नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (11 मई) को कहा कि चंबल स्थित नदी क्षेत्र के घड़ियाल अभयारण्य में अवैध रेत खनन रोकने के लिए उठाए जा रहे कदम केवल कागज़ों तक सीमित हैं और खनन माफिया से निपटने में राजस्थान ‘पूर्ण रूप से विफल’ साबित हुआ है.
राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में फैले चंबल अभयारण्य में बड़े पैमाने पर अवैध रेत खनन संबंधी ख़बरों के बाद स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई कार्यवाही की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने तीनों राज्यों द्वारा प्रस्तावित मौजूदा प्रवर्तन कार्रवाई में गंभीर खामियों की ओर ध्यान दिलाया. 17 अप्रैल के अपने पिछले आदेश में अदालत ने तीनों राज्यों से कार्रवाई रिपोर्ट मांगी थी.
इसके बाद अदालत को केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति और मामले में न्यायमित्र की ओर से भी सुझाव प्राप्त हुए. अदालत ने अतिरिक्त निर्देश जारी करने के लिए मामले को गुरुवार तक के लिए सूचीबद्ध किया.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा, ‘हमें लगता है कि सब कुछ केवल कागज़ों पर है. राज्यों के पास पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन उनका शायद ही इस्तेमाल हो रहा है.’
न्यायमित्र के रूप में अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता निखिल गोयल और अधिवक्ता रूपाली सैमुअल ने ‘बेहद दयनीय स्थिति’ की ओर इशारा किया. गोयल ने कहा, ‘राजस्थान के पास 2020 के बाद से कोई खनन योजना नहीं है और राज्य ने अब तक अभयारण्य के आसपास पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र अधिसूचित नहीं किया है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अवैध रूप से खनन की गई रेत ढोने वाले ट्रैक्टरों पर पंजीकरण नंबर तक नहीं हैं और वहां केवल होमगार्ड तैनात हैं.’
पीठ ने कहा, ‘राजस्थान राज्य में पूरी तरह विफल है. बिना पंजीकरण के ट्रैक्टर कैसे चल सकते हैं? और हथियारबंद संगठित माफिया के खिलाफ होमगार्ड क्या कर सकते हैं? विशेष कार्यबल बनाना ही सबसे अच्छा समाधान होगा.’
न्यायमित्र ने कहा कि समाचार रिपोर्ट्स में रेत खनन माफिया द्वारा वन रक्षकों/फॉरेस्ट गार्ड्स की हत्या की घटनाओं का उल्लेख है, फिर भी पिछले पांच वर्षों में दर्ज एफआईआर की संख्या बहुत कम है. उन्होंने कहा, ‘मुझे यह मानना नामुमकिन लगता है कि वे अवैध रेत खनन के असली जिम्मेदार लोगों को नहीं खोज सकते. पिछले पांच वर्षों में गिरफ्तार किए गए लोग केवल वाहन चालक और मजदूर हैं.’
उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि आगे जारी होने वाले निर्देशों में राज्यों से यह आंकड़ा भी मांगा जाए कि पिछले पांच वर्षों में अवैध रेत खनन में शामिल वास्तविक दोषियों को पकड़ने के लिए क्या प्रयास किए गए.
अलग रिपोर्ट दाखिल करने वाली केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने अभयारण्य के भीतर अवैध खनन से निपटने में एक कानूनी कमी की ओर इशारा किया. समिति ने बताया कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में अभयारण्य की सुरक्षा में तैनात कर्मियों को पर्याप्त कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है. विशेषज्ञ समिति ने कहा कि अन्य राज्यों में जहां वन रक्षकों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति आवश्यक होती है, वहीं मध्य प्रदेश और राजस्थान में ऐसे कानूनी संरक्षण के अभाव में वनकर्मी खनन माफिया के खिलाफ कानूनी ताकत का प्रयोग करने से डरते हैं, क्योंकि उन्हें प्रतिशोधात्मक आपराधिक कार्रवाई और गिरफ्तारी का भय रहता है.
समिति ने वन रक्षकों की कमी पर भी ध्यान दियाला. उन्होंने कहा, ‘1,695 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की सुरक्षा के लिए लगभग 339 वन रक्षकों की ज़रूरत है. वर्तमान में उत्तर प्रदेश के पास 635 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के लिए केवल 15 वन रक्षक हैं और मध्य प्रदेश के पास 435 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के लिए 50 रक्षक हैं.’
बता दें कि करीब 5,400 वर्ग किलोमीटर में फैला यह त्रि-राज्यीय अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में चंबल नदी के किनारे स्थित है. यह घड़ियाल, रेड-क्राउन रूफ टर्टल और गंगा डॉल्फिन जैसे संकटग्रस्त जीवों का प्रमुख आवास है.
चंबल नदी विलुप्तप्राय घड़ियालों का भारत में सबसे बड़ा बसेरा है. यह संरक्षित क्षेत्र में शुमार है. इसलिए रेत उत्खनन वर्जित है. इसके बावजूद सालाना करोड़ों की रेत निकाली जा रही है. लाख सरकारी दावों के बाद भी कभी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है.
बीते कुछ वर्षों में चंबल इलाके में पुलिस व वनकर्मियों पर अनेक जानलेवा हमले और रेत/पत्थर का परिवहन करने वाले वाहनों द्वारा सरकारी मुलाजिमों की कुचलकर की गई हत्याएं की गई हैं.
बीते 8 अप्रैल को ही मुरैना ज़िले में जब वन विभाग की एक टीम गश्त कर रही थी, तो अवैध रूप से निकाली गई रेत ले जा रहे एक ट्रैक्टर-ट्रॉली ने कथित तौर पर एक फॉरेस्ट गार्ड को कुचल दिया, जिससे उनकी मौत हो गई थी.
