भारतीय राज्य सत्ता बनाम पश्चिम बंगाल: एक विचित्र चुनाव

अपनी तमाम कुटिलताओं के बावजूद, यह बिल्कुल भी पक्का नहीं है कि भाजपा बंगाल चुनाव जीत ही जाएगी. लेकिन, एक बात जो पक्की है, वह यह है कि अगर कोई फासीवादी पार्टी सत्ता में आती है, तो हो सकता है कि वह पुराने संवैधानिक समझौतों का पालन न करे.

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और भवानीपुर विधानसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) उम्मीदवार ममता बनर्जी बुधवार, 29 अप्रैल 2026 को कोलकाता के एक मतदान केंद्र पर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण में मतदान करने के बाद. फोटो: पीटीआई.

हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव महज़ तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच का एक चुनावी संघर्ष मात्र नहीं था. बल्कि इस चुनाव ने कुछ गुणात्मक रूप से अलग ही स्थिति को दर्शाया- एक ऐसी स्थिति, जहां किसी निर्वाचित राज्य सरकार की सत्तारूढ़ पार्टी को एक ही समय में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और भारतीय राज्य की संस्थागत मशीनरी से एक साथ लोहा लेना था.

केंद्रीय चुनाव आयोग (केंचुआ) केंद्रीय जांच एजेंसियों, केंद्रीय सशस्त्र बलों और गजानन माधव मुक्तिबोध की शब्दावली का इस्तेमाल किया जाए तो एक ‘बेज़ुबां बेबस सलाम में’ सिर झुकाए खड़ी न्यायपालिका द्वारा लिए गए फ़ैसलों के संयुक्त प्रभाव ने, शायद, इन चुनावों को 1975 के आपातकाल के बाद के भारतीय इतिहास का सबसे ज़्यादा हस्तक्षेप-पूर्ण विधानसभा चुनाव बना डाला.

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर): वोट के अधिकार से वंचित करना

इस दखलंदाज़ी का सबसे अहम ज़रिया राज्य की चुनावी सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण रहा है, जिसके ज़रिए चुनावी सूची से तक़रीबन 90 लाख नाम काट दिए गए. यह कुल मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत है. इनमें से 60 लाख से ज़्यादा लोगों को ‘अनुपस्थित’ या ‘मृत’ की श्रेणी में रखा गया, जबकि 27 लाख लोगों का मामला अभी भी ट्रिब्यूनल के सामने लंबित है, जिस पर फ़ैसला होना अभी बाकी है. इनमें लगभग 65 प्रतिशत मुसलमान हैं. इसके अलावा, इससे प्रभावित होने वालों में मतुआ समुदाय के दलित (नामशूद्र) हिंदू भी शामिल हैं. गरीब तबके की महिलाएं भी इस कार्रवाई की ज़द में आई हैं.

चुनाव आयोग ने इसे एक सामान्य ‘शुद्धिकरण’ की प्रक्रिया के तौर पर पेश किया. पर पश्चिम बंगाल के मामले में, बिना किसी सांख्यिकीय आधार के उसके साथ एक विशेष मामले जैसा बर्ताव किया गया. इसके चलते यहां 30 पर्यवेक्षक तैनात किए गए, जबकि उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ चार किए गए थे; पश्चिम बंगाल में जहं 8,000 माइक्रो-पर्यवेक्षक तैनात थे, जबकि अन्य राज्य में एक भी नहीं; और, पूरे भारत में अधिकारियों के जितने भी तबादले किए गए, उनमें से 95 प्रतिशत सिर्फ़ इसी एक राज्य में तामील किए गए.

इन तैनातियों और तबादलों को प्रशासनिक तौर पर तो कत्तई नहीं समझाया जा सकता. अलबत्ता, इसे राजनीतिक तौर पर ज़रूर समझाया जा सकता है.

इस विशेष गहन पुनरीक्षण ने एक बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांत को भी उलट-पलट के रख दिया- मतदाताओं पर अपने जायज़ मतदाता होने का पुख़्ता सबूत देने का बोझ डालकर. उनसे दस्तावेज़ों के ज़रिए अपनी पात्रता को स्पष्ट रूप से साबित करने की मांग की गई है. इस प्रक्रिया ने मतदान के अधिकार की मूल धारणा को ही सिर के बल खड़ा कर दिया, जो किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आधार होती है.

