त्विषा, निक्की और मनीषा की हत्याएं: हिंदू स्त्रियों को उन्हीं के परिवारवालों से कौन बचाएगा?

उत्तर प्रदेश और बिहार घरेलू हिंसा और विवाहित औरतों की हत्याओं के मामले में सबसे ऊपर हैं. ध्यान रहे, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बंगाल और केरल जाकर वहां औरतों को बतलाते हैं कि वे वहां उत्तर प्रदेश जैसी ही सुरक्षा औरतों को देंगे. हिंदुत्ववादी नेता ख़ुद को हिंदू लड़कियों के रक्षक के तौर पर पेश करते हैं. लेकिन 'अपनी' लड़कियों की उनके पति या सास-ससुर से रक्षा में उनकी कोई रुचि नहीं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

त्विषा शर्मा, निक्की भाटी, मनीषा: ये तीन नाम हैं उन युवतियों के जो हिंदू परिवारों में विवाह के कारण मारी गईं. ये नाम हिंदू औरतों के हैं. विवाह के कारण मारी गईं, यह इसलिए लिखा कि अगर इन्होंने शादी न की होती तो ज़रूर जीवित होतीं. इनके मारे जाने की वजह ही थी विवाह! सिर्फ़ औरत नहीं, हिंदू औरत लिखना पड़ा इस वजह से कि अगर ये हिंदू परिवारों में न ब्याही गई होतीं तो इनके जीवित बचे रहने की उम्मीद कुछ अधिक थी.

ऐसा लिखते वक्त मुझे यह अहसास है कि पढ़ने वाले मुझ पर सरलीकरण का आरोप लगाएंगे. कुछ कहेंगे कि हिंदुओं के प्रति विशेष द्वेष या घृणा के कारण मैं मारी गई औरतों और उनके परिवारों की हिंदू पहचान पर अधिक बल दे रहा हूं. लेकिन ऐसा करने की एक वजह है. वह यह कि पिछले 12-13 साल से हिंदू लड़कियों या औरतों की सुरक्षा को लेकर सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भारतीय जनता पार्टी के लोग रोज़-रोज़ अलग-अलग ढंग से हिंदू समाज को सावधान करते हैं. प्रायः मुसलमानों से हिंदू लड़कियों को बचाने के नारे लगाए जाते हैं.

आम हिंदू इस तरह के प्रचार में विश्वास करता है कि मुसलमान से रिश्ता बनाने या शादी करने के बाद हिंदू लड़कियां लाज़िमी तौर पर हिंसा की शिकार होती हैं. लेकिन आंकड़े कुछ और बताते हैं. इस बात की आशंका अधिक है हिंदू औरतें हिंदुओं से शादी करने के बाद मारी जाएं या हिंसा का शिकार होती रहें.

फिर भी मीडिया के लिए त्विषा, निक्की और मनीषा की हत्याएं या मौतें ऐसी नहीं जो उत्तेजना पैदा करें या किसी दूसरे समुदाय के प्रति घृणा फैला सकें. इसलिए इन पर कोई चर्चा नहीं की जाती. ये आत्मावलोकन के लिए बाध्य करती हैं जिससे तकलीफ़ होती है. दूसरे पर आरोप लगाना सुखकर है, ख़ुद की समीक्षा दुखदायी.

त्विषा, निक्की और मनीषा, ये उन 6000 औरतों में सिर्फ़ 3 नाम हैं जो हर साल अपने पति के घर में दहेज या बच्चे पैदा करने, न करने या किसी और वजह से घरेलू हिंसा में मारी जाती हैं. भारत में इस तरह लगभग रोज़ाना 16 औरतें मारी जाती हैं. इस तरह सालाना औसतन 6,000 औरतों की हत्या भारत में की जाती है.

इन आंकड़ों को पढ़ते वक्त विशेषज्ञ सावधान करते हैं कि ये घरेलू हिंसा या दहेज से जुड़ी हिंसा की वारदातों का एक बहुत छोटा हिस्सा है क्योंकि ज़्यादातर मामलों की रिपोर्ट नहीं की जाती. पुलिस अक्सर रिपोर्ट दर्ज नहीं करती और इसे घरेलू मामला मानकर रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश करती है. त्विषा के भाई ने बयान दिया है कि पुलिस ने कितनी मुश्किल से उनकी एफआईआर दर्ज की.

इन मारी गई औरतों में कोई 85 से 88% हिंदू परिवारों में मारी जाती हैं और 11 से 12% मुसलमान परिवारों में. आप कह सकते हैं कि भारत की आबादी के हिसाब से यह बंटवारा ठीक ही लगता है. ऐसा नहीं कि हिंदू इस मामले में मुसलमानों के मुक़ाबले अधिक हिंसक हैं. लेकिन क्या यह हिंदुओं के लिए तसल्ली की बात है?

