कुटामाल (रायगड़ा जिला, ओडिशा/जयपुर (राजस्थान): बीते महीने, 3 अप्रैल की दुपहरी में ओडिशा के रायगड़ा जिले की पुलिस ने जिले के काशीपुर ब्लॉक की सुंगेर पंचायत में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत महीने भर लंबा कर्फ्यू लगा दिया.
यह घोषणा पंचायत के 35 गांवों में से एक कुटामाल गांव से की गई थी. मीडिया में इस गांव का नाम कांतामाल लिखा जा रहा है, जो कि इसके नाम का उड़िया रूप है. इस क्षेत्र की आदिवासी भाषा कुई में इसका नाम कुटामाल है.
अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया कि कर्फ्यू का उद्देश्य कुटामाल और उसके आसपास के इलाकों में ग्रामीणों के सामूहिक रूप से एकत्रित होने पर रोक लगाना था, क्योंकि ओडिशा औद्योगिक विकास निगम को पॉइंट X से पॉइंट Y तक तीन किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण कार्य शुरू करना था.

पॉइंट एक्स सागाबारी और बिचापिंडा मौजा (राजस्व सर्कल) के बीच का जंक्शन है, जो कुटामाल से लगभग 7 किलोमीटर दूर है. यहां 12 हेक्टेयर में यूकेलिप्टस का जंगल है और दोनों ही गांवों के लोग यहां खेती करते हैं. पॉइंट वाय तिजीमाली का समतल शिखर है. तिजीमाली एक सभ्यतापूर्व/आदिम पहाड़ी है, जिसमें कई पवित्र उपवन हैं. यहां कई आदिवासियों और मूल निवासी लोगों के खेत और जीवन को आधार देने वाले जंगल हैं.
सरकार द्वारा कोंध, परजा और अन्य कुई भाषी आदिवासी के तौर पर वर्गीकृत समुदायों के साथ ही साथ वनवासी डोम, दलित और खानाबदोश गौड समुदाय के लोग इस पहाड़ी पर आश्रित हैं.
फरवरी, 2023 से तिजीमाली पठार की 1,500 हेक्टेयर जमीन वेदांता रिसोर्स लिमिटेड को बॉक्साइट खनन के लिए पट्टे पर दी हुई है. ओडिशा सरकार ने कंपनी को अगले 30 सालों के लिए प्रति वर्ष 90 लाख टन बॉक्साइट का खनन करने की इजाजत दी है.
तब से लेकर अब तक वेदांता के कथित परिचालन संबंधी अनियमितताओं, वित्तीय और विनियामक नियमों का अनुनपालन न करने, लोगों के प्रतिरोध, और क्षेत्र में सेना की तैनाती और निगरानी, और एक पुराने सभ्यता स्थल के अपरिहार्य विनाश के प्रति बरती गई घोर उपेक्षा के दावे सामने आए हैं, जिन्हें यहां, यहां, यहां, यहां और यहां दस्तावेज़ों के रूप में दर्ज किया गया है.
पहले भी फर्जी ग्राम सभाओं के ज़रिए सहमति तैयार की जाती रही है, और सुंगर पंचायत के लोगों के लिए मनमाने ढंग से की जाने वाली गिरफ्तारियां अब एक आम बात बनती जा रही हैं.
4 अप्रैल को केरपाई पंचायत के पांच गांवों, सुंगेर पंचायत के छह गांवों के और तालमपदर पंचायत के इसी नाम के गांव के 300 से ज्यादा लोग बिचापिंडा मौजा में डेरा डाल दिया, जहां सड़क का निर्माण शुरू होने वाला था. इस परियोजना का निर्माण ओडिशा इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवेलपमेंट कॉरपोरेशन (आईडीसीओ) द्वारा किया जा रहा है, जो पूरे ओडिशा में औद्योगिक परियोजनाओं को स्थापित करने के लिए निजी कंपनियों के साथ साझेदारी करने के लिए राज्य की नोडल एजेंसी है.
फिलहाल यह मामला कानूनी चुनौती के दायरे में है और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की कोलकाता बेंच में एक अंतरिम याचिका पर सुनवाई चल रही है, ऐसे में 3 किलोमीटर लंबी इस सड़क का निर्माण कार्य अभी विचाराधीन है.
रायगड़ा प्रशासन ने बिचापिंडा के इर्द-गिर्द लोगों के इस जमावड़े के जवाब में सड़क के नजदीक के हिस्से में पुलिस की बटालियनों को तैनात कर दिया.
जब द वायर के रिपार्टर ने पुलिस के जवानों से उनकी तैनाती के बारे में जानना चाहा, तो उन्हें झिड़क दिया गया. इस सड़क निर्माण की वैधता के बारे में पूछने के लिए कलेक्टर के दफ्तर को एक ई-मेल किया गया है. जवाब मिलने पर उसे रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा.
धरनास्थल सागाबारी कैंप से सिर्फ 500 मीटर दूर है. तिजीमाली पठार से इसकी दूरी तीन किलोमीटर है. धरनास्थल के नाम पर कुछ टेंट हैं, जिन्हें उपरोक्त गांवों के निवासियों द्वारा स्वतंत्र तरीके से बांस और तिरपाल की चादर से बनाया गया है. ये लोग तिजीमाली को बचाने के लिए 7 जून, 2025 से हर रात यहां बारी-बारी से धरना दे रहे हैं.
मई, 2025 में मैत्री इंफ्रास्ट्रक्चर के कंपनी फील्ड अधिकारियों ने सड़क निर्माण के लिए सर्वे करना शुरू किया था. उस समय से लोग वहां महुए के पेड़ की डालियों और जंगली झाड़ियों की बैरिकेड लगाकर आगे के क्षेत्रीय सर्वेक्षणों, ड्रिलिंग मशीनों की स्थापना और पेड़ों की कटाई जैसे कामों का विरोध करने के लिए वहीं डेरा डाले हुए हैं.

