नीट पेपर लीक: सवाल सिर्फ एक परीक्षा का नहीं, सड़ चुकी पूरी व्यवस्था का है

2014 के बाद से भारत ने परीक्षाओं में 89 पेपर लीक देखे हैं. नवासी बार किसी ने बंद लिफाफा तोड़ा, नवासी बार किसी छात्र की वर्षों की मेहनत एक रात में बेकार हो गई. नवासी बार राज्य ने आंखें मूंद लीं- या इससे भी बुरा, जान-बूझकर दूसरी तरफ देखा, या उसे होने देते रहा.

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नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट-यूजी 2026 परीक्षा रद्द किए जाने के बाद कथित पेपर लीक के विरोध में एनटीए के खिलाफ प्रदर्शन करते आइसा कार्यकर्ता. (फोटो: पीटीआई)

वर्ष 2026 की ‘नीट’ परीक्षा का पेपर लीक होना केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि देश की पूरी परीक्षा प्रणाली के खोखलेपन और परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था ‘राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी’ (एनटीए) की संदेहास्पद कार्यप्रणाली का जीता-जागता प्रमाण है, जिसने सरकार के नकल-मुक्त दावों, ‘परीक्षा पे चर्चा’ की पोल खोलकर रख दी है.

इस महा-घोटाले ने न केवल देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भारत का भविष्य अब प्राइवेट एजेंसियों के भरोसे ठेके पर चलेगा, बल्कि सूचना मिलते ही छह मासूम छात्रों द्वारा की गई आत्महत्याओं ने पूरे समाज को गहरे सदमे और दुर्भाग्य के कटघरे में खड़ा कर दिया है.

इसके विरोध में एआईएसएफ, एनएसयूआई, आइसा, डीएसएफ, एएसएपी, यूथ कांग्रेस और एसएफआई जैसे तमाम छात्र संगठनों ने सड़कों पर उतरकर एनटीए को बैन करने की मांग की और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे व आवास पर नकली नोट उड़ाकर व्यवस्था के लालच पर तीखा प्रहार किया.

संसद से लेकर सड़क तक इसे सरकारी अधिकारियों, कोचिंग सेंटरों और शिक्षा माफियाओं का एक ‘संगठित अपराध’ करार दिया जा रहा है, जहां जांच के नाम पर केवल ‘छोटे प्यादों’ को बलि का बकरा बनाकर ‘बड़ी मछलियों’ को अभयदान दे दिया जाता है. इस राष्ट्रीय संकट के बीच, शिक्षा मंत्री का एनटीए को क्लीन चिट देते हुए 40 मिनट की लाचार प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोबारा परीक्षा का राग अलापना सरकार के उस संवेदनहीन और निराशाजनक रवैये को उजागर करता है, जिसने देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य को अधर में लटका दिया है.

परीक्षा प्रणाली पर उठते सवाल

भारत को गर्व है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां की अधिकतम आबादी युवा है और फिर भी, मई 2026 में हम एक विकृत दृश्य के सामने खड़े हैं: 22 लाख युवा भारतीय, जिनमें से अधिकांश गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों से हैं, एक सुबह उठकर जानते हैं कि जिस परीक्षा के लिए उन्होंने अपनी ज़िंदगी के साल लगाए, वह रद्द हो गई. क्योंकि किसी ने उसे बेच दिया. क्योंकि किसी ने उसे खरीद लिया. क्योंकि इस गणराज्य में एक मेडिकल सीट की कीमत है- 30 लाख से 50 लाख रुपये और हमारे बच्चों का भविष्य एक ऐसे काले बाज़ार में बिकाऊ माल है जिसे बंद करने की इच्छाशक्ति सरकार में दिखाई नहीं देती है.

यह दुर्घटना नहीं है, यह अपवाद नहीं है, यह एक लचर व्यवस्था है, जो सड़ चुकी है और बदलाव मांग रही है.

संख्याएं झूठ नहीं बोलतीं – 8 साल में 89 पेपर लीक

2014 के बाद से भारत ने परीक्षाओं में 89 पेपर लीक देखे हैं. नवासी बार किसी ने बंद लिफाफा तोड़ा. नवासी बार किसी छात्र की वर्षों की मेहनत एक रात में बेकार हो गई. नवासी बार राज्य ने आंखें मूंद लीं – या इससे भी बुरा, जान-बूझकर दूसरी तरफ देखा, या उसे होने देते रहा.

