एल्गार परिषद केस: मुंबई प्रेस क्लब बैठक को लेकर एनआईए की दो कार्यकर्ताओं की ज़मानत रद्द करने की मांग

विशेष एनआईए अदालत में दायर आवेदन में एजेंसी ने दावा किया कि 19 जनवरी को दोनों आरोपी- वरवरा राव और सुधा भारद्वाज मुंबई प्रेस क्लब गए थे और वहां उन्होंने मामले के अपने सह-आरोपियों से बातचीत की, जो उनकी ज़मानत की शर्तों का उल्लंघन है. कोर्ट ने उनकी ज़मानत शर्तों में अपने सह-आरोपियों से संवाद करने पर रोक लगाई गई थी.

वरवरा राव (फोटो: बथिनी विनय कुमार गौड़/विकिमीडिया कॉमन्स/सीसी) और सुधा भारद्वाज (फोटो: पिक्चरमेकर फोटोग्राफी - कैरिन स्कीइडेगर/विकिमीडिया कॉमन्स/सीसी)

मंगलुरु: एल्गार परिषद मामले के आरोपियों के मुंबई प्रेस क्लब आने को लेकर पैदा हुए विवाद के कुछ सप्ताह बाद अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इस मामले में दखल दिया है. वर्ष 2018 के इस विवादित मामले की जांच कर रही केंद्रीय एजेंसी ने गुरुवार, 15 मई को दो आरोपियों – तेलुगु कवि-कार्यकर्ता वरवरा राव और वकील-शिक्षाविद् सुधा भारद्वाज को दी गई ज़मानत रद्द करने की मांग की.

विशेष एनआईए अदालत में दायर आवेदन में एजेंसी ने दावा किया कि 19 जनवरी को दोनों आरोपी मुंबई प्रेस क्लब गए थे और वहां उन्होंने मामले के अपने सह-आरोपियों से बातचीत की, जो उनकी जमानत की शर्तों का उल्लंघन है.

85 वर्षीय राव को फरवरी 2021 में जेल में स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद जमानत दी गई थी. निचली अदालत द्वारा पारित अंतरिम आदेश में शामिल कई शर्तों में से एक यह भी थी कि वे अपने सह-आरोपियों से संपर्क या संवाद नहीं करेंगे. चिकित्सीय आधार पर दी गई अंतरिम जमानत के आदेश में एक बिंदु में कहा गया था, ‘वे सह-आरोपियों या इसी तरह की गतिविधियों में शामिल किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क या संवाद करने का प्रयास नहीं करेंगे.’

इसी तरह, तकनीकी आधार पर मिली भारद्वाज की ज़मानत में भी उनकेअपने सह-आरोपियों से संवाद करने पर रोक लगाई गई है.

हालांकि यह जमानत शर्त मौजूद है, लेकिन व्यवहारिक रूप से इसे लागू करना लगभग असंभव है, क्योंकि सभी आरोपी हर पंद्रह दिन में अदालत में उपस्थित होते हैं और उनमें से कुछ का प्रतिनिधित्व एक ही वकील करते हैं.

राव और भारद्वाज दोनों को एनआईए के आवेदन पर जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया गया है.

मुंबई प्रेस क्लब विवाद की शुरुआत 19 जनवरी को क्लब में एल्गार परिषद मामले के कुछ आरोपियों की एक अनौपचारिक बैठक से हुई थी. क्लब ने तीन वरिष्ठ पत्रकारों – गुरबीर सिंह, बर्नार्ड डी’मेलो और श्रीकांत मोदक – पर इस बैठक का आयोजन कराने का आरोप लगाते हुए उनकी सदस्यता छह वर्षों के लिए निलंबित कर दी.

सिंह ने मुंबई सिटी सिविल कोर्ट का रुख किया और अपने पक्ष में अंतरिम आदेश प्राप्त किया, जिसके तहत न केवल उनकी सदस्यता बहाल की गई बल्कि उन्हें क्लब के आगामी चुनाव लड़ने की अनुमति भी दी गई. अदालत ने अंतरिम आदेश में टिप्पणी की कि ‘प्रथमदृष्टया यह कार्रवाई केवल उन्हें क्लब के चुनाव लड़ने से रोकने के उद्देश्य से की गई प्रतीत होती है.’

एल्गार परिषद मामला, जिसकी शुरुआत 2018 की शुरुआत में देशभर में मानवाधिकार रक्षकों के घरों पर छापों और उसके बाद हुई गिरफ्तारियों से हुई थी, लगभग आठ वर्षों से बिना मुकदमे के लंबित है. पहले इस मामले की जांच पुणे पुलिस कर रही थी, जिसे बाद में एनआईए को सौंप दिया गया. मामले में आरोप लगाया गया है कि इन कार्यकर्ताओं के प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से संबंध हैं.

जांच एजेंसी ने आरोपियों को ‘शहरी नक्सली’ (अर्बन नक्सल) बताया है. राव और भारद्वाज की जमानत रद्द करने की मांग वाले आवेदन में एनआईए ने एक बार फिर यह आरोप दोहराया है कि आरोपी ‘शहरी नक्सली’ हैं, जो अन्य आरोपियों से मिलकर ‘नक्सली गतिविधियां जारी’ रख सकते हैं.

एनआईए ने मुंबई प्रेस क्लब की समिति की उस रिपोर्ट का हवाला दिया है जिसमें सिंह, डी’मेलो और मोदक को क्लब में बैठक आयोजित करने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था. तीनों पत्रकारों के निलंबन के बाद एनआईए ने क्लब का दौरा किया था और बैठक से जुड़ी जानकारी, जिसमें सीसीटीवी फुटेज भी शामिल थी, मांगी थी.

ज़मानत रद्द करने के लिए दायर आवेदनों में एनआईए ने यह भी उल्लेख किया है कि उसने राव, भारद्वाज और बैठक में मौजूद अन्य आरोपियों के कॉल डाटा रिकॉर्ड (सीडीआर) पर बारीकी से नज़र रखी है, ताकि यह साबित किया जा सके कि वे लगभग उसी समय क्लब में मौजूद थे.

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर काफी हद तक आधारित एल्गार परिषद मामले पर भारत और विदेशों के कई डिजिटल विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं. वर्ष 2021 में द वायर द्वारा प्रकाशित एक संयुक्त पड़ताल के तहत यह पाया गया था कि मामले में नामजद कई कार्यकर्ता पेगासस मैलवेयर के संभावित शिकार भी थे. द वायर के निष्कर्षों की पुष्टि करने वाली इसी प्रकार की रिपोर्ट्स विभिन्न स्वतंत्र प्रयोगशालाओं द्वारा भी जारी की गई थीं.

इस मामले में कुल 16 लोगों – जिनमें सभी कार्यकर्ता, वकील और शिक्षाविद् थे – को गिरफ्तार किया गया था. इनमें से एक, 84 वर्षीय स्टैन स्वामी वर्ष 2021 में कोविड-19 संक्रमित होने के बाद मृत्यु हो गई. आरोप था कि उन्हें जेल में पर्याप्त और समय पर चिकित्सीय देखभाल नहीं मिली. बाकी 15 आरोपियों में से केवल एक व्यक्ति, नागपुर के मानवाधिकार वकील सुरेंद्र गाडलिंग, अब भी जेल में बंद हैं.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसी महीने की शुरुआत में उन्हें जमानत दे दी थी, लेकिन उनके खिलाफ एक अन्य मामला लंबित होने के कारण उन्हें अभी तक रिहा नहीं किया गया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)