प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब जनता से कहा कि एक साल सोना न खरीदें, पेट्रोल-डीजल बचाएं, कार-पूल करें, वर्क-फ्रॉम-होम करें और गैर-ज़रूरी विदेशी यात्राओं को टाल दें, तो वह मात्र अर्थव्यवस्था का सूखा-सा परामर्श नहीं था; वह भारतीय मध्यवर्ग, निम्न-मध्यवर्ग और रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बचतों पर टिके परिवारों की चेतना पर रखी गई एक नैतिक रसीद थी. जैसे राज्य ने नागरिक के घर के किवाड़ खटखटाकर कहा हो, खर्च पर संयम रखिए, अपनी इच्छाओं को थोड़ी देर स्थगित कीजिए, क्योंकि राष्ट्र कठिन समय की धूप में खड़ा है.
वैश्विक तेल-संकट, विदेशी मुद्रा पर दबाव और सोने के आयात की चिंता इस अपील के घोषित कारण बताए गए. भारत ने 2025-26 में सोने के आयात पर करीब 71.98 अरब डॉलर खर्च किए. यह सचमुच एक भारी आयात-बिल है, अर्थव्यवस्था की पसलियों पर रखा हुआ स्वर्णिम मगर भारी पत्थर.
लेकिन प्रश्न यहीं से उठता है, संयम का यह धर्मशास्त्र हमेशा जनता के लिए ही क्यों लिखा जाता है? यह नैतिक अर्थशास्त्र गरीब और मध्यवर्गीय परिवार की बेटी की शादी के छोटे-से हार तक पहुंचता है, मगर अरबपति कुलीनता के हीरे-पन्नों से जड़े वैश्विक प्रदर्शन तक क्यों नहीं पहुंचता?
अगर एक स्कूल शिक्षक बेटी की शादी के लिए दस ग्राम सोना खरीदे तो वह राष्ट्र की विदेशी मुद्रा पर बोझ मान लिया जाता है; पर अगर किसी अरबपति घराने की उत्तराधिकारी मेट-गाला की सीढ़ियों पर सोने के धागों, हीरों, पन्नों, पोल्की और विरासत-जड़ाऊ आभूषणों से लिपटी हुई ‘फैशन-आर्ट’ बनकर चलती है तो उसे भारतीय कारीगरी का वैश्विक उत्सव कहा जाता है.
यही वह क्षण है, जहां अर्थशास्त्र अपनी संख्याओं से बाहर निकलकर समाजशास्त्र बन जाता है और समाजशास्त्र मनुष्य की घायल तुलना, कुंठा और अपमान-बोध में उतरकर मनोविज्ञान हो जाता है.
त्याग की नैतिकता किसके लिए, और प्रदर्शन की छूट किसे
अमेरिकी प्रगतिशील युग के प्रमुख बुद्धिजीवी और ‘द थ्योरी ऑफ द लीजर क्लास’ (1899) जैसी प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक थॉर्स्टीन वेब्लेन ने जिसे कॉन्पिशस कंजम्पशन यानी दिखावटी उपभोग कहा था, वह केवल खर्च नहीं होता; वह सत्ता की भाषा होती है. महंगे कपड़े, हीरे, निजी जेट, डेस्टिनेशन शादी, गोल्ड-थ्रेड साड़ियां आदि अपनी उपयोगिता से नहीं, अपनी अनुपलब्धता से बोलती हैं. वे कहती नहीं, घोषणा करती हैं. वे पहनावे नहीं, सामाजिक पिरामिड पर फहराते हुए ध्वज हैं.
आम आदमी सोना इसलिए खरीदता है कि वह अपनी बेटी की सुरक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और संकट के लिए मुट्ठी भर पूंजी बचाना चाहता है. उसके लिए सोना भविष्य की अनिश्चित अंधेरी रात में रखी छोटी-सी आग है. अरबपति सोना इसलिए पहनता है कि दुनिया देखे. मेरे पास इतना है कि मैं संपत्ति को शरीर की सतह पर भी टांक सकता हूं. एक के लिए सोना भय से जन्मी बचत है; दूसरे के लिए अश्लीलता की अठखेलियां करते वैभव से जन्मा प्रदर्शन.
ईशा अंबानी का मेट गाला लुक इसी विरोधाभास का दृश्य-बिंदु है. वोग इंडिया ने लिखा कि साड़ी शुद्ध सोने के धागों से बुनी गई, स्वदेशी कारीगरों ने 1,200 घंटे से अधिक काम किया, 50 से अधिक कारीगरों ने उसे आकार दिया. बोडिस में नीता अंबानी के निजी संग्रह से 200 से अधिक पुराने माइन-कट हीरे लगाए गए. टाउन एंड कट और अन्य फैशन रिपोर्टों ने 1,800 कैरेट से अधिक रत्नों, 250 कैरेट से अधिक डायमंड नेकलेस, 50 कैरेट एमरल्ड और निजाम से जुड़ी सरपेच जैसी नायाब और ऐतिहासिक वस्तुओं का भी उल्लेख किया. यह परिधान नहीं, एक चलता-फिरता खजाना था; देह पर टांका हुआ विरासत-कोष, जिसमें कारीगरी, पूंजी, वंश, बाजार और वैश्विक सांस्कृतिक प्रतिष्ठा सब एक साथ चमक रहे थे.