क्षेत्र-वार आंकड़े साफ़ दर्शाते हैं कि आख़िर निशाना किसे बनाया जा रहा था: नंदीग्राम में, जहां मुसलमानों की आबादी 25 प्रतिशत है, यहां हटाए गए नामों में से 95 प्रतिशत से ज़्यादा नाम मुसलमानों के हैं; भवानीपुर में, जहां मतदाता सूची में मुसलमानों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत है, हटाए गए नामों में से 40 प्रतिशत मुसलमान हैं. जिन किरदारों ने इसकी राजनीतिक रूपरेखा तैयार की थी, उन्होंने इस प्रक्रिया को कभी भी निष्पक्ष बताने या जताने की ज़हमत नहीं उठाई.

केंद्र सरकार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक नेता ने तो ऐलानिया तौर पर एक करोड़ मुसलमान घुसपैठियों को मतदाता सूची से हटाने की बात कही. संक्षेप में कहें तो, इस कृत्य को अंजाम देने के लिए आयोग द्वारा संस्थागत आड़ मुहैया करवाई गई. जबकि इसके लिए दिशा निर्देश भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा पारित किए गए.

विशेष गहन पुनरीक्षण: संवैधानिक आदेश से परे

विशेष गहन पुनरीक्षण का कोई स्पष्ट कानूनी आधार नहीं है. इसका ज़िक्र जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में कहीं दिखाई नहीं देता. इस अधिनियम की धारा 21(3) केवल किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से के लिए विशेष संशोधन की अनुमति देती है, न कि समूचे राज्य के लिए. इसमें इस्तेमाल की गई ‘पात्रता तिथि’ का भी कोई वैधानिक आधार नहीं है.

संविधान का अनुच्छेद 324, जो आयोग को चुनावों पर व्यापक पर्यवेक्षण का अधिकार देता है, असीमित शक्तियों प्रदान नहीं करता. अर्थात जहां-जहां कानून मौजूद है, वहां-वहां इसे कानून के दायरे में रहकर ही काम करना होता है. आयोग केवल वहीं स्वतंत्र रूप से काम कर सकता है जहां कानून मौन है. इस मामले में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम मौन नहीं है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया, इस पहलू को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करती है.

इस प्रक्रिया के तार्किक विरोधाभास भी उतने ही लचर हैं. इस पूरी प्रक्रिया को पिछले दो दशकों में हुए जनसांख्यिकीय बदलावों के आधार पर आयोग द्वारा न्यायोचित ठहराया गया – लेकिन इसे निर्धारित चुनावों से चंद महीने पहले, कुछ ही हफ़्तों में निपटा दिया गया; जबकि कानून और सामान्य बुद्धि के हिसाब से इस काम को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए था.

इस प्रक्रिया के भीतर एक और ‘तार्किक विसंगति’ छिपी हुई थी. यह एक अस्पष्ट प्रशासनिक वर्गीकरण था, जिसे उन मतदाताओं पर लागू किया गया जिनके दस्तावेज़ अन्यथा पूरी तरह दुरुस्त थे. इस वर्गीकरण के तहत, बिना किसी स्पष्ट प्रमाणिक आधार के ही मतदाताओं के नाम काटने के लिए चिह्नित कर लिए गए. इसी श्रेणी के ज़रिए, इस पूरी प्रक्रिया का नौकरशाही वाला मुखौटा पूरी तरह से उघड़ गया. मतलब, यदि अमुक अधिकारी को किसी व्यक्ति को लेकर कोई बात असंगत लगती है, तो एक वैध दस्तावेज़ को भी उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सकता है. अर्थात अधिकारी के फ़ैसले को गलत साबित करने का बोझ उस व्यक्ति-विशेष पर डाल दिया गया है.

इस तथ्य को ध्यान में रख़ा जाना चाहिए कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में सिर्फ़ सामान्य निवास तय करने का प्रावधान है, न कि नागरिकता तय करने का. मतदाताओं से वंशावली और दस्तावेज़ों की कड़ियों के ज़रिए नागरिकता साबित करने की शर्त लगाकर, आयोग ने एक ऐसे नागरिकता ऑडिट को अंजाम दिया है, जिसका उसके पास क़ानूनन कोई अधिकार नहीं है.

