ग्रेट निकोबार परियोजना को मंज़ूरी देने वाली ग्राम सभाओं में अनिवार्य 50% कोरम नहीं था

केंद्र की प्रस्तावित ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के लिए प्रशासन ने तीन ग्राम सभाओं से 349 लोगों की सहमति ली थी जो वहां की कुल आबादी का केवल 4.6% है. निकोबार प्रशासन ने कलकत्ता हाईकोर्ट में दलील दी कि इसे ही ‘सही कोरम’ माना जाना चाहिए. हालांकि नियमानुसार, ग्राम सभा में कोरम तभी पूरा माना जाता है जब उस गांव की वयस्क आबादी का 50% उपस्थित हो, जिनमें एक-तिहाई महिलाएं होना अनिवार्य है.

ग्रेट निकोबार द्वीप । फोटो: प्रसून गोस्वामी / CC BY-SA 4.0

नई दिल्ली: अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह प्रशासन ने केंद्र की 92,000 करोड़ रुपये की ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के लिए सहमति प्राप्त करने हेतु आयोजित ग्राम सभा बैठकों में अनिवार्य 50% कोरम हासिल नहीं कर सका.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बजाय उसने दावा किया कि उसने आबादी के 2% से 15% लोगों की मौजूदगी के आधार पर ही कोरम पूरा कर लिया था और कलकत्ता हाईकोर्ट में दलील दी कि इसे ही ‘सही कोरम’ माना जाना चाहिए.

कोरम का मतलब है किसी बैठक में कोई फ़ैसला लेने के लिए ज़रूरी सदस्यों की न्यूनतम संख्या. वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार द्वारा जारी नियमों के अनुसार, ग्राम सभा में कोरम तभी पूरा माना जाता है जब उस गांव की वयस्क आबादी का ‘आधा’ यानी 50% उपस्थित हो, जिनमें एक-तिहाई महिलाएं होना अनिवार्य है.

प्रशासन ने हाईकोर्ट को बताया कि 12 अगस्त, 2022 को कैंपबेल बे, लक्ष्मी नगर और गोविंद नगर ग्राम पंचायतों के लिए तीन अलग-अलग ग्राम सभा बैठकें आयोजित की गईं. इन बैठकों में कुल सात गांव शामिल थे, और ये तीनों बैठकें एक-दूसरे के आधे घंटे के अंतराल पर ही आयोजित की गई थीं. प्रशासन ने बताया कि इन तीनों ही बैठकों में परियोजना के लिए सहमति देते हुए ‘सर्वसम्मति से’ प्रस्ताव पारित किए गए.

रिपोर्ट के अनुसार, कैंपबेल बे की बैठक में 105 लोग, लक्ष्मी नगर की बैठक में 163 लोग और गोविंद नगर की सभा में 81 लोग मौजूद थे. 2011 की जनगणना के अनुसार इन ग्राम पंचायतों की आबादी की तुलना में – कैंपबेल बे ग्राम सभा में कुल 5,736 लोगों की आबादी में से 1.83% लोग मौजूद थे; लक्ष्मी नगर ग्राम सभा में 1,107 लोगों की आबादी में से 14.72% लोग मौजूद थे; और गोविंद नगर ग्राम सभा में 676 लोगों की आबादी में से 11.98% लोग मौजूद थे. कुल मिलाकर इन तीनों ग्राम सभाओं में 349 लोगों (4.6%) ने इस परियोजना के लिए अपनी सहमति दी. ये तीनों ग्राम सभाएं सात गांवों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिनकी कुल आबादी 2011 तक 7,519 थी.

ये दलीलें प्रशासन ने उस पीठ के समक्ष हलफनामे में दीं, जो उन याचिकाओं की सुनवाई कर रही है जिनमें आरोप लगाया गया है कि परियोजना के लिए सहमति लेने में एफआरए के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया गया. ये दलीलें तब आईं जब केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट से कहा कि उसे ‘यह साबित करने के लिए समय चाहिए कि आदिवासी लोगों से सहमति ली गई है.’