यहां वर्ष 2014 के बाद हुए प्रमुख पेपर लीक की सूची की तालिका:

वर्ष और महीना परीक्षा/भर्ती का नाम
जून 2015 एआईपीएमटी (AIPMT) पेपर लीक
मार्च 2016 एसएससी सीपीओ एसआई/एएसआई (SSC CPO SI/ASI) लिखित परीक्षा लीक
जुलाई 2016 नीट 2 (नीट 2) पेपर लीक
फरवरी 2017 सेना भर्ती (Army Recruitment) पेपर लीक
मई 2017 एसएससी एमटीएस (SSC MTS) पेपर लीक
दिसंबर 2018 गुजरात पुलिस कांस्टेबल भर्ती पेपर लीक
फरवरी 2020 आरओ/एआरओ परीक्षा पेपर लीक
सितंबर 2020 राष्ट्रीय विधि प्रवेश परीक्षा (NLAT) पेपर लीक
मई 2021 नीट (नीट) पेपर लीक
नवंबर 2021 यूपीटीईटी (UPTET) परीक्षा पेपर लीक
दिसंबर 2021 जीएसएसएसबी (GSSSB) पेपर लीक
मई 2022 बीपीएससी (BPSC) संयुक्त प्रारंभिक परीक्षा पेपर लीक
फरवरी 2024 यूपी पुलिस कांस्टेबल भर्ती पेपर लीक
मई 2024 नीट (नीट) पेपर लीक
जून 2024 यूजीसी नेट (यूजीC NET) पेपर लीक
मई 2026 नीट (नीट) पेपर लीक

इस संकट से निपटने के लिए फरवरी 2024 में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम नामक कानून भी बना, लेकिन उसका कुछ खास असर होता नहीं दिख रहा है.

एनटीए: नेशनल टेंशन एजेंसी

जब जंतर मंतर पर एक छात्रा ने आंसू रोककर, एनटीए का नाम ‘नेशनल टेंशन एजेंसी’ रख दिया- तो वह चतुराई नहीं दिखा रही थी. वह सटीक हो रही थी. उस एजेंसी को और क्या कहेंगे जो: नीट-यूजी 2026 को अपनी विफलता स्वीकार करते हुए रद्द करती है, अपने आठ साल के इतिहास में पहली बार वह भी तब, जब सीबीआई ने लीक की जड़ नासिक और सीकर तक खोज ली?

2024 में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह दलील दी कि वही लीक ‘स्थानीय’ थी और 23 लाख छात्रों को नहीं झेलना चाहिए – और जीत भी गई, परीक्षा नहीं हुई.

एनटीए की विफलता की वास्तुकला इतनी दोहराव वाली है कि संगठित, बहु-राज्यीय नेटवर्क ने 30-50 लाख रुपये प्रति सीट पर पेपर बेचने का धंधा खड़ा कर लिया?

एनटीए भारत में परीक्षा संचालन को व्यावसायिक बनाने के लिए बनाई गई थी. इसके बजाय उसने भ्रष्टाचार को व्यावसायिक बना दिया. उसने एक ऐसा तंत्र खड़ा किया जहां सब कुछ एक जगह गलत हो सके, और फिर वह बार-बार, भयावह रूप से, बिना किसी जिम्मेदारी के गलत होता रहा. यही होगा जब शिक्षा को ठेका और प्राइवेट एजेंसी को दिया जाएगा .

लगातार छात्रों की हो रही आत्महत्या सिस्टम से कुछ सवाल पूछती है

नीट-यूजी 2026 रद्द होने के बाद चार छात्रों ने कथित रूप से आत्महत्या कर ली. वे परिवार के सोने के बाद अंधेरे में पढ़ते थे. उन्होंने शादियां, पारिवारिक समारोह, त्योहार, बचपन छोड़ा. उन्होंने कोटा, पटना या लातूर में कोचिंग के लिए पैसे उधार लिए. उन्होंने आणविक संरचनाएं और मानव शरीर-रचना याद की, जबकि सुविधा-संपन्न बच्चों के परिवारों ने लाखों रुपए देकर पर्चा पहले ही हासिल कर लिया. और फिर एक सुबह एनटीए ने घोषणा कर दी कि यह सब व्यर्थ था.