पुलिस के साथ यह गतिरोध तीन दिनों तक यानी 6 अप्रैल तक बना रहा, जब चार बसों और लगभग 20 बोलेरो गाड़ियों में भरकर एक बहुत बड़ी पुलिस टुकड़ी वहां पहुंच गई. उनके साथ रायगड़ा जिले के कलेक्टर आशुतोष कुलकर्णी भी थे.
हमें बताया गया है कि कुलकर्णी ने मेगाफोन के ज़रिए वहां जमा हुए गांव वालों से पहाड़ी को खाली करने के लिए कहा. कुटामाल की निवासी और इस प्रतिरोध की एक सक्रिय आवाज मंजुला माझी ने बताया, ‘उन्होंने हमसे पूछा कि जब इस पहाड़ी को बेच दिया गया है, तो हम यहां क्यों हैं? उन्होंने कहा कि हम इस पहाड़ी के ‘मालिक’ नहीं हैं. उन्होंने हमें कहा कि यह जमीन बेच दी गई है और हमें यहां नहीं रहना चाहिए. उन्होंने हमसे जमीन का पट्टा दिखाने के लिए कहा.’
उन्होंने जवाब दिया, ‘हमें कागजों की समझ नहीं है. हमें बस इतना पता है कि हमारे पुरखे इन पहाड़ियों पर काम करते थे और ये हमारे लिए पवित्र हैं.’ उनकी इस बात का समर्थन पास खड़ी महिलाओं ने भी एक स्वर में किया था.