जनजातीय कल्याण विभाग के एक अधिकारी द्वारा दायर पूरक हलफनामे में अंडमान और निकोबार प्रशासन ने तर्क दिया कि विशेष ग्राम सभाएं आयोजित करने में एफआरए के तहत पूरी प्रक्रिया का पालन किया गया था, जिसमें ‘पूर्व सूचना और उचित कोरम’ शामिल था. इन ग्राम सभाओं ने लोगों के वन अधिकारों पर प्रस्ताव पारित किए और परियोजना के लिए वन भूमि के हस्तांतरण को मंजूरी दी. प्रशासन ने इन बैठकों के लिए केवल एक दिन पहले सूचना देने को भी उचित ठहराते हुए कहा कि एफआरए में न्यूनतम सूचना अवधि का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है.

प्रशासन ने कहा, ‘यह कहना अप्रासंगिक है कि आदिवासी समुदायों को एफआरए प्रक्रिया से बाहर रखा गया,’ क्योंकि उप-मंडलीय स्तरीय समिति (एसडीएलसी) में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया था. इसी समिति ने ग्राम सभा के प्रस्ताव को स्वीकार किया और एफआरए के तहत मंजूरी की सिफारिश की थी. हाईकोर्ट में दायर याचिकाएं केवल ग्राम सभा के प्रस्तावों को ही नहीं, बल्कि एसडीएलसी के गठन को भी चुनौती देती हैं.

इसके जवाब में याचिकाकर्ता ने अपने हलफनामे में कहा कि ग्राम सभाओं में कोरम चाहे जो भी रहा हो, निकोबारी और शोम्पेन आदिवासी समुदाय ग्राम सभा संरचना के अंतर्गत नहीं आते हैं. उनका प्रतिनिधित्व ट्राइबल काउंसिल के माध्यम से होता है, इसलिए परामर्श और सहमति लेने के लिए वही उपयुक्त निकाय होना चाहिए था.

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि दर्जनों लोगों के नाम तीनों ग्राम सभा बैठकों की उपस्थिति सूची में समान रूप से दर्ज थे, और कुछ मामलों में एक ही ग्राम सभा की सूची में नाम दोहराए गए थे.

जनहित याचिका को चुनौती

हालांकि, बुधवार (6 मई) को हाईकोर्ट ने इन दलीलों को रिकॉर्ड पर ले लिया, लेकिन भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अशोक कुमार चक्रवर्ती ने इस बात पर बहस की कि क्या याचिकाकर्ता – जो केंद्रीय जनजातीय मामलों और पर्यावरण मंत्रालयों के पूर्व सचिव रह चुके हैं – के पास जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करने का कानूनी अधिकार (लोकस स्टैंडी) है.

अखबार के अनुसार, पीआईएल की वैधता को चुनौती देते हुए चक्रवर्ती ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ता को ग्रेट निकोबार के कथित प्रभावित लोगों ने यह पीआईएल दायर करने के लिए अधिकृत किया था.

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि याचिका से संबंधित नियमों में मुकदमा दायर करने के लिए लोगों के समूहों से ‘अधिकृत अनुमति’ लेने की कोई आवश्यकता नहीं है. वहीं, चक्रवर्ती ने कहा कि एक से अधिक कार्यवाहियों और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के पहले से मौजूद आदेश के कारण इन याचिकाओं को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए.

इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि हाईकोर्ट के समक्ष उठाए गए मुद्दे न केवल एनजीटी के समक्ष उठाए गए मुद्दों से अलग हैं, बल्कि आपस में भी भिन्न हैं.

मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल की पीठ ने कहा कि पक्षों की ‘लोकस/स्वीकार्यता से संबंधित प्रारंभिक आपत्तियों’ पर सुनवाई की गई है और इस संबंध में आदेश अपलोड किया जाएगा.

ज्ञात हो कि केंद्र सरकार ने इस द्वीप पर एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, टाउनशिप, विद्युत संयंत्र और एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे सहित कई परियोजनाएं प्रस्तावित की हैं. 80,000 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली इन परियोजनाओं के तहत द्वीप के लगभग 130.75 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पेड़ों की कटाई भी शामिल है.

विशेषज्ञों और पारिस्थितिकीविदों का अनुमान है कि इससे वर्षावन सहित करीब दस लाख पेड़ काटे जा सकते हैं.