नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य जंगल में एक बार फिर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और वन भूमि हस्तांतरण का मामला सामने आया है.
राजस्थान सरकार की बिजली उत्पादन कंपनी राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरवीयूएनएल) ने सरगुजा जिले में अपने केंटे एक्सटेंशन कोल ब्लॉक के लिए 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन और करीब 4.48 लाख पेड़ों की कटाई की अनुमति मांगी है.
यह जानकारी आधिकारिक दस्तावेजों के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सामने आई है. रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रस्ताव पर शुक्रवार (8 मई) को पर्यावरण मंत्रालय की फॉरेस्ट एडवाइजरी कमेटी (एफएसी) का विचार करना तय था, जो वन भूमि हस्तांतरण की मंजूरी देने वाली प्रमुख समिति है.
2015 में मिला था कोल ब्लॉक, अडानी है डेवलपर
आरवीयूएनएल को यह कोयला ब्लॉक अक्टूबर 2015 में आवंटित किया गया था. इसका उद्देश्य राजस्थान के छबड़ा थर्मल पावर प्लांट और सूरतगढ़ थर्मल पावर प्लांट के लिए कोयले की आपूर्ति करना था.
रिपोर्ट के मुताबिक, इस खदान के डेवलपर और ऑपरेटर के रूप में अडानी समूह कार्यरत है.
हसदेव-अरण्य क्यों अहम है
हसदेव-अरण्य मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है. यह छत्तीसगढ़ के कोरबा, सरगुजा और सूरजपुर जिलों में फैला हुआ है और इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1.7 से 1.75 लाख हेक्टेयर बताया जाता है.
यह क्षेत्र घने साल जंगलों के लिए जाना जाता है. यहां तेंदुआ, स्लॉथ भालू, हाथी समेत नौ ऐसी वन्यजीव प्रजातियां पाई जाती हैं, जिन्हें वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत सर्वोच्च सुरक्षा प्राप्त है.
यह इलाका हसदेव नदी और बांगो बांध का जलग्रहण क्षेत्र भी है. इसे बाघों के आवागमन के लिए महत्वपूर्ण गलियारे के रूप में भी देखा जाता है. स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए यह जंगल जीवन, आजीविका और संस्कृति का प्रमुख आधार है.
पहले से चल रही हैं खदानें
इसी संवेदनशील वन क्षेत्र में परसा और परसा ईस्ट केते बसन (पीईकेबी) ओपनकास्ट कोयला खदानें पहले से संचालित हैं.
ध्यान देने योग्य है कि यूपीए सरकार के दौर में हसदेव-अरण्य को कभी ‘नो-गो ज़ोन’ के रूप में चिह्नित किया गया था, यानी ऐसा क्षेत्र जहां पर्यावरणीय महत्व के कारण खनन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.
कंपनी ने क्यों मांगी नई मंजूरी
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, केंद्र सरकार को भेजे हालिया पत्राचार में आरवीयूएनएल ने कहा है कि उसे भविष्य की बिजली परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त कोयले की जरूरत है.
कंपनी का दावा है कि केंटे एक्सटेंशन ब्लॉक से छबड़ा और सूरतगढ़ परियोजनाओं की भविष्य की जरूरतें पूरी होंगी.
नागरिक संगठनों ने उठाए सवाल
हालांकि इस दावे पर सवाल उठाए गए हैं. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन (सीबीए), जो स्थानीय नागरिक समूहों, आदिवासी संगठनों और कार्यकर्ताओं का साझा मंच है, ने बुधवार को एफएसी को भेजे प्रतिवेदन में इस परियोजना का विरोध किया.
सीबीए ने कहा कि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) ने 2035-36 तक राजस्थान की बिजली जरूरतों का अनुमान घटाकर 16,561 मेगावाट कर दिया है, जबकि पहले यह 20,532 मेगावाट बताया गया था.
संगठन ने आरोप लगाया कि अतिरिक्त वन भूमि लेने की कंपनी की दलील भ्रामक है और यह वास्तविक सार्वजनिक जरूरत के बजाय संकीर्ण हितों की पूर्ति जैसी लगती है.
क्षतिपूरक वनीकरण पर भी सवाल
आरवीयूएनएल ने इस परियोजना के बदले 3,236.08 हेक्टेयर क्षेत्र में क्षतिपूरक वनीकरण (कम्पेन्सेटरी अफॉरेस्टेशन) का प्रस्ताव दिया है.
लेकिन दस्तावेजों के अनुसार, यह वनीकरण गैर-वन भूमि पर नहीं, बल्कि कई जगह मौजूदा वन भूमि और तथाकथित ऑरेंज/रेवेन्यू फॉरेस्ट लैंड पर प्रस्तावित है.
मार्च में पर्यावरण मंत्रालय ने खुद इस पर सवाल उठाते हुए कहा था कि 81 अलग-अलग पैच में कुल 3,236.08 हेक्टेयर भूमि प्रस्तावित है, जिसमें 1,051 हेक्टेयर क्षेत्र मध्यम घनत्व वाले जंगल की श्रेणी में आता है.
यानी एक जंगल के बदले दूसरे जंगल को ‘क्षतिपूर्ति’ के रूप में दिखाने पर आपत्ति उठ रही है.
कंपनी का जवाब
अखबार द्वारा भेजे गए सवालों के जवाब में आरवीयूएनएल ने कहा कि उसका प्रस्ताव वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 और मंत्रालय द्वारा 29 दिसंबर 2023 को जारी समेकित दिशानिर्देशों के अनुरूप प्रस्तुत किया गया है.
हसदेव पर फिर टकराव
हसदेव-अरण्य लंबे समय से जंगल बनाम खनन की राष्ट्रीय बहस का केंद्र रहा है. एक तरफ सरकारें इसे ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक जरूरतों से जोड़ती हैं, दूसरी ओर स्थानीय समुदाय और पर्यावरण समूह इसे जल, जंगल, जमीन और जैव विविधता के विनाश का मामला बताते हैं.
अब केंटे एक्सटेंशन परियोजना पर होने वाला फैसला यह तय करेगा कि देश के सबसे संवेदनशील जंगलों में से एक का भविष्य किस दिशा में जाएगा.