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कुलकर्णी ने उन्हें कुछ ही दिन पहले करीब 20 किलोमीटर दूर तिजीमाली के तलहटी पर स्थित तालमपदर गांव की घटना को यहां भी दोहराए जाने की धमकी दी.
कुलकर्णी की धमकी का संदर्भ 11 मार्च की उस घटना से था, जिसमें कुटामाल के नजदीक की एक बस्ती से कोंध और परजा आदिवासी समुदायों के 21 सदस्यों को सूर्योदय से पहले एक एक हिंसक घटनाक्रम के बीच गिरफ्तार कर लिया गया था. आरोप है कि पुलिस ने बिना कोई भेद किए लोगों को उठा लिया, जिनमें तीन नाबालिग, एक गर्भवती महिला और 60 वर्ष से ज्यादा उम्र के दो जोड़े थे. इसके बारे में विस्तार से यहां पढ़ा जा सकता है.
इस घटना के बाद 7 अप्रैल को तीन बजे रात में कुटामाल की दो कोंध आदिवासियों – सुनामती माझी और आनंदा माझी, जो कम से कम पिछले दस वर्षों से सड़क किनारे दुकान चलाती हैं, कांटामाल के ठीक प्रवेश बिंदु पर स्थित प्राथमिक विद्यालय में सशस्त्र पुलिस जवानों को आते हुए देखा.
सुनामती माझी बताती हैं कि उन्होंने करीब सात लोगों को गुड़ी साही (गांव के केंद्र) की ओर जाते हुए देखा. यह देखकर वे दूसरी तरफ से अपने समुदाय के लोगों को आगाह करने के लिए भागीं.
कुटामाल की एक अन्य निवासी लछमी देई याद करते हुए कहती हैं, ‘सुनामती बेतहाशा मेरा दरवाजा पीट रही थीं, और जब मैं बाहर निकली, तो मैंने देखा कि कोई ‘ऊपर साही’ (गांव के ऊपरी हिस्से) में लोगों के घरों के दरवाज़े बंद कर रहा था – यह करीब 3:30 बजे की बात है. हमें उसी वक़्त कुछ करना था और बगैर शोरगुल किए हर किसी को जगाना था. लेकिन जब हम अपने लोगों के दरवाजों को खोलने के लिए गए, तो हमें चारों तरफ से फ्लैश लाइटों और लोगों की भीड़ ने घेर लिया. हमें लगा कि वे डकैत हैं.’
घटना के लगभग 12 घंटों के बाद ग्रामीणों के समूहों ने द वायर ने बात की. उन्होंने बताया कि पुलिस तला साही (गांव का निचला हिस्सा) के पास डोम समुदाय के लोगों के घरों के बगल से गुजरी, उन्होंने लोगों के घरों की एस्बेस्टस की छतों पर पत्थर फेंके, घरों में ज़बरदस्ती घुसकर महिलाओं को बाहर घसीटा, और एक पिक-अप वैन की सभी खिड़कियों के शीशे तोड़ दिए – सिवाय एक के.

यह गाड़ी संयुक्त रूप से चार परिवारों – अगड़ू, बिशंभर, धर्मेंद्र और सुशांत की थी और इसका इस्तेमाल कपड़ों और अन्य सामानों को सुंगेर हाट लेकर जाने के लिए किया जाता था.
सुंगेर हाट एक स्थानीय ग्रामीण बाजार है, जहां जनजातीय समुदाय स्थानीय उत्पादों और रोजमर्रा के लिए जरूरी सामनों की खरीद-फरोख्त करते हैं. यह हाट सप्ताह में एक बार या दो बार लगता है. यही इन चारों परिवारों की आमदनी मुख्य ज़रिया है.

वे कहती हैं, ‘अचानक बीच रात में कुछ लोगों ने हमारे घरों के दरवाजों ज़बरदस्ती खोलकर हमें नींद से जगा दिया. उन सबके मुंह से शराब की बेहद बदबू आ रही थी. उनमें से कुछ लोग पुलिस की वर्दी में थे, जबकि कुछ आधी वर्दी में और आधे काले कपड़े में थे. कुछ लोगों ने चेहरे पर नकाब लगा रखा था.’
धर्मेंद्र की पत्नी ललिता नायक सवाल करती हैं, ‘हमारे पास बाकी लोगों की तरह जमीन नहीं है. अगर हमें जीना और काम करना है, तो मेरे पति को हाट जाने के लिए ट्रैक्टर ट्रेलर पर हर बार 1,500 रुपये खर्च करने होंगे. हमारे पास इतने पैसे कहां से आएंगे?’ उनकी परेशानी उनके चेहरे से झलक रही थी.
रामचंद्र नायक अपनी पीठ और बांहों पर निशान दिखाते हुए बताते हैं, ‘करीब 4 बजे सुबह मैं जगा ही था और नहाने के लिए तैयार हो रहा था. मैंने तौलिया पहन रखा था और सामने वाले दरवाजे से बाहर निकला. तभी अंधेरे में मुझे एहसास हुआ कि मैं आदमियों की छोटी-छोटी भीड़ से घिरा हुआ हूं. वे मुझे गालियां दे रहे थे और मेरी तरफ लाठियां लेकर बढ़ रहे थे. उन्होंने मेरे हाथ पकड़ लिए और मुझे ज़मीन पर घसीटते हुए ‘गुड़ी साही’ की तरफ ले जाने लगे. मैं उनका प्रतिरोध करता रहा. वे लोग संख्या में कम से कम 30-40 के बीच रहे होंगे. इस सबके बीचे मेरा बेटा घर पर अकेला था.’

