यह कहना अतिशयोक्ति या भावुकता नहीं, सचाई है कि हममें से बहुतों ने बहुत सारा हिंदुस्तान रघु राय के फोटोग्राफ़ों से देखा.
इस हिंदुस्तान में आम ज़िंदगी की लगभग अनंत लगती दृश्यावलियां और बिम्बावलियां हैं: नहाते-दौड़ते-घबराते-काम करते, उदास या खुश होते लोग, ढोते-सुस्ताते-थकते-मुस्कराते लोग, काम निपटाती, पानी भरती, खाना बनाती, बोझ उठाती स्त्रियां, खेलते-काम पर जाते बच्चे, नेता-पंडित-मौलवी, मलंग-पहलवान-लफंगे-ग़ुंडे-दंगाई, खेत-खलियान, फैक्ट्री-ट्रक, कारें-ट्रैक्टर, ताजमहल, बनारस, गैस कांड में मारे गए लोग और दफ़्न की गई एक बच्ची, कूड़ा-कबाड़, कोहरे-रोशनियां, गोधूलि की भव्यता आदि ऐसा बहुत दर्ज है, जो हमारे आसपास का है और जो कई बार हम देख नहीं पाते. इस हिंदुस्तान में मल्लिकार्जुन मंसूर, कुमार गंधर्व, बिसमिल्लाह ख़ान आदि भी हैं और मदर टेरेसा भी.
रघु राय ने अपने कला-माध्यम से इतना सारा हिंदुस्तान समेटा और दर्ज-उजागर किया है कि उसे एक महागाथा ही कहा जा सकता है: एक बृहत् उपन्यास, एक विजुअल महाकाव्य- लगभग एक अघोषित महाभारत. उसकी संरचना में सामान्यीकरण की कोई जगह नहीं है. हर चीज़, घटना या व्यक्ति या स्थिति या दृश्य अपने ब्यौरों और संदर्भ में दर्ज है, अपनी सभी सलवटों और परतों में.
उन्होंने शुरुआत तो फोटो-पत्रकार के रूप में की थी पर वे जल्दी ही फोटो-कलाकार हो गए. एक स्तर पर उन्होंने अपनी कला से भारतीय जीवन का गुणगान ही किया- उसका उत्सव मनाया, एक तरह की भारत-लीला रची. ऐसी लीला, जिसमें कोई नायक नहीं है- जीवन ही नायक है; मानो लीला ही अपना नायक है.
उनसे अच्छा परिचय तो दिल्ली में आने-बसने के बाद हुआ. बहुत उत्साहित रहने वाले यारबाश थे. एक बार एक शाम हम उनके भारती नगर स्थित सरकारी मकान में मिले. चित्रकार-मित्र जतिन दास भी थे. तब तक रघु राय अपने समय के कुछ मूर्धन्य संगीतकारों पर फोटो-निबंध प्रकाशित कर चुके थे. वह शाम शास्त्रीय संगीत पर ही एकाग्र हो गई.
हमने सोचा ऐसी कोशिश करनी चाहिए कि हर वर्ष दिल्ली में एक संगीत का पखवारा मनाया जाए जिस दौरान दिल्ली में उसके सभागारों, पार्कों, नुक्कड़ों, पुरातात्विक स्मारकों आदि सबमें संगीत हो; हर तरह का संगीत: शास्त्रीय, लोकप्रिय, जाज़, लोक, बैंड संगीत आदि. संगीतकारों के साथ चर्चा के सत्र हों. शैक्षणिक संस्थाओं में छात्र और अध्यापक संगीत प्रस्तुत करें. संगीत से प्रेरित कला प्रदर्शनियां, कविता पाठ हों, संगीत या संगीतकारों पर आधारित फ़िल्में दिखायी जाएं. दूसरे शब्दों में, दिल्ली पर एक पखवारे संगीत कब्ज़ा कर ले और उसी का राज चले. हम उस शाम रसरंजित होते हुए अपनी इस कल्पना का को इतना विस्तार देते रहे कि उसकी व्यावहारिकता पर विचार नहीं कर पाए. ज़ाहिर है, इस योजना पर कभी अमल नहीं हो पाया.