एक प्रदर्शनकारी छात्र ने सबसे सटीक बात कही- ‘देश में पेपर लीक का जिम्मेदार कौन है? आज छात्र आत्महत्या कर रहे हैं, उसका जिम्मेदार कौन है?’ हम जवाब जानते हैं. हम हमेशा से जानते थे. बस उसे नाम देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है.

पेपर लीक महज एक प्रशासनिक विफलता नहीं है. यह एक वर्गीय अपराध है. जो बच्चे लीक पर्चे खरीदते हैं, वे उन परिवारों से आते हैं जो 30-50 लाख रुपये दे सकते हैं. जो बच्चे आत्महत्या करते हैं, उनके लिए परीक्षा गरीबी से निकलने का एकमात्र दरवाज़ा थी. पर्चे बेचने वाला माफिया उस व्यवस्था की छत्र छाया में काम करता है जो भ्रष्टाचार से पहले विरोध को अपराध मानती है. आंदोलन कर रहे छात्र गैर-जमानती धाराओं में गिरफ्तार किए जा रहे, डिटेन किए जा रहे और पर्चा सेट करने वाले आज़ाद घूम रहे.

यह एक ऐसी व्यवस्था नहीं है जो विफल हुई है. यह एक ऐसी व्यवस्था है जो बिल्कुल वैसे काम कर रही है जैसे उसे डिज़ाइन किया गया था – उनके लिए जो पैसे दे सकते हैं.

‘लीक-तंत्र’: माफिया के पीछे की राजनीतिक सड़ांध

एनएसयूआई के अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने एक शब्द गढ़ा जो इस दौर से बचकर आना चाहिए: ‘लीक-तंत्र’ लीक की सरकार, लीक के द्वारा, उन लोगों के लिए जो लीक से फायदा उठाते हैं.

दस साल तक सत्ताधारी दल ने ‘डिजिटल इंडिया,’ ‘स्किल इंडिया,’ और ‘विकसित भारत 2047’ का नारा दिया. प्रतियोगी परीक्षाएं जो की किसानों, मज़दूरों और छोटे दुकानदारों के बच्चों के लिए उपलब्ध एकमात्र योग्यता-आधारित सीढ़ी है जिसे व्यवस्थित रूप से लूटी जाती रहीं. नीट भाजपा के काल में एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि चार बार लीक हुई. हर बार मंत्री ने बयान दिया. हर बार एनटीए ने इनकार किया. हर बार सीबीआई को मामला सौंपा गया. हर बार सरकार आगे बढ़ गई.

राहुल गांधी ने कहा: ‘धर्मेंद्र प्रधान ने 22 लाख नीट अभ्यर्थियों के साथ विश्वासघात किया है.’ वे सही हैं – लेकिन यह विश्वासघात एक मंत्री से परे है. यह विश्वासघात ढांचागत है.

यह उस निर्णय में गड़ा है जिसमें भारत की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाएं एक ऐसी एजेंसी को सौंपी गईं जो लोकतांत्रिक जवाबदेही से मुक्त है, जिसे आंशिक रूप से उसी कोचिंग-औद्योगिक परिसर के ज़रिये भरा गया जिसे वह नियंत्रित करने वाली थी, और जिसे उस सरकार का संरक्षण प्राप्त है जिसने डिजिटल आकर्षण को शासन समझ लिया.

धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए. यह कोई दलगत मांग नहीं है. यह किसी भी कार्यशील लोकतंत्र में नैतिक जवाबदेही का न्यूनतम मानक है. जब कोई मंत्री 22 लाख छात्रों की परीक्षा की ईमानदारी की गारंटी नहीं दे सकता, जब वह परीक्षा उसकी खुद की एजेंसी की समिति से जुड़े लीक के कारण रद्द होती है, जब छात्र मर रहे हों, तो इस्तीफा दंड नहीं है. यह दायित्व है.

लेकिन स्पष्ट रहें: ढांचागत सुधार के बिना इस्तीफा महज़ नाटक है. हम यह पहले भी देख चुके हैं. मंत्री जाता है. एजेंसी नाम बदलती है. माफिया अगले परीक्षा सीज़न का इंतज़ार करता है.

