मणिपुर हिंसा के तीन साल पूरे, चार बार समयसीमा बढ़ने के बाद भी जांच आयोग ने नहीं सौंपी रिपोर्ट

मणिपुर में 3 मई 2023 को भड़की जातीय हिंसा को तीन वर्ष पूरे हो गए, लेकिन केंद्र सरकार का जांच आयोग अब तक रिपोर्ट नहीं दे सका है. चार बार समयसीमा बढ़ चुकी है. हिंसा में 270 से अधिक लोगों की मौत हुई, जबकि राज्य में तनाव अब भी बना हुआ है.

मणिपुर पुलिस. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच 3 मई 2023 को भड़की जातीय हिंसा को रविवार (3 मई) को तीन वर्ष पूरे हो रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा गठित जांच आयोग अब तक अपनी रिपोर्ट पेश नहीं कर सका है. आयोग चार बार समयसीमा बढ़ाए जाने के बाद भी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाया है.

यह तीन सदस्यीय जांच आयोग 4 जून 2023 को गठित किया गया था. इसका उद्देश्य उन कारणों, प्रशासनिक चूकों और घटनाक्रम की जांच करना था, जिनकी वजह से मणिपुर हिंसा की चपेट में आया. अब तक इस संघर्ष में कम-से-कम 270 लोगों की मौत हो चुकी है.

सरकारी अधिसूचना के अनुसार, आयोग को अपनी पहली बैठक से छह महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपनी थी. हालांकि अब तक इसे चार बार विस्तार दिया जा चुका है. आयोग की नई समयसीमा 20 मई 2026 तय की गई थी. इससे पहले 13 सितंबर 2024, 3 दिसंबर 2024, 20 मई 2025 और 16 दिसंबर 2025 की समयसीमाएं भी बीत चुकी हैं.

मामले से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि जांच प्रक्रिया अभी जारी है और इसमें अभी लंबा समय लग सकता है. उनके अनुसार, चश्मदीदों और पीड़ितों के बयान दर्ज कराने के लिए उन्हें नई दिल्ली बुलाना पड़ रहा है. इम्फाल स्थित आयोग कार्यालय ने दस्तावेज़ और अन्य साक्ष्य जुटाने का काम पूरा कर लिया है, लेकिन दोनों पक्षों से हजारों आवेदन और बयान आए हैं, जिनमें से किन लोगों को बुलाया जाए, यह तय किया जाना बाकी है.

हिंदुस्तान टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि, आयोग के सदस्य फरवरी में मणिपुर जाने वाले थे, लेकिन वहां फिर से हिंसा भड़कने के कारण दौरा टाल दिया गया.

अब तक आयोग ने उन प्रमुख अधिकारियों के बयान भी दर्ज नहीं किए हैं, जो हिंसा शुरू होने के समय राज्य की कमान संभाले हुए थे. इनमें तत्कालीन पुलिस प्रमुख पी. डौंगल, तत्कालीन मुख्य सचिव राजेश कुमार और तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह शामिल हैं.

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि जिम्मेदारी तय करने के लिए इन अधिकारियों के बयान अहम हैं, क्योंकि प्रशासन के सभी प्रमुख विभाग उनके अधीन थे. उन्होंने कहा कि अब तक आयोग साक्ष्य जुटाने और दस्तावेजी प्रक्रिया में लगा था, लेकिन चूक और कारणों को समझने के लिए ज़रूरी सभी लोगों को बुलाया जाएगा.

आयोग के समक्ष चार मुख्य सवाल हैं, हिंसा क्यों और कैसे फैली, उससे पहले क्या घटनाक्रम हुआ, जिम्मेदार अधिकारियों की क्या भूमिका रही, और हालात संभालने के लिए प्रशासनिक कदम कितने पर्याप्त थे.

आयोग का मुख्यालय इम्फाल के एक होटल की पहली मंजिल पर चल रहा है, जबकि नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में उसका कैंप कार्यालय भी है.

इस वर्ष आयोग की संरचना में बदलाव भी हुआ. पूर्व अध्यक्ष अजई लांबा ने निजी कारणों से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद केंद्र ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश बलबीर सिंह चौहान को नया अध्यक्ष नियुक्त किया. अन्य सदस्यों में सेवानिवृत्त नौकरशाह हिमांशु शेखर दास और पूर्व पुलिस अधिकारी अलोका प्रभाकर शामिल हैं.

इस बीच राज्य में नई सरकार काम कर रही है, जिसकी अगुवाई मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह कर रहे हैं. उनके दो उपमुख्यमंत्री हैं, कुकी विधायक नेमचा किपगेन और नागा नेता लोसी दिखो. इसे विभिन्न समुदायों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश माना जा रहा है.

हालांकि, राज्य में हिंसा पूरी तरह थमी नहीं है. पिछले महीने अलग-अलग घटनाओं में दो बच्चों और सीमा सुरक्षा बल के एक जवान समेत कम-से-कम 11 लोगों की मौत हुई. इनमें कुकी-मैतेई और कुकी-नागा समुदायों के बीच टकराव शामिल थे.