लेकिन रघु राय की शास्त्रीय संगीत में कितनी गहरी दिलचस्पी और पैठ है, यह उस शाम फिर स्पष्ट हुआ. जब मैं ललित कला अकादेमी का अध्यक्ष था, तो मैंने उसकी सामान्य सभा पर उन्हें नामजद किया था. एक बार वे दफ़्तर आए, अकादेमी के किसी काम से नहीं पर यह कहने कि वे शास्त्रीय संगीतकारों की अपनी छवियां एक पुस्तक में प्रकाशित करना चाहते हैं और मैं उन तेरह संगीतकारों पर कुछ छोटे निबंध लिखने की ज़िम्मेदारी निभाऊं. मैं मान गया: न तो रघु राय संगीत के बहुत तकनीकी जानकार थे, न मैं हूं. फिर भी, वह पुस्तक हार्पर कॉलिंस से प्रकाशित हुई. उसकी विशेषता उसमें रघु के चित्र हैं- मल्लिकार्जुन मंसूर एक खेत में ट्रैक्टर के बगल में खड़े हुए, वीणावादक एस. बालचन्दर एक विशाल चट्टान पर बैठे हुए आदि. किसी और फोटोग्राफ़र ने संगीतकारों के सामान्य जीवन, प्रस्तुति आदि के मर्म को ऐसी आरक्त दृष्टि से नहीं देखा और दर्ज किया जैसा रघु राय ने.
उनके बहुत सारे हिंदुस्तान में शास्त्रीय संगीत और संगीतकारों की बहुत उजली उपस्थिति थी. चूंकि अब रघु राय रुख़सत कर गए हैं तो यह सब स्मृति में चला जाएगा. कोई और हमें शायद इतना सारा हिंदुस्तान नहीं दिखा पाएगा. साधारण जीवन और साधारण लोगों को उनकी अदम्य गरिमा में भला, उनके अलावा किसी और ने इतना सारा दर्ज किया है?
युवा उन्मेष
हिंदी में युवा लेखकों के लिए कई पुरस्कार हैं. उनमें से ज़्यादातर युवाओं द्वारा स्थापित नहीं हैं. बनारस की युवा लेखकों की संस्था ‘हिंदी सोपान’ के युवा कविता के लिए जो ‘उन्मेष’ पुरस्कार स्थापित किया है वह अपवाद है. पुरस्कार के लिए बाक़ायदा प्रविष्टियां आमंत्रित की गईं और सत्तर कवियों की लगभग सात सौ कविताएं पढ़ने का काम मेरे ज़िम्मे आया क्योंकि पहले पुरस्कार का निर्णायक मुझे बनाया गया. मैंने 24 वर्ष के युवा कवि हिमांशु जमदग्नि को पहले ‘उन्मेष’ सम्मान के लिए चुना.
बनारस में आयोजित सम्मान समारोह में उन्हें पहली बार देखा, उनकी आयु पता चली और यह भी कि वे हरियाणा के हैं. जमदग्नि की कविता में गहरी स्थानीयता है और वे ऐसे अनेक शब्दों और छबियों का इस्तेमाल करते हैं जो हिंदी कविता के लिए नए हैं. उनके यहां स्थानीयता और वैचारिकता एक ही ऐंद्रिय भूगोल से उपजते हैं. प्रकृति का सूक्ष्म अवलोकन और विचार की सघनता गुंथे हुए हैं. उन्होंने थोड़ी लंबी कविताएं सार्थक ढंग से लिखी हैं और उनकी ‘धोलाकपाड़िया पच्चीसी’ श्रृंखला नवाचार है जिसमें बखान, प्रश्नवाचकता, आत्मालोचन अपनी संयमित जगह पाते हैं और आकार में अभिव्यक्त का कसाव भी है. उनकी शब्द-बहुलता उपयुक्त लगती है.
‘कविता का खोया हुआ संगीत’ वे शब्दों के क्षोभ में सुनते लगते हैं. उनके निपट स्थानीय भूगोल में व्यापक संसार को अन्तर्ध्वनित करने की सर्जनात्मक क्षमता है.
