 2019 के दिन की वो तस्वीर संसदीय इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई, जब संसदीय कार्यवाही शुरू होने के पहले शाह पहली बार गृहमंत्री बनने के महीनों बाद अपने हाथ में प्लास्टिक की एक फाइल और दस्तावेज़ लिए कश्मीर में धारा 370 को समाप्त कर, जम्मू और कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को ख़त्म कर, जम्मू और कश्मीर को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बांटकर चौंकाने वाला क़ानून लागू करने के लिए सदन में प्रवेश कर रहे थे.

यह 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद की बात है, जब भाजपा का कद छोटा होने के साथ मोदी अल्पमत में होने की हालत तक सीमित हो गए, तब शाह का बढ़ता सार्वजनिक कद दिखाई देने लगा है. मोदी के बाद राजनीतिक कद में दूसरे नंबर के नेता के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक स्टार प्रचारक के रूप में भी सरकार की रणनीति के सूत्रधार, और एक नाममात्र के नए (कठपुतली) अध्यक्ष के बावजूद भाजपा संगठन के प्रभारी तौर पर भी.

इन सभी के बीच, मोदी सरकार में शाह की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो सकते हैं. क्या मोदी ने अपनी राजनीतिक पारी को सुदृढ़ करने के लिए शाह को सरकार में बस नंबर दो की हैसियत से काम करने के लिए तैनात किया है, या 2029 के आगामी आम चुनावों पर विशेष तौर पर पैनी नज़र रखते हुए 2024 के लोकसभा चुनावों में हुए नुक़सान या उससे भी कहीं अधिक बुरी संभावना को कम करने की कोशिश में भाजपा उन्हें उत्तराधिकार सौंपने कि तैयारी में लगी हुई है?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर पॉलीटिकल स्टडीज़ की सेवानिवृत प्रोफेसर ज़ोया हसन के अनुसार, ‘भाजपा जो हमेशा ही चुनावी मोड में रहती है, ‘2029 के लिए अपने आप को पुनः समायोजित कर रही है’ विशेषकर तब, जब अंदरूनी चुनौतियां और बाहरी दबाव सामने खड़े हों, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के साथ व्यापारिक मतभेद और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की स्थिति को पेश करने में आती मुश्किलें, विदेश नीति की बाधाएं, पड़ोसी देशों में तनाव से लेकर गाज़ा में होते जनसंहार और ईरान युद्ध को लेकर भारत का रवैया, इन सभी ने मोदी के विश्वगुरु की छवि धूमिल की है.’

प्रोफेसर ज़ोया हसन कहती हैं, ‘हमेशा चुनाव के मोड में रहने वाली भाजपा 2029 के लिए अपने आप को फिर से तैयार कर रही है. चुनावी रणनीति के माहिर अमित शाह एसआईआर, परिसीमन, और एक राष्ट्र एक चुनाव जैसे कई संरचनात्मक परिवर्तन लेकर आ रहे हैं. इसके साथ-साथ वो बहुसंख्यकवादी और देश की सुरक्षा के विषय जैसे मुद्दों पर ज़ोर देने वाले लोक लुभावने दक्षिणपंथी एजेंडा की रूपरेखा तैयार कर उसे आकार देने में लगे हैं, जो पश्चिम बंगाल में चुनाव को घुसपैठिया के मुद्दे के आस पास केंद्रित कर देने में स्पष्ट नज़र आता है.’

‘शाह की भूमिका अब पार्टी में दूसरे नंबर से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण होती जा रही है; राजनीतिक रणनीति बनाने और सरकार की प्राथमिकता तय करने में प्रायः उनकी मुख्य भूमिका नज़र आती है.’

14 अप्रैल 2026 की इस तस्वीर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले गाजोल में एक जनसभा को संबोधित करते हुए. (फोटो: @AmitShah/X via PTI)

शाह का बढ़ता कद

एक प्रमुख राज्य के चुनाव के पूर्व शाह द्वारा इतने व्यापक स्तर के रोड शो को संबोधित करने की जड़ें 2024 में खोजी जा सकती हैं. 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के स्टार प्रचारक के रूप में शाह ने देश भर में 188 रैलियां की, जो मोदी के द्वारा की गई कुल 206 रैलियों के बाद दूसरी सबसे अधिक थी.