विशेष गहन पुनरीक्षण का मक़सद मतदाता सूची का रखरखाव नहीं था. इस काम के लिए एनआरसी था- जिसे आयोग द्वारा ही बनाया, डिज़ाइन और लागू किया गया.

निशाना बनाकर नाम काटने का गणित

विशेष गहन पुनरीक्षण के नतीजों का सीधा-सीधा संबंध उन सीटों से है, जिन्हें भाजपा ने 2021 में बहुत कम मतों के अंतर से जीता था. तक़रीबन 8,000 या उससे कम मतों से तय हुई 57 सीटों में से, तृणमूल कांग्रेस ने 29 और भाजपा ने 28 सीटें जीतीं. इसी प्रकार, 3,000 से कम मतों से तय हुई 19 सीटों में से, भाजपा ने 12 सीटों पर विजय हासिल की. कुल्टी सीट 679 मतों से जीती गई, और वहां से 38,000 नाम काट दिए गए- जो जीत के अंतर से 50 गुना ज़्यादा हैं. नंदीग्राम की सीट, जो 1,956 वोटों से जीती गई थी, वहां से 14,462 नाम हटाए गए. दांतन सीट 623,  घाटाल 966 और बांकुरा 1,468 वोटों से तय हुई थी. नतीजे आने से पहले, लगभग 111 विधानसभा क्षेत्रों में, जांच के दायरे में आए मतदाताओं की संख्या उन क्षेत्रों में 2024 के लोकसभा चुनावों में जीत के अंतर से भी ज़्यादा थी.

ज़ाहिर है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया, भाजपा को उन सीटों पर रणनीतिक बढ़त देती है, जहां जीत-हार का फ़ासला बहुत कम है; और, ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है.

(बहरहाल, यह देखना अभी बाकी है कि क्या यह सियासी बिसात उन लोगों में नागरिकता खोने की चिंता भी पैदा करेगी, जिनके नाम लिस्ट से नहीं काटे गए हैं, और कि क्या वे सिर्फ़ अपनी नागरिकता बचाने के मकसद से तृणमूल की तरफ झुकेंगे.)

नए मतदाताओं को अपारदर्शी तरीके से जोड़ना

इस असंतुलन के खेल को और अधिक बढ़ाने वाली बात यह भी है कि बहीखाते के दूसरी तरफ क्या हुआ. मतदान से ठीक पहले, आयोग ने गुपचुप तरीक़े से करीब सात लाख नए मतदाता जोड़ दिए- पहले चरण के लिए 3.22 लाख, और, दूसरे चरण के लिए 3.88 लाख, जबकि उसने इन मतदाताओं के बारे में कोई भी जनसांख्यिकीय जानकारी देने से इनकार कर दिया.

लाखों मतदाताओं के नाम बहुत बारीकी से जांच-पड़ताल के बाद काटे गए थे; जबकि लाखों नए मतदाताओं के नाम बिना किसी लाग लपेट के जोड़ दिए गए. ये सात लाख मतदाता कौन हैं, और उन्हें जोड़ने के पीछे वैसी किसी भी पारदर्शिता की दरकार क्यों नहीं समझी गई, जैसी कि नाम काटते समय ज़रूरी समझी गई थी- इन सवालों के जवाब आज तक नहीं मिल पाए हैं.

ट्रिब्यूनल: समाधान का भ्रम

विशेष गहन पुनरीक्षण में अपील की व्यवस्था एक क्रूर मज़ाक से ज़्यादा कुछ नहीं थी. लाखों मामलों का समाधान कुछ ही दिनों में किया जाना था. पहले चरण के लिए, समय रहते सिर्फ़ 139 विवादित मतदाताओं की सुनवाई हो पाई, और दूसरे चरण से पहले 1,474 शिकायतकर्ताओं की. ये सभी मामले निपटा दिए गए, लेकिन 27 लाख से भी ज़्यादा आवेदनकर्ताओं की सुनवाई का तो नंबर भी नहीं आया.