पुरस्कार के लिए उपयुक्त कवि का चयन करने की प्रक्रिया में अनेक युवाओं के कुछ शब्दों, पदों और पंक्तियों पर ध्यान गया. ‘दाँत चियारे’, ‘डेल्हवा पोखर’, ‘अकाल में कंकालों के बीच’ (अरूण यादव), ‘उपेक्षाओं के तन्दुल’, ‘उर अन्तर की केकई’, इच्छाओं के चोरसंदूक’ (शेरिल शर्मा), ‘जीने की चाह में लोग/मरकर लौटे’ (अभिषेक कुमार गुप्त), ‘अर्जी और पर्ची के इस नये दौर में’ (प्रदीप सिंह), ‘झूठ मेरे काम आओ/अँधेरे मेरे काम आओ,/हताशा मेरे काम आओ’, ‘ज्यों माँजती हो जूठे बासन, वैसे मुझे माँजो’ (कुशाग्र अद्वैत), ‘पेड़ ही होते हैं गाँव के असली मानचित्र’, ‘मेरी मातृभाषा बटुली में रिंहते हुए भात की तरह थी’ (रविकुमार यादव), ‘काई, प्राचीनतम नहीं थी/मगर उसका उगना एक प्राचीनतम घटना थी’. ‘पत्तियां धूप का कुनकुना गीत गाने लगीं’ (पीयूष तिवारी), ‘हम जाएंगे नर्क/बनायेंगे अपनी सत्ता वहीं पर’, ‘उसके सपनों की चिता की राख में सिंकी हुई खाते गए रोटियां’ (साक्षी लोधी) ‘झौंर जामुन की डाली/लिपटी वेणी पर बौर वाली’ (अमित जोशी), ‘क्या मुझसे भी कम है उसके पास?’, मैं कहां हूँ घर में या जंगल में?/क्या किसी और घर में?’ (अजय कुमार), ‘मैं दुख के कई दरवाज़े लाँघकर आया हूँ (मुकेश कुमार), ‘मैं उस पल्लव को उसी तरह दफ़न कर आया हूँ/जहां उसका जन्म हुआ था’ (अगम मुरारी यादव), ‘मेरा वजूद पड़ा है/श्मशान में टूटे-बिखरे घड़े सा’ (गौरव भारती), ‘माँ को धान की लवनी नहीं आती थी (कुलदीप आसकिरण), ‘रोज़मर्रा के समय को न जाने किस गुल्लक में जमा किया जा रहा है’ (सुबोध श्रीवास्तव), ‘धूप उनकी त्वचा का एक हिस्सा हो चुकी’, ‘मैं दुनिया की शुरुआत से पहले तुम्हारे गर्भ में थी’ (शिवांगी गोयल), ‘सुबह उठने पर वे फिर ढोयेंगे/अपने हिस्से का पहाड़’ (मोहित नेगी), ‘तुम्हें दिखना चाहिए रेाटी के कौर में/किसान का वह जलता हुआ खेत’ (देवेन्द्र कुमार), ‘मरी आत्मा के निर्भय नाद से’ (फ़हमीना अली), उनके बस्तों में भर दिया गया है अँधेरा’ (वसुन्धरा यादव), ‘उनकी भी पोटली होगी/जिस में दाने होंगे स्वप्नों के कबूतरों की ख़ातिर’ (देवांश दीक्षित), ‘नज़र नहीं लग सकती मुझको इस दुनिया की/मेरी नज़र उतारी है मेरी माँ ने अपनी नज़र से’ (रज़िया बानो), धर्म-धन्धा-धाम बनारस’ (जयन्त शुक्ल), ‘कितनी निर्दोष है तुम्हारी क्रूरता’ (तेजस पूनिया), ‘हम रोशनी हैं जो दिये की बाती से बाहर निकल आयी है’ (कंचन सिंह), ‘गणित भी अपने क्षेत्रफल में क़ैद है’ (भावना पंवार), ‘दरिया, पहाड़, पेड़, हवा और तितलियां/करते हैं हमसे बात अगर ग़ौर से सुनो’ (अभिषेक अम्बर), ‘घर में सालों से बसी हमारी महक नहीं ले जा पाते हम साथ, चाहकर भी, नयी जगह’ (विधान गुंजन), ‘मेरे कहने में नहीं/तुम्हारे सुनने में था अर्थ/तुम्हारे सुनने था मैं’ (अवकेश कुमार), ‘जैसे पानी भरना उनके जीवन जीने से ज़रूरी काम हो’ (आकांक्षा मिश्र) और ‘प्यार करनेवालों को उनकी जगह दे दो’ (रत्नेश कुमार)
इतनी सारी युवा कविताएं पढ़ना व्यर्थ का बोझ नहीं लगा. जहां-तहां लपक और चमक है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
