
(यह रिपोर्ट पुलित्जर सेंटर फॉर क्राइसिस रिपोर्टिंग के सहयोग से की जा रही ‘द वायर’ की ‘द फोर्स्ड गिल्ट प्रोजेक्ट’ श्रृंखला का चौथा और अंतिम भाग है. पहले और दूसरे और तीसरे भाग को यहां पढ़ा जा सकता है.)
बेंगलुरू/हैदराबाद: राष्ट्रीय जांच एजेंसी समेत विभिन्न एजेंसियों ने जब अचानक जेल में बंद ओबैद-उर-रहमान से मिलना शुरू किया, तब तक उसे पराप्पना अग्राहार सेंट्रल प्रिजन, बेंगलुरू में रहते छह महीने से ज्यादा का समय गुजर चुका था. उस समय महज 21 साल का रहमान 12 अन्य सह-आरोपियों के साथ आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के साथ जुड़े होने और बेंगलुरू में दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं की हत्या की साजिश रचने के आरोपों का सामना कर रहा था. अगस्त, 2012 में अपनी गिरफ्तारी के वक्त वह ग्रैजुएशन की पढ़ाई कर रहा था.
जब वह जेल में था, उस समय हैदराबाद के दिलसुख नगर में 21 फरवरी, 2013 को दो बम विस्फोट हुआ था, जिसमें 18 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से ज्यादा जख्मी हो गए थे. मीडिया ने पूरी तरह से एनआईए के वर्जन के आधार पर रहमान के इस हमले के मुख्य आरोपियों में शामिल होने और गिरफ्तारी से काफी पहले से इस हमले की योजना में शामिल होने और बाद में जेल के भीतर से भी उसके ऐसा करते रहने का दावा किया. उसका चेहरा हर जगह छा गया. मीडिया में इस आतंकी हमले में उनकी खास भूमिका होने की कहानियां चलाई गईं.
मामले के आगे बढ़ने पर जब एफआईआर या उसके बाद चार्जशीट की बारी आई तब रहमान का नाम दोनों में ही नहीं था. मीडिया से भी उसका नाम गायब हो गया. उतने ही नाटकीय तरीके से, जितने नाटकीय तरीके से वह आया था. यह बात दीगर है कि उस पर उंगली उठाने वाले लेख और वीडियो रिपोर्ट आज भी ऑनलाईन सर्च किए जा सकते हैं और सबके लिए उपलब्ध है.

लेकिन बिना कोई समय गंवाए एजेंसी ने उसे एक दूसरे मामले में लपेट लिया. इस बार ‘एक बड़ी साजिश’ में शामिल होने के आरोप में. इस नए मामले में उसके लश्कर-ए-तैयबा का सदस्य होने का दावा नहीं किया गया, बल्कि अब उसे देश के अंदर के आतंकी समूह इंडियन मुजाहिदीन का सदस्य बताया गया.
गौरतलब है कि इंडियन मुजाहिदीन नाम पहली बार 2008 में, महाराष्ट्र और गुजरात में सीरियल आतंकी धमाकों के बाद सामने आया था.
बड़ी साजिश वाले मामले की जांच एनआईए के नई दिल्ली अवस्थित मुख्यालय की एक टीम द्वारा की गई. और कुछ दिनों के भीतर ही उसे दिल्ली के तिहाड़ केंद्रीय कारागार में स्थानांतरित कर दिया गया. तिहाड़ जेल में उसका पहला प्रवास करीब 10 महीने का रहा. इसके बाद उसे फिर से बेंगलुरू भेज दिया गया. आनेवाले कुछ वर्षों में एनआईए उसे कभी दिल्ली तो कभी मुंबई के बीच घुमाती रही.
दिल्ली में रहमान को तिहाड़ जेल नंबर 4 में रखा गया था. उस समय इस जेल में आमतौर पर गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) अधिनियम (यूएपीए) जैसे विशेष कानूनों और एनआईए या दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की जांच के अधीन मामलों के आरोपियों को रखा जाता था.
तिहाड़ में रहमान ने जल्दी ही जेल की बोली सीख ली. उसने जिंदा बचे रहने के नुस्खे भी सीख लिए: कि कैसे कम से कम नुकसान उठाए जीवित रहा जाए, दक्षिणपंथी उग्रपंथियों से झड़पों में शामिल होने से कैसे बचा जाए, गार्डों के पक्षपात से कैसे खुद को दूर रखा जाए, बातचीत से काम निकालने के हुनर पर भी उसने महारत हासिल कर ली.