2025 के बिहार विधानसभा चुनावों, जिसमें भाजपा पहली बार अकेली सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी, में शाह ने 36 रैलियां की थी, जबकि मोदी ने 15 रैलियों को संबोधित किया था. दो दशकों तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार को पद से हटाने में सफल होने के बाद, वो शाह ही थे जो नीतीश के राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने के दौरान उनके बगल में बैठे नज़र आ रहे थे. चुनाव अभियान के दौरान भी वो शाह ही थे, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से नीतीश कुमार को एनडीए गठबंधन के मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से इनकार कर विवाद खड़ा कर दिया था.

संसद में भी पिछले दो वर्षों के दौरान शाह कई बार सरकार के विवादित विधायी कामकाज के मुख्य संचालक रहे हैं.

दिसंबर में, जब विपक्ष संसद में चुनावी मतदाता सूचियों के विवादित विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर लगातार चर्चा की मांग कर रहा था, तब इस बहस का जवाब देने वाले और ‘ग़ैरकानूनी अप्रवासी’ का हौआ खड़ा करने वाले शाह ही थे, उन्होंने भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की ‘डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट’ नीति कि घोषणा करके इस पूरी प्रक्रिया का बचाव किया, जिसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर हुए ही, साथ ही उनकी नागरिकता पर भी सवालिया निशान लग गए.

अभी पिछले माह ही शाह ने लोकसभा में साफ तौर पर बताया था कि संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, जिसे संसद और राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण ‘लागू’ करने के नाम पर मोदी सरकार की विवादित लोकसभा विस्तार और परिसीमन योजना के तहत पेश किया गया, उसे उन्होंने खुद, गृह मंत्री के तौर पर, आगे बढ़ाया था. यह संविधान संशोधन विधेयक संसद में पास नहीं हुआ था.

इसी तरह वो अमित शाह ही थे जिन्होंने सरकार की तरफ से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का बचाव किया, जो अपने पक्षपातपूर्ण रवैए के लिए विपक्ष के द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रहे थे.

ऑनलाइन आलोचना को लेकर मोदी सरकार की बढ़ती असहनशीलता, विशेषकर, प्रतिकूल भू-राजनीतिक बदलाव के बावजूद ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स, व्यंग्यकारों, कार्टूनिस्टों से लेकर साधारण यूज़र्स तक पर संयुक्त डिजिटल सेंसरशिप व्यवस्था के माध्यम से ज़बरदस्त कार्रवाई हुई, जिसकी जड़ें 2024 में मिलती है, जब अमित शाह के अधीन आने वाले गृह मंत्रालय ने सहयोग पोर्टल की शुरुआत की थी. यह पोर्टल न केवल राजकीय सत्ता बल्कि पुलिस की तरफ़ से भी यूज़र्स को ऑटोमैटिक नोटिस भेज सकता है, और बिना कारण बताए उनके कंटेंट को हटा सकता है.

जानकारों ने कहा की अमित शाह का सांगठनिक पद से सरकारी पद की तरफ़ बढ़ने की शुरुआत 2019 में तब हुई थी जब गृह मंत्री का पद संभालने के बाद उन्हें महत्वपूर्ण कार्य सौंपे गए थे, जिसे उन्होंने मोदी के लिए करके भी दिखाया.