ये मतदाता न तो अनुपस्थित थे और न ही मृत. इन सभी ने अपने दस्तावेज़ भी जमा किए थे, सुनवाई में शामिल भी हुए थे और अपने पासपोर्ट भी दिखाए थे. लेकिन उनकी गुहार अनसुनी रह गईं और यह अन्याय सिर्फ़ ग़रीबों और हाशिए पर रह रहे लोगों के साथ ही नहीं, बल्कि समाज के हर तबके के लोगों के साथ हुआ.

आयोग का अहंकार

आयोग के कामकाज को जो बात गुणात्मक रूप से अलग बनाती है, वह सिर्फ़ उसका वृहद् पैमाना ही नहीं, बल्कि जवाबदेही से पूर्णत: स्वतंत्र होना भी है. आयोग ने दोनों चरणों के दौरान लगभग 1,300 से ज़्यादा लोगों की एक गुप्त सूची तैयार की- जिनमें ज़्यादातर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता और पार्षद, पंचायत सदस्य, विधायक और सांसद जैसे निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल थे. मतदान से पहले ही उनकी एहतियाती गिरफ़्तारी के निर्देश जारी कर दिए गए.

कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा गिरफ़्तारी के निर्देश दिए जाने के अधिकार पर सवालिया निशान लगा दिया: ‘क्या चुनाव आयोग, नागरिकों की आज़ादी छीन सकता है? क्या वह किसी मजिस्ट्रेट के कर्तव्यों का निर्वहन कर सकता है? समूचे देश में पश्चिम बंगाल के अलावा कहीं भी ऐसा नहीं हो रहा है.’

गिरफ़्तारी की सूची, तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर ईडी-एनआईए-सीबीआई की छापेमारी, और जनमत तय होने से पहले ही केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से विपक्ष के अपराधीकरण का प्रयास दर्शाता है. कानूनी हथियारों का इस्तेमाल करके राजनीतिक विरोधियों को पहले से ही अपराधी घोषित किया जा रहा है.

क़ानूनन आचार संहिता लागू होने के बाद और दौरान, चुनाव आयोग के आदेशों के ख़िलाफ़ कोई अपील नहीं की जा सकती. आयोग के पर्यवेक्षकों के पास अर्ध-न्यायिक शक्तियां निहित होती हैं तथा इसके निर्देश राज्य सरकार के अधिकारों पर भारी पड़ते हैं. बिना निर्वाचित हुए और बिना किसी के प्रति जवाबदेह हुए- और असल में किसी भी न्यायिक जांच से लगभग बाहर रहकर- चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में एक ‘सुपर सरकार’ की तरह काम कर रहा है.

तृणमूल कांग्रेस उन पार्टियों में से एक है, जिसने संसद में चुनाव आयोग के शीर्षस्थ अधिकारी के ख़िलाफ़ दो बार महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, और उन पर भाज़पा का पक्ष लेने का आरोप लगाया. यह एक असाधारण कदम था जिसकी आधुनिक इतिहास में कोई मिसाल नहीं मिलती. यह इस बात का संकेत है कि लोगों का आयोग पर संस्थागत भरोसा पूरी तरह से टूट चुका है.

सैन्य कब्ज़ा: केंद्रीय बल और राज्य पुलिस का दरकिनार किया जाना

चुनाव आयोग ने समूचे पश्चिम बंगाल में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) की कुल 2,407 कंपनियां- यानी लगभग 2.4 लाख जवान- तैनात कीं. यह संख्या 2021 के विधानसभा चुनावों के लिए तैनात 725 कंपनियों से तीन गुना से भी अधिक थी, और 2024 के आम चुनावों के दौरान राज्य में तैनात 92,000 जवानों से लगभग तीन गुना.

सभी पांच प्रमुख अर्धसैनिक बलों- केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ), सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी), और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी)- को उनकी देशव्यापी तैनाती से हटाकर एक ही राज्य में तैनात कर दिया गया, जहां किसी तरह का कोई सक्रिय उग्रवाद नहीं चल रहा था. वे राज्य में हर जगह स्वचालित राइफलों से लैस, छलावरण वाली वर्दी पहने और बख्तरबंद गाड़ियों में सवार नज़र आए. कोलकाता में पांचों बलों के प्रमुखों की एक एकीकृत संयुक्त कमान गठित की गई. यह किसी राज्य चुनाव के लिए पहली और अनोखी मिसाल थी.