लेकिन एक सीख जिसने उसके मुकदमे को नया आकार दिया, वह थी ‘कट्टी’. हिंदी या किसी भारतीय भाषा में इस शब्द का कोई निश्चित अर्थ नहीं है. लेकिन फिर भी यह शब्द जेल नंबर चार में इतने अंदर तक घुस गया था कि यह आधिकारिक कानूनी दस्तावेजों में भी दिखाई देने लगा था.
उसने बताया, ‘कट्टी का मतलब है, सजा में कटौती. ‘गुनाह कबूल करो और सजा कटवा दो.’
उस समय दोषी याचिकाएं धीरे-धीरे स्वीकृति हासिल कर रही थी, हालंकि यह मुख्य तौर पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा देखे जा रहे मुकदमों तक ही सीमित थी. 1986 में स्थापित इस सेल को देश की राजधानी में आतंकवाद और संगठित अपराधों का पता लगाने, उन्हें रोकने और उनकी जांच करने का जिम्मा दिया गया था. इसने 2009 तक, यानी एनआईए की स्थापना तक, सभी आतंकी मामलों को अकेले संभाला था. इसके बाद स्पेशल सेल या तो एनआईए के समानांतर या उसके साथ मिलकर काम करने लगी.
रहमान का दावा है कि तिहाड़ जेल में उसके प्रवास के कठिन दौर ने उसे इस बात की ठोस समझ दी कि जेल के कुचक्र से आखिर कैसे छुटकारा मिल सकता है? उन्होंने कहा, ‘इसका एकमात्र उपाय ‘दोषी याचिका’ देना था.’ लेकिन दिल्ली में उनके खिलाफ दर्ज मामला अभी भी शुरुआती दौर में ही था, और वह जानते थे कि उन्हें अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा.
अब असली चुनौती बेंगलुरू की एनआईए टीम को और साथ ही साथ उसके सह-आरोपियों को मनाना था. वह कहता है, ‘मैंने बेंगलुरू कांड में मेरे दो सह-आरोपियों – मोहम्मद अकरम और शोएब अहमद मिर्जा से बात की.’
अकरम और मिर्जा, गिरफ्तारी के समय दोनों की उम्र 23 वर्ष थी, इस समय तक बेंगलुरू के परप्पना अग्राहारा सेंट्रल प्रिजन में लगभग चार साल का समय गुजार चुके थे. जबकि रहमान तिहाड़ में था, अकरम और मिर्जा इस समय तक ऐसे आरोपी लोगों से मिल चुका था, जिन्हें समय-समय पर उनके लंबित मुकदमों के सिलसिले में दिल्ली से बेंगलुरू स्थानांतरित कर दिया जाता था. अपनी गिरफ्तारी के समय कंप्यूटर एप्लिकेशन में मास्टर्स के छात्र मिर्जा ने कहा, ‘इस समय तक हमें कट्टी तरकीब की पर्याप्त समझ हो चुकी थी.’ वहीं अकरम ने कहा कि, ‘लेकिन रहमान की सलाह से पहले हमने इसे अपने मुकदमे में एक संभावना के तौर पर नहीं देखा था.’
उनके सह-प्रतिवादियों में से कई इस पर राजी नहीं थे और उनके परिवार वालों ने भी इस विचार का तीखा विरोध किया. हुब्बली, कर्नाटक के रहने वाले मिर्जा का कहना है, ‘इस रणनीति से हमें आजादी मिल जाती, लेकिन इसका तरीका यही था कि हमें उन अपराधों को स्वीकार करना पड़ता, जिसका आरोप हम पर लगाया गया था.’
मिर्जा को आरोपी नंबर 1 के तौर पर लिस्ट किया गया था. उसके बड़े भाई एजाज अहमद मिर्जा, जिनकी उस समय उम्र 25 वर्ष थी, सरकारी डिफेंस रिसर्च एंड डेवेलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) में जूनियर साइंटिस्ट थे, को भी उसके साथ गिरफ्तार किया गया था. छह महीने तक हिरासत में रखने के बाद एनआईए ने उनका नाम चार्जशीट में न शामिल करने का फैसला किया और एजाज को रिहा कर दिया गया.
इस बात का कभी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि आखिर एक होनहार युवा वैज्ञानिक को बिना सबूतों के हिरासत में क्यों रखा गया. जैसा डर था, एजाज की नौकरी चली गई.