नरेंद्र मोदी: द मैन, द टाइम्स  नाम की किताब लिखने वाले पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, ‘इसकी शुरुआत 2019 में यूएपीए में किए गए एक अपेक्षाकृत कम चर्चित संशोधन से हुई, जिसके बाद अनुच्छेद 370 को कमजोर करना, सीएए और अन्य कदम आए. यह वही दौर था जब अमित शाह की छवि एक ऐसे नेता के रूप में उभरने लगी, जो मोदी की राजनीति को समझा भी रहे थे और सामने भी रख रहे थे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘पिछले कुछ वर्षों में गृह मंत्री रहते हुए भी वह पार्टी के कहीं अधिक प्रभावशाली और स्पष्ट वक्ता प्रचारक बन गए हैं. यानी वह व्यवहारिक रूप से पार्टी के वास्तविक अध्यक्ष और देश के गृह मंत्री, दोनों भूमिकाओं को एक साथ निभा रहे हैं. मुझे शाह और मोदी की राजनीति में कोई फर्क नहीं दिखता. शाह, मोदी के सच्चे शिष्य हैं. वह 2002 से ही मोदी के दूसरे नंबर के नेता रहे हैं और आज भी वही भूमिका निभा रहे हैं. मोदी उन्हें जो खास जिम्मेदारियां सौंपते हैं, उन्हें वह लगातार पूरा करते रहे हैं.’

मोदी और शाह का लंबा इतिहास

द कारवां की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बायो-केमिस्ट्री में स्नातक अमित शाह और नरेंद्र मोदी का साथ 1980 के दशक से रहा है. उस समय मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक थे, जबकि शाह एक सामान्य स्वयंसेवक थे. बाद में शाह संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े और 1986 में भाजपा में शामिल हो गए, यानी मोदी से एक साल पहले. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी के 12 वर्षीय कार्यकाल के दौरान शाह ने एक समय में दस तक मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली, जिनमें गृह मंत्रालय में कनिष्ठ मंत्री का पद भी शामिल था.

2016 में जब शाह दूसरी बार भाजपा अध्यक्ष बनाए गए थे, तब द वायर में लिखते हुए मुखोपाध्याय ने कहा था कि मोदी के उभार में शाह की अहमियत को समझने के लिए जुलाई 2010 के उस दौर को देखना जरूरी है, जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में शाह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया.

मुखोपाध्याय ने लिखा था कि गिरफ्तारी से पहले शाह को ‘उस मशीनरी का अहम पुर्जा माना जा रहा था, जो मोदी के अंततः दिल्ली पहुंचने के रास्ते को संभालेगी,’ और उनकी गिरफ्तारी ने ‘उस रफ्तार को कुछ हद तक धीमा कर दिया था.’

हालांकि शाह ने द कारवां से बातचीत में अपने खिलाफ मामलों को ‘कांग्रेस की साजिशन कार्रवाई’ बताया था, लेकिन अगले वर्षों में जैसे 2002 गुजरात दंगों के बाद मोदी से जुड़े मामले कमजोर पड़े, वैसे ही शाह के खिलाफ मामले भी खत्म होते गए. इनमें 2013 का तथाकथित ‘स्नूपगेट’ मामला भी शामिल था, जिसमें उन पर एक युवती का फोन टैप कराने का आरोप लगा था.

सोहराबुद्दीन मामले में जमानत मिलने और 2012 में सुप्रीम कोर्ट से दोबारा गुजरात लौटने की अनुमति मिलने के बाद शाह ने संगठन के भीतर अपनी राह फिर से बनाई और धीरे-धीरे मोदी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी के रूप में उभरे. 2014 लोकसभा चुनाव के बाद मोदी ने उन्हें ‘मैन ऑफ द मैच’ कहा था. इसके बाद भाजपा ने कई अहम राज्यों में लगातार चुनावी जीत दर्ज की और शाह ने खुद को एक सक्षम भाजपा अध्यक्ष के रूप में स्थापित किया.

बाद के वर्षों में महाराष्ट्र (2019) और मध्य प्रदेश (2023) जैसे राज्यों में निर्वाचित सरकारों को हटाने में भाजपा की सफल राजनीतिक चालों पर भी शाह की छाप मानी जाती है.

14 नवंबर 2025 को नई दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत के जश्न के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (बाएं) और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह. (फोटो: पीटीआई/रवि चौधरी)

मोदी के भरोसेमंद, उत्तराधिकार की योजना और आगे क्या?

