पश्चिम बंगाल में व्यापक राजनीतिक बदलाव के साथ ही शासन का भी एक नया अध्याय आरंभ हो रहा है. लेकिन इन दोनों विषयों से हटकर आज हम इस स्तंभ में इन दोनों के संधि बिंदु का पर्यावलोकन करेंगे जहां राजनीति से पांव बढ़ाकर लोग शासन में कदम रखते हैं, मेरा तात्पर्य शपथ ग्रहण अनुष्ठान से है.
जिस वक्त आप यह स्तंभ पढ़ रहे होंगे शायद उस वक्त तक पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री एवं उनके मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण समारोह शेष हो चुका होगा. आपने टेलीविज़न या मोबाइल के स्क्रीन पर देखा होगा ब्रिगेड मैदान में उल्लासित लोगों का सैलाब, हर दिशा में हवा में लहराते पताके, तालियों की गड़गड़ाहट और तुमुल जय जयकार. और इन सबके मध्य विशाल जन समागम के समक्ष देखा होगा लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए मानवों का राज्य के प्रतापी शासक तथा मंत्रियों में रूपांतरण.
लेकिन पश्चिम बंगाल में हर विधानसभा चुनाव के बाद शपथ ग्रहण समारोह का दृश्य हमेशा से इतना भव्य, विस्तृत तथा कोलाहलमय नहीं रहा है. डॉ. बिधान चंद्र राय से लेकर बुद्धदेव भट्टाचार्य तक, और यहां तक कि 2011 में ममता बनर्जी के पहले कार्यकाल तक, एक परंपरा लगभग अक्षुण्ण रही- शपथ-ग्रहण का स्थल था राजभवन.
वही राजभवन, जो औपनिवेशिक विरासत का प्रतीक तो था पर जिसे ध्वस्त न कर नव-स्वतंत्र भारत में संवैधानिक सत्ता के औपचारिक केंद्र की भूमिका मिली थी. वहां आयोजित समारोह सौम्य, सहज और लगभग निर्वैयक्तिक होते थे. उपस्थित लोग भी गिने-चुने ही होते थे- न्यायपालिका, प्रशासन, और कुछ राजनीतिक चेहरे. यहां न तो जन समूह होता था न ही पताकों, नारों और हर्षध्वनि में मढ़ा कोई सार्वजनिक उत्सव.
2016 में यह दृश्य अचानक बदल गया. ममता बनर्जी ने अपने दूसरे कार्यकाल का शपथ-ग्रहण राजभवन के भीतर नहीं, बल्कि कोलकाता की रेड रोड पर किया- खुले आकाश के नीचे, हजारों लोगों की उपस्थिति में. यह केवल स्थान का परिवर्तन नहीं था, यह शपथ-ग्रहण की प्रकृति का पुनर्लेखन था. फिर 2021 के चुनाव आए. महामारी के काल में ममता बनर्जी, जो पांच साल पहले खुले मैदान में शपथ ले रही थीं, इस बार फिर राजभवन लौटने पर बाध्य हुईं. समारोह सादा और सीमित था, लगभग उतना ही संयत जितना पुराने समय में हुआ करता था.
लेकिन ममता बनर्जी परंपरा को तोड़ने वाली प्रथम मुख्यमंत्री नहीं थीं. यह कीर्तिमान महाराष्ट्र में मनोहर जोशी ने 1995 में अपने नाम लिखवा लिया था जब विधानसभा चुनावों में शिवसेना की विजय के पश्चात उन्होंने प्रथा और राज भवन को अनदेखा कर शिवाजी पार्क में शपथ ग्रहण किया था. उनके बाद एक दर्जन से भी अधिक मुख्यमंत्रियों ने राज भवन को त्याग कर किसी बड़े सार्वजनिक स्थल में शपथ ग्रहण किया है, और 2014 में जब से देवेंद्र फडणवीस ने वानखड़े स्टेडियम में शपथ लिया है तब से भिन्न राज्यों के नए मुख्यमंत्री वृहत से वृहत्तर स्थान में शपथ ग्रहण करना चाहते हैं.