मांग: एनटीए समाप्त करो

छात्र संगठन, एनएसयूआई का ‘एनटीए हल्ला बोल’ अभियान, आइसा, आप छात्र विंग, भारतीय युवा कांग्रेस, और दिल्ली की गर्मी में बंद दरवाज़ों के बाहर खड़े सैकड़ों गैर-राजनीतिक अभ्यर्थी भीख नहीं मांग रहे. वे वह मांग रहे हैं जो हमेशा उनका हक था: एक निष्पक्ष परीक्षा.

देश की चरमराती परीक्षा प्रणाली को बचाने के लिए अब सुधार या पुनर्गठन नहीं, बल्कि पूर्ण बदलाव की ज़रूरत है, जिसकी शुरुआत अपूरणीय रूप से कलंकित हो चुकी एनटीए को तत्काल समाप्त करने से होनी चाहिए; इसकी जगह नागरिक समाज, शिक्षाविदों और राज्य सरकारों के वास्तविक प्रतिनिधित्व वाले एक नए पारदर्शी वैधानिक ढांचे का गठन किया जाए. जब तक यह स्थायी और स्वतंत्र प्राधिकरण स्थापित नहीं हो जाता, तब तक लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी नीट सहित सभी राष्ट्रीय परीक्षाएं सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति की प्रत्यक्ष निगरानी में आयोजित होनी चाहिए.

इसके साथ ही, जांच का दायरा केवल छोटे मोहरों तक सीमित न रहकर सीबीआई द्वारा उन रसूखदार राजनेताओं, नौकरशाहों और कोचिंग संचालकों तक पहुंचना चाहिए जो इस माफिया को संरक्षण देते हैं, जैसे एनटीए की समिति में शामिल उस गिरफ्तार जीव-विज्ञान प्रवक्ता के आकाओं का सच सामने लाना.

इस लड़ाई में सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम को बिना किसी ढिलाई के कड़ाई से लागू किया जाए, ताकि 1 करोड़ रुपये का जुर्माना और 10 साल तक की कैद सिर्फ कागज़ों पर न रहे बल्कि पहली गिरफ्तारी से ही ज़मीनी तौर पर दिखे. अंततः, अपने अधिकारों और परीक्षा की शुचिता के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्र किशोरों पर दर्ज की गई गैर-जमानती धाराओं वाली सभी दमनकारी एफआईआर वापस ली जानी चाहिए, क्योंकि जायज़ मांग उठाने वाले युवाओं को अपराधी बनाना कानून का राज नहीं, बल्कि डराने-धमकाने की राजनीति है.

तो क्या होना चाहिए…

हर पिछला पेपर लीक एक ही स्क्रिप्ट पर चला. आक्रोश, प्रदर्शन, छोटी मछलियों की गिरफ्तारी, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, एक समिति रिपोर्ट, एक लॉलीपॉप, फिर अगली परीक्षा, और फिर अगला लीक. आज सड़कों पर लड़ रहे छात्र संगठन यह स्क्रिप्ट जानते हैं. इसीलिए वे अकेले जांच नहीं मांग रहे हैं. वे उस मशीन को तोड़ने की मांग कर रहे हैं जो हर साल जांच की ज़रूरत पैदा करती है.

सरकार की प्रवृत्ति होगी – इंतज़ार करना, प्रदर्शनकारियों को थका देना. 21 जून को पुनः परीक्षा की तारीख तय करना और आशा करना कि जरूरत का एहसास कम हो जाएगा. एनटीए को अगले चुनाव चक्र तक बचाए रखना.

छात्रों का जवाब होना चाहिए: इस बार नहीं, बहुत हो चुका!

और बाकी भारत, हर वह मां-बाप जिसने बीमारी और गरीबी में अपने बच्चे को पढ़ते देखा, हर वह शिक्षक जिसने अपने सबसे प्रतिभाशाली छात्र को रद्द परिणाम से टूटते देखा, हर वह नागरिक जो अभी भी मानता है कि इस गणराज्य में मेरिट से भाग्य तय होना चाहिए, उन्हें इन छात्रों के साथ खड़ा होना होगा.

और उन चार छात्रों के लिए जो अब न्याय देखने के लिए यहां नहीं हैं: भारत ने तुम्हें विफल किया. यह विफलता आखिरी होनी चाहिए.

(लेखक जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज के शोधार्थी हैं और एनएसयूआई से जुड़े हैं.)