2024 के बाद के वर्षों में सार्वजनिक रूप से शाह का कद भले ही बढ़ा हो, जानकार कहते हैं कि वो अभी भी मोदी के विश्वासपात्र हैं, और हिंदुत्व प्रोजेक्ट के सपने को सच करने के लिए उनके द्वारा उठाए गए कदम, दोनों के साथ का ही परिणाम है, न की यह शाह के अकेले का काम है.

मोदी और शाह की जुगलबंदी को राज्य और केंद्र दोनों ही जगहों में वर्षों तक बारीकी से देखने वाले एक अनुभवी पत्रकारने बताया, ‘ये कदम उन दोनों ने मिलकर उठाए हैं. शाह के पास एक तेज़ दिमाग़ और रिस्क लेने की भूख है. अभी तक तो शाह को मोदी के द्वारा ही तैनात किया गया है और उनके पास स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अधिकार नहीं है.’

उन्होंने कहा, ‘2024 लोकसभा चुनाव के नतीजे मोदी की उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे, उसके बाद ही अमित शाह की भूमिका बड़ी दिखाई देने लगी. अगर भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल गया होता, तो आप आज वाले अमित शाह को नहीं देखते. श्रेय अगर कोई हो, तो मोदी उसे पूरा अपने नाम करना चाहते हैं. लेकिन अगर दोष हो, तो उससे दूरी रखना चाहते हैं. सार्वजनिक तौर पर एक कदम पीछे दिखना मोदी को यह मौका देता है कि फायदा भी मिले और अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक न हों, तो उनका नाम भी उससे दूर रहे.’

मुखोपाध्याय कहते हैं कि दोनों के बीच के समीकरण को समझने के लिए हमें आवश्यक रूप से सार्वजनिक पहलुओं से इतर देखना होगा. ‘दोनों को एक दूसरे का कच्चा चिट्ठा पता है, और वे एक दूसरे को धोखा दे ही नहीं सकते. जहां तक सत्ता की बात है, मोदी के पास सर्वाधिकार है, करिश्माई व्यक्तित्व है, वो एक कुशल वक़्ता के साथ-साथ लोकप्रिय नेता भी हैं.’

अब जब मोदी 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं, वही उम्र सीमा जिसे भाजपा ने पहले सार्वजनिक पदों पर रहे नेताओं, जैसे लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी, पर लागू किया था, तो 2029 की राह शाह की मोदी के उत्तराधिकारी बनने की महत्वाकांक्षाओं और इस सवाल को भी जन्म देती है कि क्या प्रधानमंत्री वास्तव में उत्तराधिकार की कोई योजना तैयार कर रहे हैं.

मोदी के बाद बनने वाली संभावित भाजपा सरकार के लिए शाह अकेले दावेदार नहीं हैं. आरएसएस से जुड़े जानकारों का कहना है कि मैदान अभी पूरी तरह खुला हुआ है और कम से कम तीन दावेदार इस दौड़ में हैं- उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो अगले वर्ष देश के सबसे अहम चुनावी राज्य में लगातार तीसरे कार्यकाल की कोशिश करेंगे; महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस; और स्वयं अमित शाह.

मुखोपाध्याय कहते हैं, ‘मोदी के बाद आरएसएस को एक बार फिर शुरुआत पहले पन्ने से करनी होगी. तब परिस्थितियां बिल्कुल अलग होंगी. दावेदार कई हैं. सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि मोदी कब जाते हैं और किन हालात में जाते हैं. अगर वे चुनावी हार के बाद जाते हैं, तो अमित शाह की कोई संभावना नहीं बचेगी, क्योंकि तब भाजपा में व्यापक बदलाव की जरूरत पड़ेगी और यह माना जाएगा कि मोदी की राजनीति पार्टी को आगे नहीं ले जा सकी. 2004 के बाद भी कुछ ऐसा ही हुआ था, जब अटल बिहारी वाजपेयी अप्रासंगिक हो गए थे. लेकिन जब तक ‘राजा’ सत्ता में है, तब तक इस पर खुलकर बात नहीं की जा सकती.’

(मूल अंग्रेज़ी से कुमार निशांत द्वारा अनूदित)