इसे राज्य में बीएसएफ की स्थायी मौजूदगी के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. सनद रहे कि केंद्र सरकार ने 2021 में बांग्लादेश सीमा के साथ बीएसएफ के अधिकार क्षेत्र को 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 50 किलोमीटर कर दिया था, जिसमें मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना और नदियां के बड़े हिस्से शामिल हैं. इससे इन सभी चुनावी क्षेत्रों में केंद्र सरकार का स्थायी नियंत्रण स्थापित हो गया, जो पूरी तरह से राज्य सरकार की निगरानी से बाहर है.

इसके विपरीत, राज्य की अपनी पुलिस को काम करने के लिहाज़ से पूरी तरह से पंगु बना दिया गया: चुनाव आयोग द्वारा मुख्य सचिव, डीजीपी, कोलकाता पुलिस कमिश्नर और गृह विभाग के प्रधान सचिव को बदल दिया गया. कुल 18 से ज़्यादा आईपीएस अधिकारियों का तबादला किया गया, और पहले चरण से ठीक पहले, एक ही रात में कोलकाता पुलिस के 12 और वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला कर दिया गया.

मतदान के दिन केंद्रीय बल केवल ढांचागत रूप से डराने-धमकाने से आगे बढ़कर सीधे तौर पर दखलंदाज़ी करने लगे. सुजापुर से तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार सबीना यास्मीन ने केंद्रीय बलों पर जान-बूझकर मतदान की गति धीमी करने और कड़ी धूप में तप रहे मतदाताओं को थकाने हेतु लंबे समय तक पहचान पत्रों की जांच करने का आरोप लगाया. उन्होंने औपचारिक शिकायत दर्ज कराने की घोषणा करते हुए कहा, इसके पीछे ‘उनका इरादा कम से कम मतदान करवाना था.’

फिर, दूसरे चरण के चुनाव प्रचार के आखिरी दि, अमित शाह ने खुलासा किया कि इस तैनाती का असली मकसद हमेशा से क्या था. बेहाला में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने भीड़ से कहा: ‘दीदी के गुंडों से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है. चुनाव आयोग ने हर गली-नुक्कड़ पर सीआरपीएफ तैनात कर रखी है. मैं आज आपसे यह कह रहा हूं – भले ही चुनाव के बाद भाजपा सत्ता में आ जाए, लेकिन केंद्रीय बल यहां 60 दिनों तक और तैनात रहेंगे.’

इसका संवैधानिक महत्व चौंका देनेवाला है: चुनावों के दौरान अर्धसैनिक बलों की तैनाती पर चुनाव आयोग का नियंत्रण है; लेकिन मतदान समाप्त होते ही इसकी कमान वापस केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय– यानी अमित शाह के हाथों में चले जाने वाली है.

मतदान समाप्त होने के बाद भी लगभग 500 कंपनियां, यानी 50,000 जवान, तैनात रहने की उम्मीद है. भाजपा के चुनावी मंच पर खड़े होकर, एक पार्टी नेता की हैसियत से, उन्होंने केंद्र सरकार के अर्धसैनिक बलों की भविष्य की तैनाती की घोषणा की- वही बल जिन पर बतौर गृह मंत्री उनका सीधा नियंत्रण है.

एक पार्टी कार्यकर्ता और एक केंद्रीय मंत्री के बीच यहां कोई भेद नहीं किया गया. यह कोई अनजाने में हुई चूक नहीं थी. यह पार्टी और सरकार का परस्पर घुल-मिल जाने का खुला ऐलान था.

जब अमित शाह नेयह एलान किया, वे कोई सुरक्षा का वादा नहीं कर रहे थे. वे असल में उद्घोषणा कर रहे थे कि चुनाव नतीजों की परवाह किए बिना, पश्चिम बंगाल पर सेना का कब्ज़ा जारी रहेगा.

