नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने बुधवार (13 मई) को एक आदेश में जानकारी दी कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक प्रवीण सूद के कार्यकाल को एक बार फिर बढ़ाए जाने का फैसला किया गया है. यह उनके कार्यकाल में दूसरा सेवा विस्तार है.
उल्लेखनीय है कि प्रवीण सूद ने 25 मई 2023 को दो वर्ष की अवधि के लिए सीबीआई निदेशक का पदभार संभाला था. इससे पहले भी उन्हें एक साल का सेवा विस्तार दिया गया था. उनका मौजूदा कार्यकाल कार्यकाल 24 मई को समाप्त होने वाला था. लेकिन अब वह इस पद पर मई 2027 तक बने रहेंगे.
हिंंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीआई निदेशक के कार्यकाल विस्तार का यह आदेश कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) द्वारा मंगलवार को हुई उच्च-स्तरीय चयन समिति की बैठक के बाद जारी किया गया. इस समिति की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी और इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और विपक्ष के नेता राहुल गांधी शामिल थे.
इस बैठक के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सीबीआई निदेशक चयन प्रक्रिया को लेकर कड़ा विरोध जताया था. उन्होंने इस प्रक्रिया को पक्षपातपूर्ण बताते हुए औपचारिक रूप से असहमति नोट भी सौंपा था. राहुल गांधी ने कहा था कि वह ऐसी चयन प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनना चाहते, जिसमें निष्पक्षता पर सवाल उठते हों.
राहुल गांधी ने स्पष्ट कहा कि विपक्ष का नेता कोई रबर स्टैम्प नहीं है. उन्होंने कहा कि वे अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से समझौता नहीं कर सकते और किसी भी पक्षपातपूर्ण प्रक्रिया में भाग लेकर उसे वैधता नहीं दे सकते.
राहुल गांधी के अनुसार, उन्हें पात्र उम्मीदवारों की आवश्यक जानकारी जैसे सेल्फ-अप्रेजल रिपोर्ट और 360-डिग्री असेसमेंट उपलब्ध नहीं कराई गई. उन्होंने कहा कि 69 उम्मीदवारों की फाइलें पहली बार बैठक के दौरान देखने को दी गईं, जिससे उनका सही मूल्यांकन संभव नहीं था. उन्होंने इसे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह कदम पहले से तय उम्मीदवार को चुनने की ओर इशारा करता है.
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार लगातार सीबीआई का राजनीतिक उपयोग कर रही है, जिससे यह संस्था विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और आलोचकों को निशाना बनाने का माध्यम बनती जा रही है. उन्होंने कहा कि इसी कारण चयन समिति में विपक्ष के नेता की भूमिका सुनिश्चित की गई थी, लेकिन उन्हें प्रभावी भागीदारी से वंचित किया जा रहा है.
वहीं, सूद के कार्यकाल विस्तार संबंधी सरकारी आदेश में कहा गया है, ‘कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने चयन समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर प्रवीण सूद, आईपीएस (कर्नाटक कैडर, 1986 बैच) का सीबीआई निदेशक के तौर पर कार्यकाल 24 मई, 2026 के बाद एक साल के लिए बढ़ाने को मंज़ूरी दे दी है.’
नेतृत्व में निरंतरता की आवश्यकता
इस घटनाक्रम से परिचित लोगों ने अखबार को बताया कि उच्च-स्तरीय समिति ने सीबीआई के नेतृत्व में निरंतरता बनाए रखने का निर्णय लिया है, ताकि एजेंसी की भ्रष्टाचार-विरोधी गतिविधियां प्रभावित न हों.
पिछले कुछ सालों में सीबीआई ने अपने लंबित मामलों की संख्या 2020 के 1,695 मामलों से घटाकर 2025 में 1,048 कर दी है, और पिछले तीन सालों में विदेशों से लगभग 120 भगोड़ों को वापस लाया गया है. अकेले 2025 में विदेशों से रिकॉर्ड 47 भगोड़ों को वापस लाया गया और 251 इंटरपोल रेड कार्नर नोटिस जारी किए गए.
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2025 में पूरे हुए ट्रायल की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है, जो 500-600 के सालाना आंकड़ों से बढ़कर 1,022 मामले हो गई है.
मालूम हो कि प्रवीण सूद 1986 बैच के कर्नाटक कैडर के भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी हैं. वे सीबीआई का निदेशक नियुक्त किए जाने से पहले कर्नाटक के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के रूप में कार्यरत थे.
गौरतलब है कि नवंबर 2021 में केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया था, जिसके तहत सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (सीवीसी) एक्ट और दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (डीएसपीवी) एक्ट में संशोधन किया गया. इसके एक महीने बाद संसद ने इसे पारित कर दिया था.
इस संशोधन के जरिए सीबीआई और ईडी के निदेशकों के निर्धारित कार्यकाल पूरा होने के बाद एक-एक वर्ष के लिए तीन सेवा विस्तार दिए जा सकते हैं.
इस अध्यादेश का इस्तेमाल पूर्व ईडी निदेशक संजय कुमार मिश्रा को लगातार तीन विस्तार देने के लिए किया गया था.
मालूम हो कि विपक्ष के नेता अक्सर सीबीआई समेत दूसरी केंद्रीय जांच एजेंसियों का गलत ढंग से इस्तेमाल करने का आरोप लगाते रहे हैं. 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के केंद्र की सत्ता में आने के बाद बीते एक दशक में अनेक विपक्षी नेताओं, जिसमें तत्कालिन मुख्यमंत्री भी शामिल रहे, के खिलाफ इन एजेंसियोंं ने मामले दर्ज किए और गिरफ्तारियां भी की गईं. ऐसे में सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग की कार्यशैली और अधिकारियों की निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं.