एजाज के साथ, दो अन्य- बेंगलुरु के एक पत्रकार और एक उत्तरी कर्नाटक के बिजली मिस्त्री को भी उनका नाम एनआईए की चार्जशीट में नहीं आने के कारण रिहा कर दिया गया. उनकी गिरफ्तारी को लेकर भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया.
चार्जशीट किए गए 13 लोगों में से, जैसा कि अकरम और मिर्जा जोर देकर कहते हैं, कम से कम तीन, जिनमें रहमान भी शामिल है, का अपराध में किसी तरह की कोई भूमिका नहीं थी.
मिर्जा याद करते हैं कि भारतीय रेलवे में नौकरी करने वाले उनके पिता को उनके फैसले के बारे में पता चलने पर भारी धक्का लगा था. ‘वे मुझसे मेरे फैसले पर विचार करने के लिए कहते रहे, लेकिन मेरे पास और चारा क्या था?’

रहमान कहते हैं, ‘आज एनआईए अपने मुकदमों में 40 फीसदी से ज्यादा दोषसिद्धि दोषी याचिका वाले रास्ते से हासिल कर रही है. लेकिन उस समय हमारे प्रस्ताव पर उन्होंने (एनआईए ने) सीधा न कह दिया था.’
जांच में शामिल एक अधिकारी, जो अपना नाम उजागर नहीं करना चाहते, ने द वायर से कहा कि इस समय तक एजेंसी ने दोषी याचिकाओं को दोषसिद्धि के औजार के तौर पर नहीं देखा था. उनका दावा है, ‘यह विचार उनके पास आरोपी से आया.’ वे कहते हैं, ‘हमें यह मामला अपने मुख्यालय और गृह मंत्रालय के पास लेकर जाना था. उन्हें मनाना आसान नहीं था.’
अकरम एनआईए प्राॅसिक्यूटर अर्जुन अम्बालापट्टा के साथ हुई मीटिंग को याद करता है, जिसने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था. अम्बालापट्टा ने उसे कहा, ‘अगर एजेंसी मुरव्वत दिखाने के लिए कहेगी, तो भी मैं सभी के लिए ताउम्र कैद के लिए दबाव बनाऊंगा.’ अम्बालापट्टा ने यह प्रस्ताव दिया कि एनआईए को इस मुकदमे में मुख्य आरोपी के तौर पर नामजद कम से कम दो आरोपियों को उम्र कैद दिलाने का दबाव बनाना चाहिए.’
लेकिन अंततः एजेंसी ने रहमान के विचार के पक्ष में अपना फैसला दिया. मिर्जा का कहना है, ‘यह एक धीमी प्रक्रिया थी.’ उसने आगे यह दावा किया कि एनआईए अधिकारी उससे मिलने कभी अदालत, कभी जेल में आया करते थे. मिर्जा का कहना है, यह सब चुपके से करना था, बगैर हमारे परिवार और वकीलों को इसके बारे में जानकारी मिले.
बेंगलुरु में अपने कार्यकाल के बाद अम्बालापट्टा केरल में भी एनआईए के विशेष लोक अभियोजन – स्पेशल पब्लिक प्राॅसिक्यूटर रहे, जहां उन्होंने आईएसआईएस से जुड़े कम से कम ऐसे एक दर्जन मामलों को देखा है, जिनमें आरोपी व्यक्तियों ने दोषी याचिकाएं दायर कीं.
द वायर ने अम्बालापट्टा को एक विस्तृत प्रश्नावली भेजी, लेकिन उन्होंने उस पर प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया. उन्होंने आगे इस विषय पर कोई भी संवाद करने से मना करते हुए यह जवाब भेजा, ‘एनआईए की एक सख्त मीडिया नीति है और सिर्फ हमारे – एनआईए के – के नोडल अधिकारी ही मीडिया से बातचीत कर सकते हैं.’
किसी आरोपी को न्यायिक हिरासत में लेने के बाद जांच एजेंसी कोर्ट के आदेश के बगैर आरोपी व्यक्ति से मुलाकात नहीं कर सकती है. लेकिन ऐसा कोई कोर्ट रिकाॅर्ड मौजूद नहीं है, जो यह बताए कि एनआईए ने जेल में आरोपी व्यक्ति से मिलने के लिए के लिए आवेदन किया हो या कोर्ट ने ऐसी मंजूरी कभी दी हो.