शपथ एक विधिक ही नहीं एक संविधानिक क्रिया है, जिसकी औपचारिकता उसकी गरिमा के साथ जुड़ी थी. परंपराएं दीर्घ काल तक चलती हैं क्योंकि वह कार्यपरक होने के संग एक विशेष समझ को संचारित करती हैं. एक राजनीतिक दल के नेता जनादेश लेकर आने से ही मुख्यमंत्री नहीं बन जाते हैं.
संविधान के अनुच्छेदों के अनुसार राज्यपाल द्वारा शपथ दिलाने के बाद ही वह राज्य के मुख्यमंत्री बनते हैं, विधिवत किसी एक दल का नहीं बल्कि पूरे राज्य के नेतृत्व का दायित्व संभालते हैं. राजभवन इस वैधता का दृश्य-रूप था, एक स्थायी प्रतीक. लेकिन अब तो राज भवन राज भवन नहीं रहा, लोक भवन बन गया है; इसलिए राज भवन अब संविधान का प्रतीक भी नहीं रहा.
आज 9 मई को बैसाख की 25वीं तिथि के अनुसार, देश के श्रद्धेय और पश्चिम बंगाल के चहेते गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म दिवस तथा बंगाल के सांस्कृतिक कैलेंडर के सबसे महत्त्वपूर्ण दिनों में से एक. साथ ही आज निश्चित है कलकत्ता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड मैदान में पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह. ध्यान रहे ब्रिगेड मैदान पश्चिम बंगाल में राजनीतिक दलों के लिए बल प्रदर्शन का चरम स्थल है. क्या आपको लगता है कि इस दिन व स्थान का चयन बस यूं ही बिना सोचे विचारे हो गया है? क्या शपथ ग्रहण समारोह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कार्य न रहकर अब मात्र सार्वजनिक राजनीतिक रंगमंच का रूप लेता जा रहा है? शायद नहीं.
ब्रिगेड मैदान, जिसे इस राज्य में बस ‘ब्रिगेड’ के नाम से जाना जाता है, हुगली नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित वह मैदान है जिसने तीन सौ साल से कलकत्ता, बंगाल, और भारत का इतिहास बनते देखा है. अंग्रेजों के आने से लेकर उनके, जमने और उखड़ने तक यह ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्यवाद का प्रशिक्षण तथा आमोद का केंद्र भी बना रहा. आज़ादी के बाद इस मैदान का अर्थ धीरे-धीरे बदलने लगा.
1960 के दशक तक कांग्रेस, कम्युनिस्ट दलों, ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों की विशाल रैलियां यहां होने लगीं. समय के साथ ‘ब्रिगेड’ केवल एक भौगोलिक स्थल नहीं रहा, ‘ब्रिगेड चलो’ राजनीतिक जुटाव का नारा बन गया. पहले कांग्रेस सरकार के तीन दशकों में, फिर वाम मोर्चा के 34 वर्षों में और उसके बाद तृणमूल के 15 सालों में ब्रिगेड रैलियां जनसमर्थन, राजनीतिक शक्ति तथा संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गईं.
स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस शपथ ग्रहण समारोह को ब्रिगेड मैदान में अनुष्ठित कर के कुछ संकेत दे रही है. प्रथम, भाजपा इस समारोह को ब्रिगेड में आयोजित कर पश्चिम बंगाल की जनता को, विशेष कर अपने समर्थकों को, अपनी पार्टी की विपुल सफलता के विशाल जन उत्सव में हिस्सा लेने का अवसर दे रही है. द्वितीय, रवीन्द्र जयंती के अवसर पर इस आयोजन से भाजपा यह सिद्ध करना चाहती है कि वह पश्चिम बंगाल की संस्कृति में ढली हुई बंगाल की ही पार्टी है, बाहर की नहीं.
तृतीय, जैसा कि मैं पहले दिखा चुका हूं, पश्चिम बंगाल में जिस दल ने भी सरकार का गठन किया है, लंबे समय तक के लिए सत्ता में रहा है. अब भाजपा बुलंद आवाज़ में घोषणा कर रही है कि बंगाल में भाजपा का काल आरंभ हो चुका है. आश्चर्य न कीजियेगा अगर आगामी दिनों में हर वर्ष 9 मई भाजपा की ब्रिगेड रैली अनुष्ठित की जाए.
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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