आप चाहें तो इसे भारतीय शिल्प की विजय कह सकते हैं. और सचमुच कारीगरों का कौशल, पिचवाई प्रेरित मोटिफ, कुंदन, पोल्की, जरी, जरदोजी आदि ये सब भारतीय सौंदर्य-परंपरा का हिस्सा हैं. इनमें सदियों की उंगलियां हैं, अनाम हाथों का धैर्य है, आंखों की महीन रोशनी है औरपरंपरा का मौन श्रम है. लेकिन समस्या कला में नहीं, लग्ज़री ऑप्टिक्स यानी विलासिता के दिखावे में है.
जिस देश में प्रधानमंत्री जनता से सोना न खरीदने की अपील कर रहे हों, उसी समय एक भारतीय अरबपति परिवार का वैश्विक फैशन मंच पर सोना-हीरा-पन्ना-समारोह बन जाना केवल फैशन समाचार नहीं रह जाता; वह मोरल इकोनॉमी ऑफ इन्इक्वैलिटी (असमानता की नैतिक अर्थव्यवस्था) का मामला बन जाता है. यह केवल कपड़े का प्रश्न नहीं रह जाता; यह यह पूछने लगता है कि त्याग की नैतिकता किसके लिए है और प्रदर्शन की छूट किसके लिए.
राष्ट्र की मितव्ययिता नीचे की जेबों में खोजी जाती है, ऊपर के झूमरों में नहीं
सचमुच भारतीय जैन दर्शन के हिसाब से देखा जाए तो यह साफ़-साफ़ प्रतीकात्मक हिंसा है. ऐसी हिंसा, जिसमें किसी पर लाठी नहीं चलती, लेकिन समाज को यह याद दिलाया जाता है कि आपकी तपस्या राष्ट्रभक्ति है और हमारी ऐश्वर्य-लीला सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व.
जनता से कहा जाता है, सोना मत खरीदो. अभिजात्य से कहा जाता है, सोने को कला बना दो. जनता से कहा जाता है, कार-पूल करो. अभिजात्य के लिए निजी विमानों और वैश्विक रेड-कार्पेट नेटवर्क पर कोई नैतिक भाषण नहीं. जनता से कहा जाता है, वर्क फ्रॉम होम करो. पर जिन घरों में काम करने वाले ड्राइवर, घरेलू सहायक, स्टाइलिस्ट, सुरक्षाकर्मी और इवेंट-स्टाफ हैं, उनके श्रम पर टिके वैभव से कोई राष्ट्र-त्याग नहीं मांगा जाता. राष्ट्र की मितव्ययिता नीचे की जेबों में खोजी जाती है, ऊपर के झूमरों में नहीं.
साफ़-साफ़ देखा जाए तो यह वह सापेक्ष अभाव सिद्धांत या रिलेटिव डेप्रिवेशन थियरी है, जिसके अनुसार, लोग तब असंतोष महसूस करते हैं, जब वे अपनी वर्तमान स्थिति की तुलना दूसरों से करते हैं और पाते हैं कि उनके पास वह सब कुछ नहीं है, जो उनके पास होना चाहिए. यह वस्तुनिष्ठ गरीबी नहीं, ‘मानसिक वंचना’ है.
यह वह मामला है, जो अक्सर सामाजिक असंतोष और आंदोलनों को जन्म देती है. गरीब आदमी केवल गरीबी और गुरबत से दुखी नहीं होता; वह भीतर से तब अधिक घायल होता है, जब उसे अपने छोटे खर्च पर अपराधबोध दिया जाता है और बड़े खर्च को उत्सव बना दिया जाता है. यही असमानता की मनोवैज्ञानिक आग है.
किसी मध्यमवर्गीय पिता से कहना कि बेटी की शादी में सोना टालिए, जबकि करोड़ों के हीरे को ‘हेरिटेज कल्चर’ कहा जाए, यह सार्वजनिक नैतिकता का दोहरा मानदंड है. यह उस आदमी को भीतर से तोड़ता है, जो पहले ही फीस, दवा, किराया, राशन और शादी की सामाजिक लाज के बीच अपनी कमर झुकाए खड़ा है.
आर्थिक राष्ट्रवाद हमेशा नीचे से शुरू क्यों?
लेकिन नीति का असली सवाल यह है कि क्या आर्थिक राष्ट्रवाद हमेशा नीचे से शुरू होगा? क्या विदेशी मुद्रा बचाने का भार विवाह-ऋण में दबे परिवारों, रोज़ पेट्रोल भराने वाले कर्मचारियों, किराये के घरों में रहने वाले वेतनभोगियों और छोटे व्यापारियों पर ही डाला जाएगा?