एनआईए के प्रवक्ता ने भी बताया कि दोषी याचिका दायर करने का फैसला पूरी तरह से आरोपी व्यक्तियों का होता है और एजेंसी की इसमें कोई भूमिका नहीं है. उन्होंने कहा, ‘जब कोई आरोपी व्यक्ति दोषी याचिका देने का फैसला करता है, तो यह प्रक्रिया पूरी तरह से सिर्फ उसके और जज के बीच होती है. इस प्रक्रिया में अभियोजन की कोई भूमिका नहीं होती है.’ उन्होंने एनआईए अधिकारों के जेल में आरोपियों से मिलने के आरोपों का भी खंडन किया. उन्होंने कहा, ‘वह (जेल में मुलाकात) सिर्फ कोर्ट के आदेश से ही हो सकती है.’
मिर्जा का कहना है कि 2016 के सितंबर महीने में सभी 13 आरोपियों ने जेल की एक कोठरी में बैठकर अपनी दोषी याचिकाएं लिखीं. ‘हमने हम पर लगे आरोपों को देखा और सीधे कहा जिन अपराधों का हमें आरोपी बताया गया है, हम उनके दोषी हैं, और इसे अदालत में जमा कर दिया.’ मिर्जा ने आगे हंसते हुए कहा, ‘सबकी अर्जियों में इतनी समानता थी कि वे स्कूल में की जाने वाली नकल की गई काॅपियां लग रही थीं.’
उस समय तक उनके वकील हशमथ पाशा को उनकी पीठ पीछे हफ्तों से पक रही इस खिचड़ी की कोई भनक नहीं थी. इस समय तक 18 गवाहों से पूछताछ हो चुकी थी; पाशा इनके दोषमुक्त होने के प्रति आश्वस्त थे. यह भरोसा मिर्जा और दूसरों को भी था. मिर्जा कहते हैं, ‘(पाशा) सर ने एनआईए के केस को तार-तार कर दिया था.’ लेकिन गवाह 250 से ज्यादा थे और उनसे पूछताछ में कई सालों का वक्त लग जाता.
मिर्जा कहते हैं, इसलिए जब आवेदन दाखिल किया गया, तब उनके वकील ने उनसे उनकी दोषी याचिकाएं वापस लेने के लिए मनाने की काफी कोशिश की. उनके मुताबिक, ‘पाशा सर ने काफी मेहनत की थी और हमें भी इस बात का विश्वास था कि आखिरकार हमें रिहा कर दिया जाएगा. ऐसा करना उनके साथ दगाबाजी करने जैसा लग रहा था. लेकिन हमारे पास और कोई रास्ता नहीं था.’
जब पाशा को यह लग गया कि इन लोगों ने अपना मन बना लिया है, तब उन्होंने इनकी मदद करने और इनके लिए कम से कम सजा की पैरवी करने का फैसला किया. आखिरकार इन सभी को पांच साल की सजा सुनाई गई और उन्हें सितंबर, 2017 में रिहा कर दिया गया.

हालांकि, बेंगलुरू मुकदमा वास्तव में दूसरा मामला था जिसमें एनआईए अभियोजन ने दोषी याचिकाओं के जरिए दोषसिद्धि हासिल की, लेकिन जल्दी ही एनआईए इस नुस्खे का इस्तेमाल एक माॅडल के तौर पर देश के दूसरे हिस्सों में भी करने लगी, खासकर मुस्लिमों से जुड़े मुकदमों में. पहला मुकदमा एक श्रीलंकाई नागरिक से जुड़ा था जिसे पांच वर्षों की सजा दी गई थी और उसे आखिरकार घर भेज दिया गया था. इस जांच से जुड़े एक एनआईए अधिकारी ने द वायर को बताया कि दोषसिद्धि की इस डील के तार ‘कूटनीति’ से जुड़े थे.
रहमान का दिल्ली में चल रहा मुकदमा अभी भी लंबित था, और उसे वापस तिहाड़ जेल भेज दिया गया. वह कहता है, ‘मैंने दोषी याचिका वाली तरकीब एनआईए की दिल्ली टीम के सामने भी रखी.’ उन्होंने इसे तीन बार खारिज कर दिया.
उसका आरोप है, ‘मैं जब भी इसका प्रयास करता था, वे इसके जवाब में दूसरे लोगों को भी फंसाने की मांग रखते थे. जब मैंने ऐसा करने से मना कर दिया, तब उन्होंने कोर्ट में मेरे आवेदन का विरोध किया.’
द वायर को अपने जवाब में एनआईए का मोटे तौर पर जवाब यही था कि वह विचाराधीन कैदियों से ऐसी कोई बातचीत नहीं करती है.
चौ थी कोशिश में, एनआईए नरम पड़ गई और विशेष अदालत ने उसकी दोषी याचिका को स्वीकार कर लिया. 11 साल सलाखों के पीछे रहने के बाद रहमान आखिरकार 2023 में रिहा हो गया.