चुनाव के दौरान आयोग की निष्पक्षता महज़ एक दिखावा थी. 4 मई के बाद इस दिखावे की ज़रूरत भी खत्म हो जाएगी.

संवैधानिक संघ-झुकाव का बतौर हथियार इस्तेमाल

कोई भी यह सोचने पर मजबूर हो जाएगा कि क्या यह भारतीय संविधान की उस संरचनात्मक बनावट के बिना संभव हो पाता, जो निर्णायक रूप से ‘संघ’ के पक्ष में झुकी हुई है- केंद्रीय कानूनों की प्रधानता, केंद्र द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति, और आपातकालीन शक्तियों के ज़रिए, जो संघीय ढांचे को एकात्मक ढांचे में तब्दील कर देती हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कई दफ़ा भारत को ‘विनाश शील राज्यों के एक अविनाशी संघ’ के रूप में वर्णित किया है.

2026 में पश्चिम बंगाल में हर दांव एक साथ आज़माया गया है: राज्यपाल को एक राजनीतिक बाधा के तौर पर, आईपीएस अधिकारियों के तबादलों को प्रशासनिक फूट डालने के हथियार के रूप में, और चुनाव आयोग को बतौर ऑपरेशनल कमांड इस्तेमाल में लाया गया. संविधान का यह ‘संघ-झुकाव’ इस मकसद के लिए नहीं बनाया गया था, लेकिन हक़ीक़त में इसे इसी मकसद के लिए एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.

भाजपा का अभियान: पूर्वाग्रह ही कार्यक्रम

इस बार पश्चिम बंगाल में, भाजपा ने अपना ज़्यादातर चुनावी प्रचार और गतिविधियां चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों के हवाले कर दी थीं. हालांकि, भाजपा-संघ के एजेंडे को पहले से ही भारतीय राज्य के एजेंडे के रूप में घोषित किया जा चुका था.

इस बार भाजपा द्वारा मुख्य रूप प्रचारित किया गया कि बांग्लादेशी घुसपैठिए पश्चिम बंगाल की आबादी के स्वरूप को बदलकर नौकरियां हड़प रहे हैं. उसके चुनावी घोषणापत्र का मुख्य बिंदु रहा: ‘पहचानो, हटाओ और वापस भेजो’.

अगस्त 2025 में लाल किले की प्राचीर से अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में, प्रधानमंत्री मोदी ने ‘उच्च-शक्ति जनसांख्यिकी मिशन’ की घोषणा की, जिसे उन्होंने घुसपैठ के ज़रिए भारत के जनसांख्यिकीय चरित्र को बदलने की एक सोची-समझी साज़िश बताया. हालांकि यह कार्यक्रम पहले से ही चलन में था: केंद्र सरकार ने 2025 में बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया के सैकड़ों बंगाली मूल के मुसलमानों को बांग्लादेश वापस भेज दिया था.

शाह ने बंगाल में एक चुनावी रैली में इस चुनावी जुड़ाव को साफ़ तौर पर ज़ाहिर किया: ‘4 मई के बाद, सभी घुसपैठियों की पहचान की जाएगी और उन्हें बंगाल से निकाल-बाहर किया जाएगा.’ पार्टी और राज्य को एक ही जनसांख्यिकीय परियोजना के इर्द-गिर्द सक्रिय रूप से मिलाया जा रहा है.

इस मेल का एक नाम है. जब कोई सत्ताधारी पार्टी, किसी खास अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ जातीय और धार्मिक भेदभाव पर आधारित अभियान को आगे बढ़ाने के लिए, राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल करती है- और जब वह अभियान, संस्थागत रूप से शासन-प्रशासन से एकसार हो जाए- तो उसके लिए उचित विश्लेषणात्मक शब्द- फ़ासीवाद.

चुनावी जीत, फ़ासीवाद को न के वल वैधता प्रदान करती है, बल्कि राज्य-सत्ता तक उसकी पहुंच भी बनाती है. हालांकि, फ़ासीवाद सिर्फ़ चुनाव ही नहीं जीतता; वह राज्य-सत्ता का इस्तेमाल करके, चुनावों के नतीजों को ही धीरे-धीरे बेमानी बनाने के प्रयास भी करता है. इसके ठीक पहले के ‘गुजरात मॉडल’ की तर्ज़ पर, मौजूदा ‘बंगाल मॉडल’ भी इसी दिशा में किया गया एक प्रयोग है.