अगर सोना आयात-बिल है तो अल्ट्रा-लक्ज़री इम्पोर्टेड जीवनशैली भी तो डॉलर-ड्रेन है. अगर एक मध्यमवर्गीय वधू की कलाई की चूड़ी राष्ट्रहित में स्थगित हो सकती है तो अमीरों के अरबों के प्रदर्शन पर कम से कम सार्वजनिक नैतिक प्रश्न क्यों नहीं उठ सकता? क्या राष्ट्रीय संयम की घंटी केवल उन दरवाज़ों पर बजेगी, जहां पहले से ही महीने के अंत में हिसाब की सांस फूल जाती है?
यहां ‘रोकना’ मुद्दा नहीं है. लोकतांत्रिक समाज में निजी संपत्ति और निजी पहनावे पर प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं की जानी चाहिए. ईशा अंबानी क्या पहनें, यह उनका निजी अधिकार है. कोई सभ्य समाज किसी व्यक्ति के वस्त्र पर पुलिसिया निगरानी नहीं चाहता. लेकिन प्रधानमंत्री का सार्वजनिक आह्वान भी तब नैतिक विश्वसनीयता चाहता है. और विश्वसनीयता तभी आती है जब संयम का संदेश ऊपर से नीचे बहता है, नीचे से ऊपर नहीं निचोड़ा जाता.
त्याग का उपदेश तब तक अधूरा है जब तक वह सत्ता, पूंजी और अभिजात्य जीवन-शैली के दरवाजे तक न पहुंचे.
असली गांधीवादी अर्थशास्त्र यह कहता कि पहले सत्ता अपने काफ़िले घटाए, मंत्री अपने समारोह सादे करें, सरकारी प्रचार का खर्च कम हो, सार्वजनिक पदों पर विलासिता सीमित हो, अरबपति घराने संकट-काल में स्वैच्छिक लग्ज़री में परहेज़ दिखाएं और फिर जनता से कहा जाए कि आइए, हम सब मिलकर देश बचाएं. वरना यह आह्वान ‘ऑस्टेरिटी फॉर द मासेस, स्पेक्टेकल फॉर द एलीट्स ‘ यानी जनता को कहो कि तप करो कुलीनों की पीठ थपथपाओ कि तमाशा जारी रहे वाला रूपक बनकर रह जाता है.
देश में असमानता
भारत में असमानता का संदर्भ भी यहां जरूरी है. ऑक्सफैम इंडिया 2023 के अनुमानों के अनुसार भारत के शीर्ष 1% के पास कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा था, जबकि नीचे के 50% के पास लगभग 3% संपत्ति थी. ऐसे समाज में जब त्याग की भाषा आती है तो सबसे पहले पूछा जाना चाहिए कि त्याग कौन करेगा? वह जो पहले से ही राशन, किराया, फीस, ईएमआई और पेट्रोल के बीच फंसा है या वह जो संपत्ति को वस्त्र की तरह पहन सकता है? यह प्रश्न ईर्ष्या का नहीं, नैतिक अनुपात का है. यह द्वेष नहीं, सार्वजनिक न्याय का प्रश्न है.
ईशा अंबानी की साड़ी एक फैशन-इवेंट में पहना गया परिधान भर नहीं है; वह हमारे समय का दमकता हुआ रूपक है. उसके धागे सोने के हैं, लेकिन उनमें बुना हुआ प्रश्न राजनीतिक है. उसके हीरे पुराने माइन-कट हो सकते हैं, पर उनमें कटता हुआ चेहरा नए भारत का है. एक भारत जहां जनता से कहा जाता है कि संकट में खर्च घटाओ और उच्च वर्ग से कहा जाता है कि अपनी विरासत को वैश्विक मंच पर और चमकदार बनाओ.
एक भारत, जहां साधारण युवती की चूड़ी अर्थव्यवस्था की समस्या बनती है और असाधारण वैभव की चमक सांस्कृतिक गौरव में बदल दी जाती है.
असली आईना यही है कि संकट के समय राष्ट्रभक्ति की कसौटी आम आदमी की बेटी की दस ग्राम चूड़ी नहीं, अभिजात्य के हजारों कैरेट वाले प्रदर्शन होने चाहिए. अर्थशास्त्र बताता है कि सोना विदेशी मुद्रा पर बोझ डालता है, लेकिन मनोविज्ञान बताता है कि असमान बोझ समाज के मन पर और भारी पड़ता है. जब गरीब की बचत अपराधबोध बन जाए और अमीर का ऐश्वर्य संस्कृति कहलाए, तब नीति नैतिक नहीं, वर्गीय दिखने लगती है.
त्याग की भाषा तभी विश्वसनीय होती है जब वह सबसे पहले ऊंचे दरवाज़ों पर दस्तक दे. जनता से संयम मांगने से पहले उन हाथों को देखिए जो वैभव को कला, विरासत और राष्ट्र-गौरव का चमकदार मुखौटा बनाकर पहनते हैं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