रामचंद्र का 12 वर्षीय बेटा थोबिरो नायक द वायर के संवाददाताओं को गुड़ी साही के नजदीक के दूसरे घरों में लेकर गया, जहां ह्रुतावती (46) और रीना नायक (17) ने रामचंद्र नायक को पकड़े जाने की पुष्टि की.
थोबिरो की मां और साथ ही आसपास की दूसरी आदिवासी महिलाओं ने रामचंद्र नायक को बचाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें खाकी और काले कपड़े पहने लोगों और नकाबपोशों के समूहों द्वारा शुरू की गई झड़प में लाठियों से पीटा गया.
जब 60 वर्षीय आदिवासी महिला, एनी देई माझी ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो अंधेरे में किसी ने चाकू से उनके माथे पर वार कर दिया. बाद में उन्हें टांके लगवाने के लिए 800 रुपये खर्च करने पड़े. उन्होंने कहा, ‘ये 800 रुपये मैंने पिछले 3 दिनों में कमाए थे, ऐसा इसलिए, क्योंकि पुलिस की निगरानी के कारण हमारी रोज़मर्रा की आवाजाही पर रोक लगी हुई है.’

गांव वाले बताते हैं कि मामला जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, उनकी संख्या पुलिस जवानों और कथित गुंडों से ज्यादा हो गई और गांववालों ने उन्हें घेर लिया.
इस हंगामे के बीच गांववालों को अचानक गोली चलने जैसी आवाजें सुनाई दीं. उन्हें कुटामाल के जंगल के भीतर से और उसकी सीमा के आसपास से आग और धुआं उठता दिखाई दिया. थोड़ी देर बाद जब बच्चों को बेतहाशा उल्टियां होने लगीं और सबकी आंखों में जलन और खुजली और पानी आने की शिकायत होने लगी, तब जाकर उन्हें समझ में आया कि ये दरअसल आंसू गैस के गोले थे.

जिन तीन महिलाओं ने खुद उस ज़हरीले धुएं का अनुभव किया, उन्होंने द वायर के साथ अपने बच्चों के दम घुटने की घटनाओं को साझा किया.
मुनी माझी कहती हैं, ‘बाहर से आ रही हंगामे की आवाजों के कारण हमारी नींद खुल गई और हम अपने घरों से निकल गए. मैंने अपनी बेटी और बेटे को जगाया और उन्हें अपने साथ ले लिया, क्योंकि मुझे लगा कि वे मेरे साथ ज्यादा सुरक्षित होंगे. लेकिन बाहर पूरा गांव धुएं की मोटी चादर से ढका हुआ था. मेरा बेटा प्रेम सांस नहीं ले पा रहा था और दो घंटे तक उसके चेहरे पर पानी डालते रहने के बाद कहीं जाकर वह सामान्य हो सका.’

बमनी मांझी के नौ महीने के बेटे और हसरी माझी की दो साल की बेटी ने भी यही कष्ट झेला. बमनी माझी ने द वायर को अगले दिन बताया, ‘आंसू गैस के गोले छोड़े जाने के ठीक बाद प्रेम काफी बीमार हो गया. वह लगातार रो रहा था ओर उल्टियां कर रहा था. उसके शरीर का तापमान बढ़ता गया और उसे अब भी बुखार है.’

यही कहानी भूमिका की भी है. उसकी मां हसरी ने उसे अपनी गोद में लिए हुए कहा, ‘मैं भूमिका को गोद में उठाकर धुएं के बीच गई ताकि दूसरों की मदद कर सकूं, और मुझे लगातार एक सनसनाती आवाज़ सुनाई देती रही, जब तक कि एक आंसू गैस का गोला ठीक हमारे पास आकर नहीं गिरा. हम वहां से भागे, लेकिन भूमिका को सांस लेने में दिक्कत रही थी और वह ‘मू मोरिबी, मू मोरिबी (मैं मर रही हूं, मैं मर रही हूं) कहकर चिल्लाती रही.’
इसी तरह एक दिहाड़ी राज मिस्त्री लालसिंह माझी ने द वायर के संवाददाताओं को अपनी चोट और सूजन दिखलाई.
‘मैं तो बहुत पहले ही शौच के लिए गया था, लेकिन जब मैं नाले से लौटा, तो मैंने देखा कि ‘गुड़ी साही’ में लोगों की भीड़ जमा है और वहां भयंकर धुआं फैला हुआ था. मैं अपने घर की तरफ भागा, लेकिन बीच में ही पुलिस वर्दी वाले लोगों ने मुझे पकड़ लिया. उन्होंने मेरे चेहरे, पीठ और बांहों पर लाठियां चलाईं. हालांकि मैं किसी तरह से भाग निकला, लेकिन रास्ते में ही बेहोश होकर गिर गया. उसके बाद मुझे आसपास के लोग उठाकर ले गए. जब मुझे होश आया, तब तक सब कुछ शांत हो गया था. लेकिन मेरे हाथों को देखिए, मुझे नहीं लगता कि मैं अगले एक महीने तक काम करने के काबिल हो सकूंगा.’