‘घुसपैठिये’ का किरदार, फ़ासीवाद के उस ‘क्लासिकल’ (पारंपरिक) काल्पनिक दुश्मन के समान है- जिसकी न तो कोई पुष्टि की जा सकती है, जो यत्र-तत्र-सर्वत्र मौजूद माना जाता है, और जो राजनीतिक रूप से बेहद ज़रूरी होता है. यह ‘काल्पनिक घुसपैठिया’ बंगाल के कस्बों और गांवों में ही नहीं पाया जाता, बल्कि भाजपा के राजनीतिक एजेंडे में भी विध्यमान है, जिसका पीछा भारतीय राज्य-सत्ता की पूरी ताक़त लगाकर किया जा रहा है.

हालांकि, चुनावों के पहले चरण के बाद, ‘घुसपैठिया’ वायलेंस अभियान की धार थोड़ी कुंद कर दी गई; और, दूसरे चरण में इसकी जगह, लोक-कल्याण से जुड़े ढेरों वादों और शासन प्रशासन की आलोचनाओं ने ले ली. ज़ाहिर है, इस मुद्दे को उठाने के लिए जितनी भी ताक़त झोंकी गई थी, उसके बावजूद, ज़मीनी स्तर पर लोगों की प्रतिक्रिया संतोषजनक नहीं रही. या संभवत:, इसी वजह से ऐसा हुआ हो.

ममता बनर्जी सरकार के कामकाज का हिसाब-किताब लेने के बजाय, भाजपा ने इस चुनाव को ‘नागरिकता’ के मुद्दे पर लाकर खड़ा कर दिया. जिस तरह से यह पूरा घटनाक्रम आगे बढ़ा, उसे देखते हुए तो यही लगता है कि हर बंगाली एक ‘संभावित घुसपैठिया’ है- जब तक कि वह स्वयं को इसके विपरीत साबित न कर दे. यह शायद मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के लिए एक सवाल है, न कि सिर्फ़ राजनीतिक विश्लेषकों के लिए कि भाजपा को ऐसा क्यों लगा कि इस पैंतरे से वह बंगाल के मतदाताओं का दिल जीत लेगी.

न्यायपालिका द्वारा पल्ला झाड़ना

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी प्रक्रिया को रोकने से इनकार कर दिया जिसे उसने खुद भी दोषपूर्ण माना था. उसने परेशान नागरिकों को उन ट्रिब्यूनलों के पास भेज दिया, जो लाखों मामलों के बोझ तले दबे हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों को अंतरिम मतदान का अधिकार देने से भी मना कर दिया, जिनकी अपीलें अभी लंबित हैं.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पश्चिम बंगाल में अमल में लाई जा रही विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर मचाए जा रहे हंगामे पर सार्वजनिक रूप से नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा कि यही प्रक्रिया दूसरी जगहों पर बिना किसी विवाद के पूरी हो गई थी. इस तरह उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की शुरुआती सोच को भी ज़ाहिर कर दिया: कि असल समस्या बंगाल का विरोध है, न कि वह प्रक्रिया जो अपने आप में ही बेहद कठोर और दमनकारी है. जो न्यायपालिका संवैधानिक विरोध को खीज के साथ देखती है, उसने अपना पक्ष पहले ही चुन लिया है.

बंगाल से आगे: संघीय व्यवस्था खतरे में

अपनी तमाम कुटिलताओं के बावजूद, यह बिल्कुल भी पक्का नहीं है कि भाजपा चुनाव जीत ही जाएगी. लेकिन, एक बात जो पक्की है, वह यह है कि अगर कोई फासीवादी पार्टी सत्ता में आती है, तो हो सकता है कि वह पुराने संवैधानिक समझौतों का पालन न करे. यह भी पक्का नहीं है कि वह सिर्फ़ निष्पक्ष चुनावी नतीजों पर ही निर्भर रहेगी. सत्ता में आने वाली पार्टी अपनी पूरी सरकारी ताकत का इस्तेमाल करके अपने एजेंडे को ही आगे बढ़ाएगी.