राज्यवार बंटवारे में उत्तर प्रदेश और बिहार घरेलू हिंसा और विवाहित औरतों की हत्याओं के मामले में सबसे ऊपर हैं. ध्यान रहे, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बंगाल और केरल जाकर वहां औरतों को बतलाते हैं कि वे वहां उत्तर प्रदेश जैसी ही सुरक्षा औरतों को देंगे. जबकि उत्तर प्रदेश में औरतें अपने ही घरों में सबसे असुरक्षित हैं. हिंदुत्ववादी नेता ख़ुद को हिंदू लड़कियों के रक्षक के तौर पर पेश करते हैं. लेकिन ‘अपनी’ लड़कियों की उनके पति या सास-ससुर से रक्षा में उनकी कोई रुचि नहीं.

मारी गई औरतों में हिंदू औरतों की संख्या देखकर हिंदुओं का यह दावा खोखला जान पड़ता है कि उनके समाज में औरतों की हालत मुसलमान समुदाय के मुक़ाबले कहीं बेहतर है. भारत की आधिकारिक एजेंसियां धार्मिक पहचान के आधार पर आंकड़ों का विभाजन नहीं करतीं. यह कहना अधिक मुनासिब होगा कि दहेज की प्रथा हिंदुओं में कहीं अधिक प्रचलित थी और फिर भारत में उनके सांस्कृतिक प्रभाव के कारण अन्य धार्मिक समूहों में भी यह बीमारी फैली.

अध्ययनों से यह भी मालूम होता है कि हिंदुओं में भी उच्च जाति समूहों में दहेज की प्रथा अधिक प्रचलित है और दूसरी जातियों में उनके अनुकरण के कारण यह रोग फैला है. लेकिन यह कहना कोई सरलीकरण नहीं कि अधिक पढ़े-लिखे और ‘संभ्रांत’ परिवारों में दहेज या अन्य कारणों से औरतों के ऊपर हिंसा और उनकी हत्या की घटनाएं अधिक होती हैं.

दहेज को कुछ पहले तक कुरीति माना जाता था. अब उसके बारे में बात नहीं की जाती. कुछ साल पहले मैं पूछ रहा था कि प्रशासनिक और पुलिस सेवा में जाने वाले कितना दहेज लेते हैं. मेरे मित्र की बेटी ने बताया कि अब यह रक़म 20 से 25 करोड़ तक पहुंच गई है. इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं और न इसका कोई विशेष अध्ययन ही किया गया है लेकिन सबको पता है कि यह आम बात है. जब इन अधिकारियों के सामने दहेज के कारण हिंसा का मामला पहुंचेगा जो ख़ुद दहेज लेकर बैठे हैं तो उनका क्या रुख़ होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है.

अभी भी शादियों में लड़की के मायके से दिए गए आभूषणों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता है. हमारे समाज में उसे लेकर अरुचि हो, इसका सबूत नहीं. एक समाजवादी नेता ने चुनाव प्रचार के वक्त का एक क़िस्सा सुनाया था. दिल्ली में उन्हें प्रचार एक दौरान एक शादी के पंडाल में ले जाया गया. वहां उनके सामने लड़की के मायके से आए आभूषणों की प्रदर्शनी मात्र नहीं हुई, बाक़ायदा लाउडस्पीकर से एक एक गहने की घोषणा हुई. उन्होंने कहा कि मैं अजब धर्म संकट में था. दहेज विरोधी तो वे थे लेकिन वहां उन्हें वोट लेने थे. सो वे उस पंडाल में वोट मांगकर निकल आए, दहेज पर अपनी राय न दे सके.

ऐसे मित्रों को जानता रहा हूं जो ऐसी शादियों में नहीं जाते जिनमें दहेज का लेन-देन होता है. लेकिन अब ऐसे लोगों की संख्या नगण्य हो गई है. दहेज के प्रति हमारी सहनशीलता बढ़ी है और हम इस बात को प्रायः टाल जाते हैं.

साहित्य में भी प्रायः त्विषा शर्मा, निक्की भाटी, मनीषा के लिए जगह नहीं है. पिछले दो दशकों में ऐसा उपन्यास, कहानी या कोई और रचना हमें याद नहीं जिनका विषय दहेज या उसके कारण होने वाली हिंसा हो.

क्या त्विषा, निक्की और मनीषा की हत्याएं हमारी इस बेहिसी को तोड़ पाएंगी? क्या हिंदू समाज में कोई सुधार का अभियान चलाया जाएगा जो दहेज और घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ चेतना जाग्रत करे?

यह इसलिए कि यह बीमारी उच्च जाति के हिंदू समाज से ही अन्य धर्मावलबियों और जाति समूहों में संक्रमित हुई है. लेकिन न तो कोई हिंदू ‘संत’ , न कोई हिंदू संगठन त्विषा, निक्की और मनीषा के प्रति अपनी संवेदना ज़ाहिर करेगा और न आगे और त्विषा, निक्की और मनीषा मारी जाएं, इसके लिए कोई अभियान चलाएगा.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)