इसके अलावा, गांववालों ने बताया कि उनकी एक गाय की मौत हो गई, जबकि बाकी गायें अपने बाड़ों से भाग गईं; यह उन समुदायों के लिए एक बड़ा आर्थिक नुकसान है जो चराई और दूध निकालने पर निर्भर हैं. हर गाय की कीमत उनके लिए 8,000-10,000 रुपये होती है, और ये खेती करने वाले समुदायों के लिए फसल काटने और उसके बाद के समय में बहुत ज़रूरी होती हैं.
कुछ लोगों ने बताया कि उनके एस्बेस्टस की छतों पर पड़े फूस में आग लग गई. जब ऐसा हुआ उस समय बच्चे घरों के अंदर ही थे. कुछ औरतों ने नाक और कान की सोने की बालियों, कुल्हाड़ियों और दुकानों से सामानों की चोरी होने की शिकायत की.
गुड़ी (पूजा स्थल) पर द वायर के रिपोर्टर से वहां के लोगों की बातचीत से यह बात सामने आई कि पुलिस की इस छापेमारी में उनके साथ काले कपड़े वाले भेष बदले हुए लोग थे, जिन्होंने चेहरे पर नकाब पहन रखे थे, जिससे उनका तीन चौथाई चेहरा ढका हुआ था.
इस झड़प के दरमियान कुछ नकाबपोश लोगों की पहचान उजागर हो गई.
कांटामाल के निवासी और आदिवासियों के संगठन ‘मां माटी माली सुरक्षा मंच’ के जमीनी कार्यकर्ता जयधर नायक, वानंग देई माझी और गोबिंदा माझी का दावा है कि ये गुंडे वेदांता की तरफ से दलाल या बिचैलिया का काम करने वाले लोग थे. ये लोग सागाबारी, लकरिश और सियाडिमाल जैसे पास के गांवों के रहने वाले थे.
वेदांता के फील्ड ऑफिसर, जिनके साथ द वायर के रिपोर्टर ने पहले बातचीत की थी, ने इस विषय पर विस्तार से बात करने से मना कर दिया. उस अधिकारी का कहना था कि उनके पास कुटामाल में सूर्योदय से पहले फैली अशांति के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा कि वे जिले के एक दूसरे इलाके का काम देखते हैं. इसके बाद 25 अप्रैल को कंपनी के सीएसआर विभाग और प्रेस टीम को इस संबंध में सवाल भेजे गए थे, उनके जवाब का अभी तक इंतजार है.
इस बीच द वायर ने रायगड़ा जिलाधिकारी और रायगड़ा के एसपी से भी संपर्क किया है और उनसे इस घटनाक्रम पर टिप्पणी मांगी है. उनका जवाब आने के बाद रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा.
राज्य समर्थित हिंसा के साये में जी रहे कोंध आदिवासी और अन्य मूल निवासी समुदाय सदियों से तिजीमाली की छांव में रहते आए हैं. इस पहाड़ी का हर भाग तपना- पवित्र स्थल और आध्यात्मिक उपवनों से भरा हुआ है, जो उनके पुरखों का साकार रूप है. ये देवता न सिर्फ गांवों की रक्षा करते हैं, बल्कि उनके पेड़ों, पालतू जानवरों और इन विशाल जंगलों और जमीनों से होकर गुजरने वाली हर चीज की रक्षा करते हैं. अब उन सभी के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि ओडिशा के कालाहांडी और रायगड़ा ज़िलों के गांवों में यह हिंसा रोज़मर्रा की ज़िंदगी को लगातार प्रभावित कर रही है.
(मलिका सिंह एक स्वतंत्र फील्ड रिपोर्टर और एसओएस, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन की रिमोट एमए की छात्रा हैं. फिलहाल वे जयपुर से काम करती हैं. रैंडल सेकिरा एक सामुदायिक चिकित्सक हैं और ओडिशा में आदिवासी लोगों के आंदोलनों से नजदीकी तौर पर जुड़े हैं. उनका कार्यक्षेत्र भवानीपटना है.
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