दो वर्षों के बाद एक सवाल उसका पीछा नहीं छोड़ता: पुलिस उसके पीछे क्यों पड़ी? और सिर्फ उसके पीछे ही नहीं, उसके चार सगे भाइयों को भी अलग-अलग मामलों में आरोपी बनाया गया था, जिन्हें बाद में सभी अदालतों से दोषमुक्त कर दिया गया.
वह कहता है, उसके खानदान का राज्य की एजेंसियों के साथ खराब रिश्ता रहा है. 2001 में प्रतिबंधित एक छात्र संगठन सिमि पर पुलिस जांच में उसके परदादा मौलाना नसीरुद्दीन का नाम अक्सर आता है. उनके कई चाचाओं ने सिमि के साथ कथित रिश्ते के आरोपों में लंबा समय जेल में गुजारा है. हमारा अपराध हो या न हो, सरकार ने हमारे पूरे खानदान पर अपराधी की ब्रांडिंग की दी है.

अपने गृह जिले नांदेड़ में ऐसे ही मिलते-जुलते मामले में आरोपी अकरम मुंबई की एनआईए अदालत में मुकदमे का सामना करता रहा. बेंगलुरू रणनीति की ही तर्ज पर जब अकरम ने मुंबई की एक अदालत में दोषी याचिका दायर की, तब विशेष एनआईए जज ने उसे खारिज कर दिया. अदालत की टिप्पणी थी, दोषी याचिका दायर करने के पीछे के कारण स्पष्ट तरीके से नहीं बताए गए थे. अकरम को 10 साल की जेल की सजा दी गई थी और उसे आखिरकार 1 जून, 2025 को रिहा किया गया. इसके बाद से वे अपने फलों के कारोबार मे वापस लौट गया है.
अकरम और मिर्जा को उम्मीद थी कि उनकी दोषी याचिकाओं से एनआईए और दूसरी एजेंसियां उनके प्रति नरमदिली दिखाएगी. मिर्जा कहते हैं, ‘उन्होंने हमारे पुनर्वास का वादा किया था.’ लेकिन ये दोनों और दूसरे भी न सिर्फ एनआईए के हाथों नहीं बल्कि राज्य पुलिस के हाथों भी लगातार प्रताड़ना का आरोप लगाते हैं.
मई, 2024 में बेंगलुरु के रामेश्वरम कैफे ब्लास्ट मामले की जांच के हिस्से के तौर पर अकरम और मिर्जा को पूछताछ के लिए पकड़ा गया था. मिर्जा के भाई एजाज को भी पूछताछ के लिए बुलाया गया था. जबकि अकरम और एजाज को कुछ दिनों बाद छोड़ दिया गया, लेकिन मिर्जा को मामले के पांचवें अभियुक्त के तौर पर गिरफ्तार कर लिया गया.
कई महीने बाद चार अन्य अभियुक्तों को एनआईए आरोपपत्र में नाम दर्ज किया गया, लेकिन इनमें मिर्जा का नाम नहीं था. उसे आखिरकार पिछले अगस्त को विशेष अदालत द्वारा रिहा कर दिया गया.
इस रिपोर्टर ने मिर्जा से यह पूछा कि उसके और एनआईए के बीच क्या बातचीत हुई थी और सिर्फ उसे ही एनआईए ने बगैर चार्जशीट दायर किए कैसे जाने दिया था? उसने इस मामले में बात करने से इनकार कर दिया.
द वायर की पांच भागों वाली यह खोजी शृंखला दिखलाती है कि बीतते समय के साथ दोषी याचिकाएं एनआईए के लिए दोषसिद्धि हासिल करने का एक सटीक और आसान रास्ता बन गई हैं. लेकिन, इस आसान रास्ते ने सैकड़ों युवाओं को इतने लंबे समय तक जेल की सलाखों के पीछे रखने का काम किया है कि उनके पास जेल से रिहाई पाने के लिए अपना दोष स्वीकार कर लेने के अलावा कोई वास्तविक विकल्प ही नहीं बचता.
एजेंसी अपने दोषसिद्धि के रिकॉर्ड पर तालियां बजाती है, लेकिन यह एक सवाल को जन्म देता है, ‘जब कबूलनामा अंधेरे में, दबाव बनाकर और पस्त हौसलों के बल पर हासिल किया जाता है, तब यह फैसला कौन करता है कि न्याय का अर्थ क्या है?
(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