असल में, बंगाल के चुनाव को जब संघवाद पर किए गए उसके अन्य हमलों के साथ मिलाकर देखा जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वह सिर्फ़ ज़बरदस्ती चुनाव जीतने की ही कोशिश नहीं कर रही है, बल्कि वह राज्य सरकारों को पूरी तरह से बेमानी बनाने की दिशा में भी काम कर रही है. चुनी हुई नगर पालिकाओं को निलंबित करना; पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, मणिपुर और केरल में राज्यपाल के पद का राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना (और उस जगह का ज़िक्र तो हमने किया ही नहीं, जो कभी एक राज्य हुआ करता था, लेकिन अब नहीं है); और विपक्षी राज्यों के खिलाफ़ अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल की धमकियां देना- ये सब एक ही तरह के पैटर्न को दर्शाते हैं.

भाजपा सिर्फ़ बंगाल जीतने की कोशिश नहीं कर रही है, बल्कि वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि राज्य सरकारों का अस्तित्व पूरी तरह से केंद्र के रहम-ओ-करम पर टिका हुआ हो. वह यह भी साबित करना चाहती है कि इस नए ‘भारतीय राज’ का मिज़ाज बहुत सख़्त है- चाहे उत्तर प्रदेश या हरियाणा में न्यूनतम मज़दूरी की मांग करने वाले ठेका मजदूर हों, या फिर चुनाव लड़ रही कोई मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी, हर किसी के खिलाफ़ आवश्यकता से कहीं अधिक ताक़त का इस्तेमाल किया जाता है.

तृणमूल कांग्रेस ने यह चुनाव सिर्फ़ भाजपा के ख़िलाफ़ नहीं लड़ा. यह चुनाव उसने भारतीय राज्य के ख़िलाफ़ लड़ा, जिसमें चुनाव आयोग ने भाजपा के सहयोगी पक्ष की तरह काम किया है. केंद्रीय बलों द्वारा राज्य पुलिस की कमान संभाल ली गई. संभव है कि चुनाव खत्म होने के बाद भी वे वहीं डटे रहेंगे. विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया द्वारा एक तरफ़ लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए, जबकि दूसरी तरफ़ गुपचुप तरीक़े से नए मतदाताओं के नाम जोड़ दिए गए. संवैधानिक संघ-पक्षपात को एक चुनावी हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया.

सत्ताधारी पार्टी ने एक ऐसा अभियान चलाया, जिसका मूल आधार एक धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी के लिए खतरा है. एक भी वोट पड़ने से पहले ही लोगों को देश से निकाले जाने, वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने और बल तैनात करने जैसे तरीकों से अंजाम दिया गया.

इसे मानने के कई कारण हैं कि 2026 में पश्चिम बंगाल में जो कुछ हो रहा है, वह पूरे देश के लिए महज़ एक ‘ड्रेस रिहर्सल’ या पूर्वाभ्यास है. भाजपा और उसके नियंत्रण वाली केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल में जो कुछ बनाने की कोशिश कर रही है – मतदाता सूची हेरफेर का ढांचा, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की स्थायी मौजूदगी, प्रशासन पर कब्ज़ा और सरकारी एजेंसियों के ज़रिए डराना-धमकाना (और यह सब न्यायपालिका के मौन और परोक्ष समर्थन से हो रहा है) – उसे काम करने के लिए चुनाव जीतने की ज़रूरत नहीं है. यह एक नियंत्रण प्रणाली के तौर पर काम करता है, चाहे चुनाव कोई भी जीते. इस ड्रेस रिहर्सल का असली सबक यही है.

पश्चिम बंगाल के लोग अपने पास मौजूद सीमित संसाधनों के साथ, इसका डटकर मुकाबला कर रहे हैं. यह लड़ाई इतनी जल्दी खत्म होनेवाली नहीं है, फिर चाहे चुनाव कोई भी जीते.

(शांतनु समाज, राजनीति और कला मामलों पर टिप्पणीकार हैं.)

(मूल अंग्रेज़ी से राजेंद्र सिंह नेगी द्वारा अनूदित)